शर्तों की मोहताज संसद

संसद के मानसून सत्र के पांच दिन बीत चुके हैं। कोई काम नहीं, कोई चर्चा नहीं, सिर्फ हंगामा और नारेबाजी…! संसदीय व्यवस्था के अनुसार, 45 करोड़ रुपए से अधिक फुंक चुके हैं। यह किसी सरकार, विपक्ष या आंदोलनकारी की राशि नहीं थी। करदाता ने दी थी, ताकि संसद चल सके। संसद के पटल पर सिर्फ वे कागजात या रपटें रखी जा सकी हैं, जिनकी औपचारिकता विधायी तौर पर अनिवार्य होती है। स्पीकर, सभापति और पीठासीन अधिकारी आसन पर आकर बैठते हैं, विपक्ष के हंगामा करते सांसदों को ‘उपदेश’ देते हैं, अंतत: सदन की कार्यवाही दिन भर के लिए स्थगित करनी पड़ती है। विपक्ष और प्रदर्शनकारी बखूबी जानते हैं कि यदि बर्फ पिघलेगी और कोई समाधान निकलेगा, तो वह सिर्फ और सिर्फ संसद में चर्चा के बाद ही निकलेगा। प्रधानमंत्री मोदी ने गुरुवार, 23 जुलाई, देर रात फास्ट टै्रक कोर्ट बिल के मसविदे की घोषणा की है और शिक्षा मंत्रालय के दो शीर्ष, सचिव स्तर के अधिकारियों के तबादले किए हैं। अब कैबिनेट की स्वीकृति के बाद विधेयक संसद में आना है। संसद में ही उसे पारित किया जा सकता है और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद वह कानून बन सकता है। यदि संसद की कार्यवाही नहीं चल पाई, तो फास्ट टै्रक कोर्ट का बिल और माफिया को जल्द और कठिन दंड और असंभव-सी जमानत वाला कानून लटक कर रह जाएगा। सडक़ों पर नारेबाजी और हुड़दंग मचाने से कोई भी विधायी व्यवस्था नहीं बन सकती। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और लगभग समूचे विपक्ष की यह शर्त है कि पहले शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा लिया जाए अथवा प्रधानमंत्री उन्हें बर्खास्त करें। उसके बाद ही संसद में चर्चा संभव है। जंतर-मंतर पर बीते 35 दिनों से प्रदर्शन कर रहे युवाओं की भी यही शर्त है।
बहरहाल हर सड़किया प्रदर्शनकारी की शर्तों के मुताबिक, न तो संसद चलती है और न ही बहस की दिशा और आधार तय होते हैं। इस देश में संसद और आंदोलनकारी दोनों ही स्वतंत्र हैं। शुक्रवार, 24 जुलाई, की सुबह एक सुखद खबर मिली कि देर रात करीब 12.40 बजे सोनम वांगचुक ने 26 दिन से जारी अपना अनशन तोड़ दिया। केंद्रीय मंत्रियों-जेपी नड्डा और डॉ. जितेन्द्र सिंह-ने ‘मेदांता’ अस्पताल जाकर उन्हें जूस पिलाया और यूं वांगचुक का अनशन टूटा। अब उन्हें प्रदर्शन कर रहे युवाओं का आह्वान करना चाहिए कि आंदोलन समाप्त करो, सरकार के आश्वासन पर भरोसा कर कुछ समय दो, लेकिन वांगचुक ने ऐसा नहीं किया है, हालांकि आंदोलनरत कॉकरोचों ने अनशन तोडऩे को बड़ी राहत माना है। बहरहाल शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की शर्त वांगचुक और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की नहीं है। वे बेहतर शिक्षा-व्यवस्था और पेपरलीक सरीखे राष्ट्रीय मुद्दे पर संसद के भीतर सकारात्मक चर्चा के पक्षधर हैं। मंत्री का इस्तीफा तो कभी भी हो सकता है, लेकिन सरकार के विरोध में सबसे बुलंद और शर्तनुमा आवाज राहुल गांधी की है, क्योंकि उनके पास कांग्रेस के 98 सांसदों का ‘समर्पित समर्थन’ है। विपक्ष की भी मजबूरी है कि उनके साथ ही चले। नतीजा यह है कि संसद विभिन्न पक्षों की शर्तों की मोहताज लग रही है। संसद में कई-कई दिन लबे हंगामे और गतिरोध तब भी होते थे, जब भाजपा विपक्ष में थी, लेकिन महिला आरक्षण सरीखे बेहद संवेदनशील और राष्ट्रीय महत्व के बिलों, मुद्दों पर भाजपा नेे कांग्रेस नेतृत्व की यूपीए सरकार को समर्थन भी दिया था।
क्या अब अपेक्षा की जानी चाहिए कि सोमवार, 27 जुलाई, या उसके बाद जब भी प्रधानमंत्री मोदी की ‘दृष्टि’ वाला फास्ट टै्रक कोर्ट बिल संसद में पेश किया जाएगा, तो विपक्ष उसे पारित कराने में सहयोग करेगा? लेकिन एक और भयानक चुनौती देश देख-महसूस कर रहा है कि युवा, हम छात्र कहने की गलती नहीं कर सकते, आंदोलित और आक्रोशित होने के बाद अब चाकूबाज, पत्थरबाज के तौर पर हिंसक भी होता जा रहा है। वांगचुक ने भी माना है कि आंदोलन, प्रदर्शन की आड़ में कुछ असामाजिक तत्त्व हिंसा भडक़ा रहे हैं। जिन्होंने बीते 2-3 दिनों में जमकर हिंसा की है, आईपीएस अधिकारियों पर जानलेवा हमले किए हैं, पेट्रोल पंप पर हिंसा की है, निजी वाहन जला दिए हैं, क्या उनका सरोकार शिक्षा तथा पेपरलीक हो सकते हैं? क्या यह युवा आंदोलन नेतृत्वहीन है? इन पहलुओं पर भी विचार करना चाहिए। दूसरी ओर आंदोलित सोनम वांगचुक ने अनशन तोड़ दिया है। उन्होंने एक बयान दिया था कि अगर सरकार इस मामले में ठोस आश्वासन देती है, तो वह अनशन तोड़ देंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की है कि पेपर लीक मामलों में अपराधियों को कड़ा दंड देने के लिए नया कानून लाया जाएगा। साथ ही यह भी आश्वासन दिया है कि इस मामले में दोषी लोगों पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई होगी। इसी के बाद यह अनशन तोड़ा गया है।




