निजी अस्पताल, जेबें खाली करने के संस्थान!

कुछ साल पहले गुडग़ांव से एक लड़की ने लिखा था कि अपने पति को बुखार के इलाज के लिए एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया था। वहां रात भर उसके पति के तरह-तरह के टैस्ट चलते रहे। दो दिन बाद छुट्टी के वक्त 10 लाख रुपए का बिल पकड़ा दिया गया। एक दूसरे लड़के ने अपनी मां के बारे में एक दुखद घटना लिखी थी। उसने बताया कि मां को पेट में दर्द हुआ।
अस्पताल में बताया गया कि मां के गाल ब्लैडर में पथरी है। उनका इलाज होता रहा लेकिन तबियत बिगड़ती गई। उसने मां को कहीं और ले जाने की बात की, लेकिन डराया गया कि कहीं रास्ते में ही कुछ न हो जाए। कहा गया कि तबियत जैसे ही सुधरेगी, पथरी का आप्रेशन किया जाएगा। लेकिन तबियत नहीं सुधरी, और अंत में मां की मृत्यु हो गई। तब लड़का मां के पोस्टमार्टम पर अड़ गया। पोस्टमार्टम में जो दिल दहला देने वाली बात सामने आई, वह यह थी कि उसकी मां को पथरी थी ही नहीं। बहुत से निजी अस्पतालों में जब से मार्कीटिंग नामक विभाग का प्रवेश हुआ है, तब से डाक्टरों को टारगेट्स दिए जाने लगे हैं। टारगेट का मतलब ही यही है कि उन्हें कितना पैसा कमाकर अस्पताल को देना है। ऐसे में डाक्टर अधिक से अधिक दवाएं लिखते हैं, जिन टैस्टों की जरूरत नहीं होती, वे भी कराए जाते हैं। हाल ही में संसदीय कमेटी की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में 40 प्रतिशत से अधिक ऐसे आप्रेशन किए जाते हैं, जिनकी कोई जरूरत ही नहीं होती।
भारत में लोग डाक्टरों को देवता के रूप में देखते हैं। जो उन्होंने कह दिया, वही ठीक है। आम आदमी को मालूम ही नहीं होता कि जिस मरीज को वह अस्पताल में ठीक कराने के लिए लाया है, वह अस्पताल के लिए मुनाफा कमाने की मशीन है। इसके अलावा जिन लोगों के पास मैडिक्लेम होता है, उसके अनुसार जितनी राशि मरीज को दी जा सकती है, जब तक उसे पूरी तरह न वसूल लिया जाए, मरीज को नहीं छोड़ा जाता। मैडिक्लेम कम्पनियां इस बारे में सरकार से शिकायत भी कर चुकी हैं। हाल ही में राज्यसभा की सदस्य स्वाति मालीवाल ने इस मसले को उठाया था। उन्होंने कहा कि बहुत से अस्पतालों के बैड के चार्जेज फाइव स्टार होटलों से भी ज्यादा हैं। मरीज से पूछा जाता है कि क्या उसके पास स्वास्थ्य बीमा यानी कि मैडिक्लेम है और हां कहते ही फौरन बिल का मीटर चालू हो जाता है। मरीजों को वे दवाएं भी दे दी जाती हैं, जिनकी उन्हें जरूरत ही नहीं होती। इसके अलावा बहुत सी वे दवाएं होती हैं जो सिर्फ अस्पतालों की दुकानों या किसी विशेष दुकान पर ही मिलती हैं। जो मरीज 5 दिन में ठीक हो सकते हैं, उन्हें 10-15 दिन अस्पताल में रखा जाता है।
स्वाति ने जो सवाल उठाए हैं, वे अर्से से महसूस किए जा रहे हैं लेकिन मजाल है कि तमाम मामलों पर हर रोज आंदोलन करने वाले इन बातों पर कभी बोलते हों। यह भी है कि मरीज की मृत्यु के बाद भी, उसे वहां कई-कई दिन तक रखा जाता है। मृत्यु के बाद आप्रेशन का बहाना बनाकर आप्रेशन की मोटी फीस ली जाती है, फिर कह दिया जाता है कि आप्रेशन के दौरान मरीज की मृत्यु हो गई। पहले सोचते थे कि सरकारी अस्पतालों की जगह निजी अस्पतालों में इलाज ठीक होता है, मगर अब सोच उलटी हो गई है। लोग कहने लगे हैं कि सरकारी अस्पतालों में भीड़ बहुत होती है लेकिन वहां डाक्टरों के ऊपर टारगेट पूरा करने और नौकरी बचाने का कोई दबाव नहीं होता, इसलिए वे इलाज ठीक करते हैं।
अपने इस इतने बड़े देश में कोई सरकार चाहे तो हर जिले में ऐसे सुविधाजनक अस्पताल खोल सकती है, जहां मरीज को ठीक-ठाक इलाज मिले। उसकी देखभाल करने वालों को भी कुछ सुविधाएं प्रदान की जाएं। क्योंकि मरीज के मुकाबले उसकी देखभाल करने वालों की मामूली सुविधाओं का ध्यान कहीं नहीं रखा जाता। यदि सरकारों को लगता है कि उनके पास इतनी राशि नहीं है, तो क्यों न ऐसा करके देखा जाए कि किसी जिले में अस्पताल बनवाने के लिए वहां रहने वाले हर व्यक्ति से 10 रुपए मांगे जाएं। उन्हें पूरी योजना की जानकारी दी जाए। सरकार इसके लिए जिला अधिकारी की निगरानी में एक अकाऊंट खोले। यकीन मानिए कि लोग बड़ी संख्या में आगे आएंगे। ऐसे धनाढ्य लोग जो 10 के मुकाबले लाखों भी दे सकते हैं, वे भी इसमें भागीदारी करेंगे। करके तो देखिए। लेकिन करे कौन और क्यों करे? जब तरह-तरह के फालतू और आग लगाऊ बयानों से ही दलों का काम चल जाता है, तो वे ऐसे काम क्यों करें, जहां वाकई कोई कठिन प्रयत्न करना हो। सोचा तो यह गया था कि प्राइवेट अस्पताल आएंगे, तो लोगों को अच्छा इलाज मिलेगा। उन्हें दर-दर भटकना नहीं पड़ेगा लेकिन हो यह रहा है कि एक इलाज कराने में ही मध्यवर्ग के लोगों की सारी बचत खत्म हो जाती है। खाता खाली हो जाता है। मैडीकल माफिया की दादागिरी भी झेलनी पड़ती है। गरीब की तो कौन कहे। साधारण आदमी जाए, तो जाए कहां। वोटर को भगवान मानने वाले लोगों तक उसकी आवाज नहीं पहुंचती।-क्षमा शर्मा




