हाल के चुनावों में संसदीय व्यवस्था के खतरे

ऐसी हेरफेर लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है, क्योंकि इससे एक-दलीय प्रभुत्व का रास्ता खुलता है। फिर भी चुनाव आयोग ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत मतदाता सूचियों में संशोधन करने के अपने विशेष संवैधानिक अधिकार का हवाला देते हुए अपने कदम का बचाव किया। सर्वोच्च न्यायालय ने भी व्यापक रूप से इस स्थिति का समर्थन किया और कहा कि चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद अदालतें हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं, असंतुष्ट नागरिकों को अपील न्यायाधिकरण का सहारा लेना चाहिए। व्यवहार में, हालांकि, भारत की धीमी और महंगी न्याय व्यवस्था ने मताधिकार से वंचित मतदाताओं को चुनाव से पहले कोई प्रभावी राहत नहीं दी। भारत की संसदीय व्यवस्था चुनाव आयोग पर बहुत कम नियंत्रण प्रदान करती है। चूंकि केंद्र में सत्तारूढ़ दल कार्यपालिका और विधायिका दोनों को नियंत्रित करता है, इसलिए प्रधानमंत्री आयोग में नियुक्तियों को प्रभावित कर सकते हैं, प्रशासनिक नियमों को आकार दे सकते हैं, और मतदाता पात्रता से संबंधित कानून बना सकते हैं।
तमिलनाडु के चुनावों ने संसदीय व्यवस्था की एक और बार-बार सामने आने वाली खामी को उजागर किया- त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में सरकार गठन अक्सर मनमाना और अलोकतांत्रिक बन जाता है। राज्यपाल- जो आमतौर पर केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा नियुक्त होते हैं- के पास यह तय करने का व्यापक विवेकाधिकार होता है कि सरकार बनाने के लिए किसे आमंत्रित किया जाए, क्योंकि संविधान में स्पष्ट प्रक्रिया का अभाव है। तमिलनाडु में, भाजपा समर्थक माने जाने वाले राज्यपाल ने टीवीके के नेता, जिसे बहुमत के लिए आवश्यक 118 में से 108 सीटें मिली थीं, को शपथ दिलाने से पहले ही समर्थन साबित करने के लिए कहा। आलोचकों ने आरोप लगाया कि यह देरी भाजपा को वैकल्पिक गठबंधन तैयार करने का समय देने के उद्देश्य से की गई थी।
राज्यपाल पद का राजनीतिकरण लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है। इससे केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी को पर्दे के पीछे की राजनीति के माध्यम से राज्यों में अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर मिलता है और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है, क्योंकि दल विधायकों को तोडऩे के लिए लालच और दबाव का इस्तेमाल करते हैं। इसी कारण ‘रिसॉर्ट राजनीति’ जैसा परिचित दृश्य सामने आया है, जिसमें विधायकों को प्रतिद्वंद्वी दलों द्वारा खरीद-फरोख्त से बचाने के लिए छिपाकर रखा जाता है। लगातार, लगभग सब सरकारों ने राजनीतिक लाभ के लिए राजभवनों का उपयोग किया है। सरकारिया आयोग (1983), पुंछी आयोग (2007) और सर्वोच्च न्यायालय के कई निर्णय- जिनमें बोम्मई (1994) और रमेश्वर प्रसाद (2006) शामिल हैं, भी राज्यपालों की शक्तियों के दुरुपयोग को रोकने में विफल रहे। 2018 में, भाजपा के बीएस येदियुरप्पा को कर्नाटक में बहुमत न होने के बावजूद सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया गया, जिससे उनकी पार्टी को विधायकों को तोडऩे का समय मिल गया। 2019 में, देवेंद्र फडणवीस को महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री एक गुप्त, तडक़े सुबह के समारोह में शपथ दिलाई गई, जबकि प्रतिद्वंद्वी दल अभी भी गठबंधन वार्ता कर रहे थे।
ऐसी परिस्थितियों में बने गठबंधन संसदीय व्यवस्था की एक और कमजोरी उजागर करते हैं- सरकारों की अस्थिरता। तमिलनाडु में टीवीके सरकार किसी तरह बहुमत के आंकड़े को पार कर सकी और शपथ समारोह तक उसके पास केवल 120 विधायकों का समर्थन था-जो आवश्यक संख्या से मात्र दो अधिक है। उसकी स्थिरता अभी भी अनिश्चित बनी हुई है। यहां भी संसदीय व्यवस्था कोई समाधान नहीं देती। निर्वाचित सरकार न होने की स्थिति में सत्ता किसी न किसी संस्था के पास होनी चाहिए, इसलिए राज्यपाल का पद इस व्यवस्था के लिए अनिवार्य माना जाता है। और चूंकि राज्यपालों की नियुक्ति प्रधानमंत्री करते हैं, वे स्वाभाविक रूप से केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी के प्रति झुकाव रखते हैं। इसी प्रकार, अस्थिर गठबंधन संसदीय शासन की अंतर्निहित विशेषता हैं, क्योंकि कार्यपालिका तब तक ही टिकती है जब तक उसे विधायिका का विश्वास प्राप्त रहता है।
असम के परिणामों ने इसके विपरीत खतरे को उजागर किया- अत्यधिक बहुमत वाली सरकारें तानाशाही बन सकती हैं। संसदीय व्यवस्था में कार्यपालिका और विधायिका की शक्तियां एकीकृत होती हैं, जिससे पक्षपातपूर्ण शासन या सत्ता के दुरुपयोग पर बहुत कम संस्थागत नियंत्रण रह जाता है। भाजपा असम में भारी बहुमत के साथ फिर सत्ता में लौटी है, ऐसे मुख्यमंत्री के नेतृत्व में जिन पर अक्सर निरंकुश शासन के आरोप लगते रहे हैं। यहां भी संसदीय व्यवस्था संरचनात्मक रूप से असहाय दिखाई देती है। इसकी मूल संरचना ही दक्षता के नाम पर मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के कार्यालय में कार्यपालिका और विधायिका की शक्तियों को केंद्रित करती है। जब इस शक्ति का दुरुपयोग होता है, तो नागरिकों के पास कोई संस्थागत सुरक्षा उपाय नहीं बचते हैं।
केरल एक और खामी की याद दिलाता है- मतदाता अक्सर अपने नेता को सीधे चुन ही नहीं पाते। चुनाव के बाद लोग विभिन्न मुख्यमंत्री पद के दावेदारों के समर्थन में प्रदर्शन करते रहे, लेकिन अंतिम निर्णय मतदाताओं के हाथ में नहीं, बल्कि पार्टी हाईकमान के हाथ में था- एक ऐसी गैर-निर्वाचित नेतृत्व संरचना जो तय करती है कि राज्य पर कौन शासन करेगा।
फिर से, संसदीय व्यवस्था इसका कोई समाधान नहीं देती, क्योंकि इसमें मुख्यमंत्रियों के प्रत्यक्ष चुनाव की कोई व्यवस्था नहीं है। जहां मूल संविधान ने यह निर्णय निर्वाचित विधायकों पर छोड़ा था, वहीं 1980 के दशक के अंत में बने दलबदल विरोधी कानूनों ने विधायकों के स्वतंत्र निर्णय को समाप्त कर दिया, क्योंकि पार्टी निर्देशों के विरुद्ध मतदान करना अवैध बना दिया गया। हर चुनाव में भारतीय संसदीय व्यवस्था की वही संरचनात्मक खामियां सामने आती हैं- चुनावी हेरफेर, राजनीतिक राज्यपाल, अस्थिर गठबंधन, तानाशाही सरकारें, और पार्टी नेतृत्व द्वारा थोपे गए नेता। अब समय आ गया है कि भारतीय एक ऐसी व्यवस्था की मांग करें जो एक महान लोकतंत्र के अधिक योग्य हो।




