जनगणना के आंकड़ों में छिपा भारत का भविष्य

सरल शब्दों में कहें तो जनगणना में दर्ज होने वाला प्रत्येक आंकड़ा आने वाले भारत की तस्वीर का एक रंग है। यदि आंकड़े सटीक होंगे तो विकास की तस्वीर भी स्पष्ट होगी…
वर्ष 2027 में देशभर में जनगणना का कार्य आरंभ होने जा रहा है। सामान्यत: जनगणना को देश में रहने वाले लोगों की संख्या गिनने की प्रक्रिया माना जाता है, लेकिन वास्तव में यह केवल लोगों की गिनती भर नहीं है। जनगणना किसी भी देश के विकास की दिशा और दशा निर्धारित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण कारक है। सरकारों द्वारा बनाई जाने वाली अधिकांश योजनाएं, बजट का वितरण, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार, रोजगार सृजन, सडक़, बिजली और पानी जैसी आधारभूत सुविधाओं का विकास जनगणना से प्राप्त आंकड़ों पर ही आधारित होता है। यही कारण है कि जनगणना को लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। जनगणना के आंकड़ों का अध्ययन जनसांख्यिकी (डेमोग्राफी) के अंतर्गत किया जाता है। जनसांख्यिकी जनसंख्या का वैज्ञानिक अध्ययन है, जिसमें जनसंख्या के आकार, संरचना, वितरण और समय के साथ होने वाले परिवर्तनों का विश्लेषण किया जाता है। इसमें जन्म दर, मृत्यु दर, जीवन प्रत्याशा, लिंगानुपात, प्रजनन दर, शिक्षा स्तर, आय, वैवाहिक स्थिति तथा प्रवासन जैसे अनेक पहलुओं का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। यही आंकड़े सरकार को यह समझने में सहायता करते हैं कि देश की वास्तविक आवश्यकताएं क्या हैं और किन क्षेत्रों में अधिक निवेश एवं योजनाओं की आवश्यकता है। भारत में जनगणना का इतिहास लगभग 150 वर्ष पुराना है।
देश में पहली अस्थायी जनगणना वर्ष 1872 में तत्कालीन वायसराय लार्ड मेयो के समय आयोजित की गई थी। इसके बाद 1881 में लार्ड रिपन के कार्यकाल में पहली नियमित एवं समकालिक जनगणना करवाई गई। तब से लेकर आज तक लगभग प्रत्येक दस वर्ष के अंतराल पर जनगणना का कार्य किया जाता रहा है। भारतीय जनसांख्यिकी के इतिहास में वर्ष 1921 को ‘महान विभाजक वर्ष’ के रूप में जाना जाता है। इसका कारण यह है कि 1921 की जनगणना में पहली और एकमात्र बार भारत की जनसंख्या में गिरावट दर्ज की गई थी। इसके पश्चात देश की जनसंख्या निरंतर बढ़ती रही और जनसंख्या वृद्धि का एक नया दौर प्रारंभ हुआ। हालांकि यह वृद्धि केवल जनसंख्या संख्या तक सीमित नहीं रही, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा, जीवन प्रत्याशा, लिंगानुपात तथा प्रजनन दर जैसे अनेक महत्वपूर्ण जनसांख्यिकीय संकेतकों में भी उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला। भारत में जाति आधारित जनगणना का इतिहास काफी पुराना है। वर्ष 1931 ब्रिटिश शासनकाल की अंतिम प्रकाशित जातिगत जनगणना थी, जिसके आंकड़ों का उपयोग बाद में मंडल आयोग ने ओबीसी आबादी का अनुमान लगाने के लिए किया। वर्ष 2011 में सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना करवाई गई, लेकिन उसके सभी आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए। अब लगभग एक शताब्दी बाद वर्ष 2027 की जनगणना में पुन: जाति आधारित आंकड़े एकत्र किए जाएंगे। सामाजिक न्याय एवं कल्याणकारी योजनाओं को अधिक प्रभावी और लक्षित बनाने की दृष्टि से यह एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। कोविड-19 महामारी के कारण वर्ष 2021 में प्रस्तावित जनगणना आयोजित नहीं हो सकी थी, जिससे वर्ष 2027 की जनगणना का महत्व और बढ़ गया है।
यह भारत की 16वीं तथा स्वतंत्र भारत की आठवीं जनगणना होगी। इसे दो चरणों में संपन्न किया जाएगा जिसके पहले चरण में आवास संबंधी तथा दूसरे चरण में जनसंख्या संबंधी जानकारी एकत्र की जाएगी। इस जनगणना की सबसे बड़ी विशेषता इसका डिजिटल स्वरूप है। पहली बार गणनाकार मोबाइल एप के माध्यम से आंकड़े दर्ज करेंगे तथा नागरिकों को स्वयं ऑनलाइन जानकारी भरने की सुविधा भी मिलेगी, जिससे प्रक्रिया अधिक पारदर्शी, त्वरित और प्रभावी बनेगी। हालांकि इस डिजिटल व्यवस्था के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं। देश में आज भी डिजिटल असमानता मौजूद है। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और डिजिटल तकनीकों की पहुंच सीमित है। अनेक लोग स्मार्टफोन और इंटरनेट का नियमित उपयोग नहीं करते। ऐसे में यह चिंता स्वाभाविक है कि कहीं समाज के कमजोर और वंचित वर्ग जनगणना की प्रक्रिया से पूरी तरह न जुड़ पाएं। इसी प्रकार स्व-गणना की सुविधा के कारण गलत आंकड़े दर्ज किए जाने की संभावना भी बनी रहती है। यदि आंकड़े गलत होंगे तो उनके आधार पर बनाई जाने वाली योजनाएं भी प्रभावित होंगी। इसलिए आंकड़ों की शुद्धता और सत्यापन की मजबूत व्यवस्था आवश्यक है। एक अन्य महत्वपूर्ण चिंता डेटा सुरक्षा की है। आज साइबर अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं। हाल के वर्षों में विभिन्न डिजिटल मंचों पर डेटा लीक और साइबर हमलों की घटनाएं सामने आई हैं। ऐसे में करोड़ों नागरिकों की व्यक्तिगत जानकारी को सुरक्षित रखना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। जनगणना से प्राप्त जानकारी नागरिकों की निजता से जुड़ी होती है, इसलिए इसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है। इन चुनौतियों के बावजूद जनगणना 2027 भारत के विकास की दिशा तय करने वाला एक ऐतिहासिक अवसर है। विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि सरकार के पास देश की सामाजिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय स्थिति का अद्यतन एवं सटीक चित्र उपलब्ध हो। जनगणना यही कार्य करती है। यह केवल वर्तमान का आकलन नहीं करती, बल्कि भविष्य की योजनाओं की नींव भी तैयार करती है। आवश्यकता इस बात की है कि प्रत्येक नागरिक जनगणना को केवल एक सरकारी प्रक्रिया न समझे, बल्कि राष्ट्र निर्माण के अपने लोकतांत्रिक दायित्व के रूप में देखे। क्योंकि जनगणना में दर्ज होने वाला प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक परिवार और प्रत्येक आंकड़ा भविष्य की नीतियों, संसाधनों के वितरण और विकास की प्राथमिकताओं को प्रभावित करता है।
सरल शब्दों में कहें तो जनगणना में दर्ज होने वाला प्रत्येक आंकड़ा आने वाले भारत की तस्वीर का एक रंग है। यदि आंकड़े सटीक होंगे तो विकास की तस्वीर भी स्पष्ट होगी और यदि कोई वर्ग या व्यक्ति छूट जाता है तो विकास की वह तस्वीर अधूरी रह जाएगी। इसलिए जनगणना 2027 को केवल जनसंख्या गणना का अभियान नहीं, बल्कि समावेशी, न्यायपूर्ण और विकसित भारत की मजबूत नींव के रूप में देखा जाना चाहिए। आज भरा गया एक सही आंकड़ा आने वाले वर्षों में जनकल्याण करेगा।-डा. सतपाल




