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मुद्दा विहीन आंदोलन समाप्त हो जाता है

आजादी  से पहले और बाद में आंदोलन, हड़ताल, अनशन और धरना प्रदर्शन का लंबा इतिहास है। इनमें से अनेक देश या राष्ट्र भक्ति और जनसेवा के चोले में भ्रमजाल फैलाने और अपने निजी स्वार्थ की पूर्ति के लिए वास्तविकता पर परदा डालने से अधिक न होने से बेअसर रहे।

कच्चा चिट्ठा : दुनिया ने आंदोलन से शिक्षा सुधार, रोजगार सृजन, सामाजिक न्याय और आर्थिक मजबूती पाई और हमने नारे गढ़े और नेता पैदा किए जिसका परिणाम है कि आज़ादी के 77 साल बाद भी एक ही सवाल पर अटके हैं : सड़क पर सबसे तेज आवाज किसकी है और सबसे पीछे कौन खड़ा है, गलाफाड़ नारे सबसे ऊंचे स्वर में कौन लगा सकता है! चाहे स्कूल, अस्पताल और रोजगार की लाइन सबसे लंबी हो। जिन्होंने आंदोलन से ‘व्यवस्था’  बदली, उन्हें याद रखा गया, जिन्होंने इससे ‘पहचान’ जोड़ी, वो वहीं रह गए। 80 साल में दुनिया में तीन सौ के लगभग बड़े आंदोलन हुए जिनमें से दो तिहाई सफल आंदोलन ‘रोटी-कपड़ा-मकान-शिक्षा-रोजगार’ पर हुए। भारत में पचास से अधिक बड़े आंदोलन हुए लेकिन अधिकतर ‘आरक्षण-धर्म-भाषा-पहचान’ पर हुए। 

बापू गांधी के बाद जॉर्ज फर्नांडीज की रेल हड़ताल, जे.पी. की समग्र क्रांति और अन्ना हजारे का व्यवस्था परिवर्तन उल्लेखनीय है। इनसे जो हासिल हुआ उसे सत्तालोभी नेताओं ने लील लिया और त्याग, बलिदान तथा उद्देश्यों पर काली स्याही फेर दी। हालांकि इनके असर से सरकार ने नए कानून बनाए लेकिन आधे अधूरे मन से लागू किए जैसे कि आरटीआई जो केवल जवाब देने तक सिमट गया, लोकपाल नियुक्ति करने पर रुक गया और किसान आंदोलन अधिकतर सही कृषि कानूनों को रद्द करवा कर समाप्त हो गया। सरकार से सीधी बात, लाठी से कंट्रोल में बदली, भीड़ वाली मानसिकता बढ़ी और मुद्दे वाले आंदोलन भी धमाचौकड़ी सिद्ध हुए। रोज बदलती मांग, गालियों का मंच और नेतागिरी चमकाने का मौक़ा सिर्फ़ सवाल उठाने, स्पष्ट न होने से हुड़दंग करने और जनता के लिए अपने दैनिक कामों में अड़चन से किसी की सहानुभूति न होने से आम जनता द्वारा भुला दिया गया।

कड़वा सच है कि हमारा खुफिया तंत्र या तो इतना कमजोर है कि उसे कोई अनुमान नहीं होता कि किस घर में कौन सी खिचड़ी पक रही है और कौन कानून की धज्जियां उड़ाकर अव्यवस्था फैलाने की साजिश कर रहा है या फिर सरकार उसकी बातों को हवा हवाई कर रही है? इसके अतिरिक्त समय रहते पुलिस और प्रशासन तथा मंत्रिमंडल कोई कदम क्यों नहीं उठा पाते ताकि हालात बदतर न होने पाएं। जब चिडिय़ा खेत चुग कर फुर्र हो जाती है तब इनकी आंख क्यों खुलती है ? इसका कारण यह है कि गृह मंत्रालय कुम्भकर्ण की नींद सोता है और तब ही जागता है जब शोर होता है और अराजकता फैल जाती है। 

जिम्मेदारी किसकी? : देश कोई मूर्ति नहीं बल्कि जीते जागते नागरिकों का सम्मान सहित जीवन है। शिकायती टट्टू नहीं, सुझाव या हल के साथ अपनी बात रखना ही परिणाम दिखाता है। आंदोलन से सरकार बदल सकती है लेकिन अनुशासन से देश बनता है। ऊल जलूल सवाल, अपने को कानून और मर्जी को विरासत समझने की आदत न गई तो जमाने को भूलने में वक्त नहीं लगता। समझना होगा कि आंदोलन लोकतंत्र का इंजन है जिस से गाड़ी चलती है और एक्सीडैंट भी होता है। 

सवाल है-दुनिया ने आंदोलन से तरक्की की, भारत क्यों पीछे रह गया? अन्य देशों से तुलना करें तो दक्षिण कोरिया को शिक्षा, उद्योग, भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन मिला तो आज 10वीं अर्थव्यवस्था, जापान का छात्र आंदोलन टैक्नोलॉजी आधारित ताकत बना। ताइवान लोकतंत्र, प्रैस की आजादी और दुनिया की सबसे बड़ी चिप फैक्ट्री बनाने में सफल हुआ। अमरीका नागरिक अधिकार, वियतनाम में जलवायु पर फोकस और इस सब के विपरीत भारत में दुनिया की सबसे बड़ी युवा शक्ति, 65 प्रतिशत लोग 35 साल से कम होने पर भी गरीबी, बेरोजगारी, आवास, शौचालय, बिजली, पानी, सड़क जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रहे हैं। शिक्षा का बजट ऐसा हो जिससे प्रत्येक व्यक्ति शिक्षित होकर अपने पैरों पर खड़ा हो और पेपर लीक और नकल पर लगाम लगाने के लिए आंदोलन की नौबत न आए। 

वक्त की रफ्तार : आधुनिक टैक्नोलॉजी संपन्न देश में बहस सबसे पहले संसद में ही हो और किसी को जनता के टैक्स के पैसे को बर्बाद करने का अधिकार न हो। कार्रवाई का सीधा प्रसारण तो होता ही है। दर्शकों को तय करने दें कि किसका पक्ष सही है, यह नहीं कि संसद को चलने ही न दें। दूसरा जब टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर अपनी बात कहने की सुविधा है तो सड़क पर संग्राम क्यों हो? तीसरा अराजक तत्वों का भीड़ में घुसकर हिंसा और तोडफ़ोड़ न रोक सकने वाले पुलिस और सुरक्षा बलों और गृह मंत्रालय के अधिकारियों पर तुरंत कार्रवाई हो। चौथा इस्तीफा मांगने के पीछे पर्याप्त कारण और उस व्यक्ति से क्यों मांगा जा रहा है, इसका विश्लेषण हो। 

वक्त का पहिया बहुत तेज़ी से घूमता है और संसार गवाह है कि धुरंधर और सर्वगुणसम्पन्न लेकिन अंदर से भयभीत नेतागण एक पल में गधे के सींग की तरह लुप्त हो जाते हैं। इसलिए जो हकीकत न समझे वह सबसे बड़ा अनाड़ी है और उसे अधिक खिलवाड़ करने से न रोका गया तो समझिए कि आधुनिक प्रलय निश्चित है जिसका वर्णन किसी ग्रंथ में नहीं है लेकिन अटूट सत्य यही है। देश तब प्रथम होगा जब 140 करोड़ नागरिक प्रथम होंगे।-पूरन चंद सरीन

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