संपादकीय

टैरिफ की चुनौतियां : नए बाजारों तक पहुंच बनाता भारत

सरकारी निकायों द्वारा गैर शुल्क बाधाओं संबंधी समाधान के लिए उपयुक्त मार्गदर्शन देना होगा। इसके साथ-साथ एफटीए के तहत निर्यात बढ़ाने के लिए उत्पादन की गुणवत्ता सुधारने और कारोबार की सुगमता के लिए भी अधिक प्रयास करने होंगे। उम्मीद करें कि ट्रंप टैरिफ की चुनौतियों के बीच एफटीए भारत के निर्यात और निवेश के लिए मील का पत्थर साबित होंगे।

 इस समय भारत तेजी से नए मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए), नए व्यापार गठबंधनों और नए निर्यात बाजारों में कदम बढ़ाने की रणनीति के साथ आगे बढ़ रहा है। इस कड़ी में बीते एक अक्टूबर से भारत और चार यूरोपीय देशों आइसलैंड, स्विट्जरलैंड, नार्वे और लिस्टेंस्टिन के समूह यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन (एफ्टा) के बीच एफटीए लागू हो गया है। इस व्यापार समझौते पर पिछले साल हस्ताक्षर किए गए थे, लेकिन प्रक्रिया संबंधी औपचारिकताओं के कारण यह समझौता अब लागू हुआ है।

वस्तुतः मुक्त व्यापार समझौता दो या दो से अधिक देशों के बीच एक ऐसी व्यवस्था है, जहां वे साझेदार देशों से व्यापार की जाने वाली वस्तुओं पर सीमा शुल्क को खत्म कर देते हैं या कम करने पर सहमत होते हैं। एफ्टा देशों के साथ यह समझौता भारत द्वारा अलग-अलग देशों और क्षेत्रीय समूह के साथ किया गया 14वां व्यापार समझौता है। यह मोदी सरकार के समय किया गया पांचवां व्यापार समझौता है। इससे पहले भारत ने मारीशस, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), आस्ट्रेलिया और ब्रिटेन के साथ एफटीए किए हैं।

भारत और एफ्टा देशों के बीच लागू हुआ यह व्यापार समझौता यूरोप के एक महत्वपूर्ण आर्थिक ब्लाक के साथ भारत के विदेश व्यापार को नई दिशा देगा। इस समझौते के तहत भारत ने एफ्टा देशों की 80-85 प्रतिशत वस्तुओं पर शुल्क शून्य किया है। इसके बदले में भारत को 99 प्रतिशत वस्तुओं पर शुल्क-मुक्त बाजार तक पहुंच मिलेगी। जहां कृषि, डेरी, सोया एवं कोयला सेक्टर को इस व्यापार समझौते से दूर रखा गया है, वहीं उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआइ) स्कीम से जुड़े सेक्टर के लिए भी भारतीय बाजार को नहीं खोला गया है।

यह भी महत्वपूर्ण है कि ग्रीन एवं विंड एनर्जी, फार्मा, फूड प्रोसेसिंग, केमिकल्स के साथ उच्च गुणवत्ता वाली मशीनरी के क्षेत्र में एफ्टा देश भारत में निवेश करेंगे, जिससे इन सेक्टरों में हमारा आयात कम होगा और भारतीय उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ाने में मदद भी मिलेगी। भारत के हिसाब से इस व्यापार समझौते का सबसे बड़ा लाभ एफ्टा देशों से मिली निवेश प्रतिबद्धता है। अब यह समझौता लागू होने के बाद आगामी 10 वर्षों के भीतर एफ्टा देशों से भारत में 50 अरब डालर का निवेश और अगले पांच वर्षों में अतिरिक्त 50 अरब डालर निवेश की उम्मीद है।

इससे 15 वर्षों में भारत में 10 लाख प्रत्यक्ष नौकरियों के सृजन की आस है। बहरहाल भारत ने ऐसा पहला समझौता किया है, जिसमें बाजार तक पहुंच निवेश से जुड़ी हुई है। वित्त वर्ष 2024-25 में एफ्टा देशों को भारत ने 1.97 अरब डालर मूल्य का वस्तु निर्यात किया और 22.44 अरब डालर का आयात किया। इन देशों में स्विट्जरलैंड भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। यद्यपि अभी एफ्टा के साथ भारत व्यापार घाटे की स्थिति में है, लेकिन अब नए व्यापार समझौते से एफ्टा देशों के साथ भारत के विदेश व्यापार का परिदृश्य भारत के लिए अनुकूल होने की संभावना है।

खासतौर से इस समझौते से डिजिटल व्यापार, बैंकिंग, वित्तीय सेवा, फार्मा, टेक्सटाइल जैसे सेक्टरों में इन चार देशों के बाजार में भारत की पहुंच आसान होगी। इस समझौते से भारतीय निर्यातकों के लिए यूरोप के बड़े बाजार में पहुंच सुनिश्चित हो सकेगी। उल्लेखनीय है कि हाल में भारत और ब्रिटेन के बीच भी एफटीए हुआ है। भारत और ओमान के बीच एफटीए पर बातचीत पूरी हो चुकी है और शीघ्र ही इस पर हस्ताक्षर होने की उम्मीद है। इतना ही नहीं, इस वर्ष के अंत तक यूरोपीय यूनियन के साथ भी एफटीए लागू होने की पूरी संभावना है।

यह भी महत्वपूर्ण है कि अमेरिका द्वारा 50 प्रतिशत टैरिफ लगाए जाने के बाद भारत ने रूस और चीन के साथ आर्थिक-वैश्विक कूटनीति और नए निर्यात बाजारों में आगे बढ़ने की जो रणनीति अपनाई, वह कारगर दिखाई दे रही है। इस नीति से ट्रंप टैरिफ के बीच पिछले अगस्त और सितंबर माह में अमेरिका को छोड़कर अन्य देशों में भारत के निर्यात बढ़े हैं। कल तक भारत को डेड इकोनमी बताने वाले ट्रंप ने अब अपना तेवर बदलते हुए भारत के साथ व्यापार समझौते को शीघ्र पूरा करने के संकेत दिए हैं। यह भारत की आर्थिक-कूटनीतिक जीत है। अब अमेरिका के साथ व्यापार समझौते का अनुकूल परिदृश्य उभरकर दिखाई दे रहा है। इससे संभावना जताई जा रही है कि भारत पर रूसी तेल खरीद पर लगाए गए अतिरिक्त टैरिफ को अमेरिका वापस ले सकता है।

अमेरिका के अलावा भारत कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, न्यूजीलैंड, इजरायल, गल्फ कंट्रीज काउंसिल सहित अन्य प्रमुख देशों के साथ भी व्यापार समझौता करने जा रहा है। भारत को यह ध्यान रखना होगा कि एफटीए तभी लाभकारी होते हैं, जब वे सही तरीके से इस्तेमाल में लाए जाएं। इसके लिए सरकार को निर्यातकों और छोटे व्यवसायियों को नए बाजारों के लाभ से संबंधित पर्याप्त जानकारी देकर नए मौकों का फायदा उठाने के लिए जागरूक बनाना होगा।

सरकारी निकायों द्वारा गैर शुल्क बाधाओं संबंधी समाधान के लिए उपयुक्त मार्गदर्शन देना होगा। इसके साथ-साथ एफटीए के तहत निर्यात बढ़ाने के लिए उत्पादन की गुणवत्ता सुधारने और कारोबार की सुगमता के लिए भी अधिक प्रयास करने होंगे। उम्मीद करें कि ट्रंप टैरिफ की चुनौतियों के बीच एफटीए भारत के निर्यात और निवेश के लिए मील का पत्थर साबित होंगे।

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