यह ‘रामद्रोह’ है

अयोध्या के राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव एवं विहिप के उपाध्यक्ष चंपत राय बंसल को, अंतत:, इस्तीफा देना पड़ा। अनिल मिश्रा ने भी ट्रस्ट सदस्य के तौर पर इस्तीफा दे दिया है। प्रभु श्रीराम की प्रतिमा प्राण-प्रतिष्ठा के जो अनुष्ठान किए गए थे, अनिल मिश्रा और उनकी पत्नी ने ‘यजमान’ की भूमिका निभाई थी। ऐसा व्यक्ति ‘पतित’ कैसे हो सकता है? बहरहाल ट्रस्ट की बैठक 11 जुलाई घोषित की गई है, जिसमें इन इस्तीफों पर विचार किया जाएगा। इस्तीफे स्वीकार किए जाएंगे अथवा नहीं, यह फिलहाल असमंजस है। राम मंदिर के भीतर जो चोरी-डकैती की गई है, वह ‘महापाप’ या ‘महाडकैती’ ही नहीं, बल्कि ‘रामद्रोह’ है। यह देशद्रोह से भी जघन्य अपराध है, गंभीर है, संवेदनशील है, क्योंकि करोड़ों आस्थाओं को लूटा गया है। एक संगठित गिरोह के तौर पर उन्होंने ही प्रभु राम के दान-चढ़ावे को लूटा है, जिनके चेहरों पर ‘राम सेवक’ के मुखौटे थे। उनमें से अधिकतर न्यायिक हिरासत में जेल के भीतर हैं, लेकिन आंशिक तौर पर…क्योंकि पुलिस ने उनकी रिमांड ही अदालत से नहीं मांगी है। पुलिस भी विशेष जांच टीम की अंतरिम रपट को ही पूर्ण साक्ष्य मान रही है, लिहाजा जेलगामी ‘राम सेवक’ जमानत पर भी बाहर आ सकते हैं! ये हिरासतें ‘छोटी मछलियों’ की हैं। आश्चर्य है कि न तो विशेष जांच टीम की कथित रपट में और न ही प्राथमिकी में चंपत राय और अनिल मिश्रा सरीखी ‘बड़ी मछलियों’ के नाम, आरोपितों की जमात में, दर्ज किए गए हैं। करोड़ों के जमीन-सौदों के दस्तावेजों पर चंपत राय और अनिल मिश्रा के ही दस्तखत हैं। तो फिर ये चेहरे आरोपित क्यों नहीं हैं? मामला निष्ठाओं का नहीं, नीयत का है और साक्ष्यों का है।
इनकी जवाबदेही क्यों नहीं है? मंदिर का ट्रस्ट क्या प्रधानमंत्री दफ्तर को ब्यौरे देने से इंकार कर सकता है? ट्रस्ट केंद्र सरकार ने ही गठित किया था। राम मंदिर के ऐसे ट्रस्ट को अभी तक भंग क्यों नहीं किया गया? क्योंकि चंपत राय मूलत: संघ के प्रचारक रहे हैं और प्रधानमंत्री मोदी भी संघ के प्रचारक थे! क्या चंपत राय, अनिल मिश्रा, नृपेन्द्र मिश्रा से लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ही राम मंदिर के ठेकेदार हैं? पहरेदार हैं? क्या प्रभु राम इनकी ही बपौती हैं? करोड़ों रुपए की चोरी-डकैती के आरोप हैं, खरीदी गई जमीनों में घपले के सवाल हैं, चंपत राय ट्रस्ट के सर्वेसर्वा रहे हैं, तो उन्हें आरोपित क्यों नहीं बनाया गया? शक तो यह भी है कि इनके जरिए ‘और बड़ी मछलियां’ बेनकाब हो सकती हैं! बहरहाल अब ट्रस्ट स्तब्ध, आहत, दुखी महसूस कर रहा है। ट्रस्ट ने प्रेस विज्ञप्ति जारी की है, जो न तो लेटरहेड पर है और न ही किसी अधिकृत पदाधिकारी के हस्ताक्षर हैं। अलबत्ता ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरि का नाम जरूर टंकित किया गया है। ट्रस्ट का आरोप है कि कुछ असामाजिक, अधार्मिक, स्वार्थी तत्त्वों ने सनातन पर लांछन लगाने की कोशिश की है। ये लांछन नहीं, यथार्थ है, क्योंकि आम रामभक्तों न सवाल उठाए हैं। कमोबेश 79.85 लाख रुपए से अधिक की नकदी तो बरामद की गई है। वे लुटेरे तो ‘राम सेवक’ कहे जाते थे! ट्रस्ट ने विज्ञप्ति के जरिए उन दानदाताओं को आश्वस्त करने का प्रयास किया है, जिन्होंने 200 किलो, 60 किलो की चांदी की ईंटें, काकभुशुंडी की चांदी की प्रतिमा, सोने-हीरे के आभूषण, प्रभु की चरण-पादुका आदि भगवान राम को अर्पित की थीं। उद्धव ठाकरे ने भी 4 किलो चांदी की ईंटें और 1 करोड़ रुपए नकद राम मंदिर में दान दिए थे। सवाल है कि किसी को भी रसीद क्यों नहीं दी गई? दानदाता के साथ फोटो खिंचवाने से इंकार क्यों किया गया? अब यदि ये दान सुरक्षित और उपलब्ध हैं, तो उनकी फोटो सार्वजनिक क्यों न की जाए? यह तथ्य भी सामने आया है कि मंदिर में 40 दिनों के अंतराल में 70 बार चोरी-डकैती की गई। कितना संगठित और साजिशकार गिरोह रहा होगा? बहरहाल ट्रस्ट ने ही खुलासा किया है कि अभी तक राम मंदिर में 4575 करोड़ रुपए का कुल दान, चढ़ावा आया है। उसमें से 2475 करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं। क्या इसका कोई अधिकृत ऑडिट कराया गया है? विपक्ष इस मसले को खूब जोर-शोर से उठा रहा है। सरकार ने विपक्ष को बोलने का मौका खुद ही दे दिया है। जल्द होने वाले चुनावों में विपक्ष इस मसले पर सरकार को घेरने की पूरी कोशिश करेगा।




