दलबदल अर्थात जनादेश को ठेंगा

संसद के मानसून सत्र की शुरुआत नाटकीय और हास्यास्पद रही। विपक्ष ने सर्वदलीय बैठक का बहिष्कार किया, क्योंकि तृणमूल कांग्रेस से बगावत करने वाले सांसदों को एनसीपीआई के प्रतिनिधि के तौर पर आमंत्रित किया गया था। बैठक में सुदीप बंदोपाध्याय और काकोली घोष मौजूद थे। विपक्ष के सांसदों ने बहिर्गमन किया, मीडिया को अपने-अपने बयान दिए और करीब 15 मिनट के बाद बैठक में वापस भी चले गए। यह क्या हुआ? बहिष्कार करना था, तो पूरी सर्वदलीय बैठक को खारिज करना चाहिए था। यह बैठक भी महज औपचारिक होती है, क्योंकि सदन में कार्यवाही बिल्कुल उलट होती है। बहरहाल इस सत्र के दौरान कमोबेश लोकसभा में सांसदों की सीट का परिदृश्य पहले से बिल्कुल अलग दिखाई देगा। स्पीकर ओम बिरला ने 48 सांसदों की सीटें बदली हैं, जिनमें 22 सांसद द्रमुक के हैं। चूंकि तमिलनाडु में द्रमुक-कांग्रेस का संबंधविच्छेद हो चुका है, लिहाजा द्रमुक ने उनकी सीटें बदलने का आग्रह किया था। इन 48 सांसदों की सीटें सत्ता-पक्ष की तरफ हैं। क्या मान लिया जाए कि अब ये 48 सांसद सत्तारूढ़ एनडीए के प्रत्यक्ष या परोक्ष हिस्सा हो गए हैं? संसद के मानसून सत्र का आगाज हो चुका है, लिहाजा यह सच भी सामने आ ही जाएगा। यकीनन सत्र हंगामेदार होगा, क्योंकि मुद्दों को लेकर कई विरोधाभास हैं। बेशक राम मंदिर में चढ़ावा-चोरी, पेपरलीक, परिसीमन, महंगाई, बेरोजगारी, किसानी, ई-20 एथेनॉल विवाद, विदेश नीति, वोट चोरी और वांगचुक अनशन आदि बेहद संवेदनशील और राष्ट्रीय फलक के मुद्दे हैं, लेकिन दलबदल का राजनीतिक चलन सीधा लोकतंत्र, चुनाव प्रणाली और जनादेश के लिए गंभीर चुनौती है। बल्कि जनादेश को ठेंगा दिखाया जा रहा है। क्या संसद के भीतर ऐसे मुद्दे पर चर्चा होगी और कोई निश्चित नीति तय की जाएगी? हमारा अनुभव कहता है कि ऐसा कदापि नहीं होगा। हमने लोकतंत्र के अभी तक के इतिहास में न तो पढ़ा है और न ही संसदीय कवरेज के दौरान देखा है कि जिस पार्टी का अस्तित्व ही गुमनाम हो, अचानक उसके पाले में 20 लोकसभा सांसद आ जाएं! यह ‘काला चमत्कार’ ही हो सकता है! बिना चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़े, बिन उम्मीदवारी के और प्रत्यक्ष जनादेश हासिल किए बिना ही 20 सांसद…! यानी औसतन 200 विधायक….! बेशक यह लोकतंत्र पर कलंक है और दलबदल के जरिए राजनीतिक अस्थिरता का डरावना उदाहरण है।
साफ मायने हैं कि जनादेश कुछ भी हो, यदि आप सत्ता में हैं, तो किसी भी जनादेश को तोड़-फोड़ कर सदन में अपना आंकड़ा व्यापक कर सकते हैं। स्पीकर ने तृणमूल से टूटे 20 सांसदों के एनसीपीआई में विलय को मान्यता दी है और सत्ता-पक्ष के साथ उनकी नई सीटें तय की हैं और इस नए संसदीय दल के नेता, मुख्य सचेतक भी मनोनीत किए गए हैं। क्या हम इन्हें एनसीपीआई के सांसद मानें? लोकतंत्र तो ऐसी गवाही नहीं देता, बेशक स्पीकर ने मान्यता दे दी है। स्पीकर के सामने इन बागी सांसदों को ‘अयोग्य’ करार देने की याचिका अब भी विचाराधीन है। स्पीकर भी तो भाजपा के निर्वाचित सांसद हैं, लिहाजा उनकी राजनीतिक निष्ठाओं की परीक्षा होती रहती है। आप उन्हें बिल्कुल ‘तटस्थ’ नहीं मान सकते। बहरहाल चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में ये सवालिया सांसद तृणमूल कांग्रेस के ‘विजयी सांसद’ हैं, जिन्हें पार्टी अध्यक्ष ममता बनर्जी ने अधिकृत पत्र देकर प्रत्याशी बनाया था। चुनाव में उन्हें जनादेश मिला, तो जून 2024 से अभी जुलाई, 2026 तक वे तृणमूल सांसद ही थे। कितनी भी बगावत कर लें अथवा दलबदल कर लें, लेकिन जनादेश तृणमूल प्रतिनिधि को ही दिया गया था। बेशक जनता हिसाब कर लेगी! सवाल यह है कि ऐसे लोकतांत्रिक यथार्थ को कैसे बदला जा सकता है? सर्वोच्च अदालत के पांच न्यायाधीशों, तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश जस्टिस चंद्रचूड़ समेत, ने भी दलबदल पर जो फैसला दिया था, उसका उल्लंघन तो ‘असंवैधानिक’ है। क्या स्पीकर ऐसे फैसले को नजरअंदाज कर सकते हैं? बेशक स्पीकर का निर्णय भी बेहद महत्वपूर्ण है और उसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है, लेकिन अदालतें भी लेट-लतीफ हैं। एनसीपी और शिवसेना के मामले करीब चार साल बाद अब भी सर्वोच्च अदालत में लटके हुए हैं। राजनीतिक दल क्या कर सकते हैं? यदि सत्र के दौरान संसद में इस नाजुक मुद्दे पर कोई साझा निष्कर्ष सामने आ जाए, तो देशहित में ही होगा। यह चिंताजनक है कि दलबदल अब पहले से भी ज्यादा संख्या में हो रहा है, जिससे लोकतंत्र कमजोर हो रहा है।




