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संकटग्रस्त विश्व में भारत की आर्थिक राह

व्यक्तिगत आर्थिक संपन्नता का संतुलन तो जर्मनी, जापान, इंग्लैंड, फ्रांस का भी उचित ही है, क्योंकि इन देशों की जनसंख्या उनकी जीडीपी की तुलना में अत्यधिक कम है। केवल भारत ही अपवाद स्वरूप है, जिसकी जनसंख्या भी विश्व में सर्वाधिक है, और जनसंख्या में कितने मूल नागरिक हैं, कितने अवैध घुसपैठिए हैं, इसका आंकड़ा नहीं है…

हम सभी देख रहे हैं कि इक्कीसवीं सदी का विश्व वैज्ञानिक उन्नतियों के बाद भी अनेक प्राकृतिक-कृत्रिम बाधाओं से ग्रस्त है। कोरोना का कालखंड इसमें सबसे बड़ी बाधा रहा। इसके बाद अमरीका, रूस, ईरान, भारत, पाकिस्तान, यूक्रेन, इजरायल, खाड़ी के देशों सहित दुनिया के पंद्रह-बीस देश निरंतर युद्ध में उलझे हुए हैं, जिन पर निरंतर चर्चा हो रही है। नवीनतम अमरीका-इजरायल बनाम ईरान के युद्ध ने विश्व के सामने ऊर्जा की कठोर समस्याएं खड़ी कर दी हैं। अमरीका एवं इजरायल के द्वारा की गई बर्बादी का बदला ईरान तेल व गैस आपूर्ति के प्रमुख मार्ग होर्मुज को बंद कर, अवैध आवागमन शुल्क लेकर एवं बाधासंभावित बनाकर ले रहा है। ईरान के इस कर्म से दुनिया के विभिन्न देशों तक उनकी आवश्यकता का तेल तथा गैस सुगमता से नहीं पहुंच पा रही है। जो पहुंच भी रही है, वह भी अत्यंत महंगी होकर। उक्त देशों के चर्चित युद्ध के अतिरिक्त गुमनाम देशों के भी अपने पड़ोसियों के साथ युद्ध चल रहे हैं। यदि पड़ोसी देशों के साथ उनका युद्ध नहीं भी चल रहा है, किंतु उनके अपने ही देश में अलग-अलग रक्तरंजित संघर्ष निरंतर हो रहे हैं। चूंकि ये देश बड़े एवं संपन्न देश नहीं हैं, इसीलिए इनके युद्धक तथा स्वदेशी संघर्षों के समाचार अंतरराष्ट्रीय स्तर के मुख्य जनसंचार माध्यमों पर नहीं होते। युद्धकेंद्रित इन समस्याओं के साथ-साथ प्राकृतिक अस्थिरता एवं प्रतिकूलता की स्थितियां भी नित नए-नए विकृत ढंग से उत्पन्न हो रही हैं। यदि भारत के संदर्भ में युद्धक तथा प्रकृति आधारित समस्याओं का विश्लेषण किया जाए तो इनका अंत होता हुआ नहीं दिखाई देता।

वैसे तो गृहमंत्री ने जनसंचार माध्यम पर गर्वोक्ति के साथ घोषित कर दिया है कि भारत अब नक्सल-समस्या से मुक्त हो चुका है। यह अच्छी बात है। यदि मंत्री जी की घोषणा पूर्णत: सत्य है तो यह इस शासन की विशेष उपलब्धि है, किंतु इस उपलब्धि के साथ बाद में कोई किंतु-परंतु नहीं होना चाहिए। भविष्य में कहीं ऐसा कुछ सुनने या पढऩे को न मिल जाए कि नक्सलियों का उन्मूलन बड़े पूंजीपतियों के दबाव में उन वनों के भौतिक-औद्योगिक उपयोग के लिए किया गया है, जहां ऐसे पूंजीपति अपनी नवीन महत्वाकांक्षी परियोजनाएं आरंभ करना चाहते हैं। नक्सल-समस्या से तो देश मुक्त हो चुका है, किंतु वैश्विक ऊर्जा व आपूर्ति संकट से घिर चुका है। इसके अतिरिक्त देश में बहुत-सी ऐसी समस्याएं हैं, जो केवल और केवल सामान्य मानव के स्तर पर जीवन जीकर ही अनुभव की जा सकती हैं। जब भारतीय जनता पार्टी राजनीतिक रूप में विपक्ष में थी और उसकी बड़ी शासकीय स्थापना नहीं थी, तो प्राय: वह कांग्रेस तथा अन्य सत्तारूढ़ दलों पर अनेक आरोप लगाया करती थी। देश की समस्याओं का समाधान नहीं करने के लिए ऐसे दलों को भारत के लौकिक न्यायालय में खड़ा कर प्रश्न पूछा करती थी। भाजपा का तत्कालीन सत्ताधारी दलों से प्रश्न करना कभी नहीं रुका। सत्ताधारी दलों की मनमानी और समस्याओं का समाधान न करने की प्रवृत्ति भी ज्यों की त्यों बनी रही। किंतु वर्तमान समय तो शासन में स्थापना के दृष्टिकोण से भाजपा के अनुकूल है। इस समय वह 20 प्रदेशों तथा 2 केंद्रशासित प्रदेशों में सत्तारूढ़ है। वह केवल 8 प्रदेशों व 6 केंद्रशासित प्रदेशों में सत्ता में नहीं है। इसके बाद भी अनेक सामाजिक और पर्यावरणीय समस्याएं बनी हुई हैं और हर नए दिवस में पहले से अधिक विकराल हो रही हैं। जम्मू एवं कश्मीर, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, पूर्वोत्तर तथा दक्षिण भारतीय राज्यों की सीमाओं के समीप स्थित पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका तथा म्यांमार के माध्यम से भारत में अनेक प्रकार की समस्याएं उत्पन्न की जाती रही हैं।

इन देशों से भारत के अंदर अवैध घुसपैठियों का निरंतर प्रवेश हो रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के राष्ट्रीयत्व के प्रभाव में देश में अवैध घुसपैठियों को पकडऩे का व्यापक अभियान चलाया गया था। अप्रैल 2025 के बाद से लेकर आज तक इस अभियान के अंतर्गत केवल 4000 अवैध प्रवासियों को बाहर निकाला गया है। इसमें से 2000 को औपचारिक रूप में पुन: उनके देश भेजा गया और 2000 स्वयं भयभीत होकर अपने आप चले गए, किंतु 2014 में सत्ता में आने के बाद से लेकर भाजपा के नेतृत्व में संसद से लेकर विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों एवं जानकारों तक ने जो आंकड़े दिए हैं, उसके अनुसार देश में अवैध रूप में रह रहे विदेशी लोगों की संख्या 1.50 से 2 करोड़ के बीच हो सकती है। इनमें सर्वाधिक बांग्लादेशी हैं। इन डेढ़-दो करोड़ अवैध लोगों की पहचान सुनिश्चित करने के लिए शासन ने पैन कार्ड, बैंक खाता, आधार कार्ड, मतदाता पहचान-पत्र, पासपोर्ट तथा अन्य विभिन्न प्रकार की पहचान प्रकट करने वाले पत्रों के अद्यतन की प्रक्रिया को अत्यंत जटिल बना दिया है। अवैध लोग इस प्रक्रिया से समस्याग्रस्त हों न हों, किंतु भारत के मूल नागरिकों को अपनी पहचान सिद्ध करने के लिए भीषण संघर्ष करना पड़ रहा है। पता नहीं शासन का वास्तविक, प्रामाणिक तथा भारतीय मूल नागरिकों के हितानुरूप चलाया जा रहा जनगणना कार्य कब तक संपन्न होगा। मूल नागरिकों तथा अवैध नागरिकों की सटीक पहचान के आंकड़ों का अंतिम निष्पादन होने में अभी पता नहीं कितना समय लगेगा। जिस देश की डेढ़ अरब जनसंख्या की भीड़ में अभी तक मूल व बाहरी नागरिकों की पहचान स्पष्ट नहीं है, वहां आर्थिक, सामाजिक, प्राकृतिक, शासकीय-प्रशासकीय समस्याओं का निस्तारण किस आधार पर सत्यनिष्ठ होगा, यह स्वयं में बड़ा प्रश्न है। कोरोना से विश्व व भारत उबरा ही था, कि उसके बाद पश्चिमी यूरोप में आरंभ हुए, रूस एवं यूक्रेन के, अभी तक चल रहे युद्ध ने चारों ओर की समस्याएं बढ़ाईं, और अब अमरीका-इजरायल बनाम ईरान के युद्ध द्वारा मध्यपूर्वी मुस्लिम देशों के समुद्री मार्गों से विश्व को होने वाली तेल-गैस की आपूर्ति में जो बाधाएं उत्पन्न हुईं एवं निरंतर उत्पन्न हो रही हैं, उन्होंने समस्याओं की धुरी को आर्थिक विपन्नता की ओर मोड़ दिया है। भारत इस स्थिति में सर्वाधिक प्रभावित है। फरवरी 2026 में विश्व की चतुर्थ आर्थिक शक्ति रहा भारत अब मई 2026 में छठवें एवं सातवें क्रम पर आ गया है। जिस देश में धन-संसाधन तथा समृद्धि केवल कुछ बड़े लोगों एवं संस्थाओं तक सीमित होगी, वहां आर्थिक मंदी का ऐसा ही दुष्प्रभाव होगा।

यदि यह मान लें कि अमरीका एवं चीन की भी जनसंख्या विश्व में क्रमश: द्वितीय एवं तृतीय क्रम पर सर्वाधिक है, किंतु ऐसा मानते समय यह नहीं भूलना चाहिए कि इनकी जीडीपी शेष आर्थिक शक्तियों- जर्मनी, जापान, इंग्लैंड, फ्रांस तथा भारत की तुलना में 95.4 प्रतिशत अर्थात दोगुने स्तर पर आगे है। यह दर्शाता है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पूरी तरह द्वि-ध्रुवीय (अमरीका-चीन) है। अत: इससे सिद्ध होता है कि इन दो देशों की जनसंख्या की व्यक्तिगत आर्थिक संपन्नता अधिक संतुलित है। व्यक्तिगत आर्थिक संपन्नता का संतुलन तो जर्मनी, जापान, इंग्लैंड, फ्रांस का भी उचित ही है, क्योंकि इन देशों की जनसंख्या उनकी जीडीपी की तुलना में अत्यधिक कम है। केवल भारत ही अपवाद स्वरूप है, जिसकी जनसंख्या भी विश्व में सर्वाधिक है, और जनसंख्या में कितने मूल नागरिक हैं, कितने अवैध घुसपैठिए हैं, इसका आंकड़ा भी शासन के पास नहीं है। ऐसे में समग्र कुल गरीब जनसंख्या को सहायिकी आधारित संपन्नता देने से भारत, अमरीका-चीन के बराबर तो क्या पहुंच पाएगा, बल्कि फरवरी 2026 से लेकर मई 2026 की एक अल्पावधि में ही वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण, चौथी से गिरकर छठवीं अर्थव्यवस्था अवश्य हो गया है।

विकेश कुमार बडोला

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