नीति आयोग के ‘बंजर’ युवा

नीति आयोग की नई रपट आई है-‘विकसित भारत 2047 के लिए कौशल की पुनर्कल्पना।’ रपट में शिक्षा, रोजगार, युवा और उसकी उत्पादकता आदि पर ऐसे खुलासे किए गए हैं, जिनसे लगता है कि हमारी अधिकतर युवा जमात ‘बंजर’ है! वह देश के कार्यबल का हिस्सा नहीं है। बेशक बेरोजगारी एक भयानक समस्या है, लेकिन शिक्षा पर भी कई सवालिया निशान हैं। रपट के मुताबिक, 15-29 साल के आयु-वर्ग के 8.70 करोड़ युवा ऐसे हैं, जो न तो पढ़ रहे हैं, न काम कर रहे हैं और न ही कोई टे्रनिंग ले रहे हैं। उनमें से करीब 58 फीसदी घरेलू काम में व्यस्त हैं। यानी घर पर बैठे हैं, जबकि यह उम्र सर्वाधिक ‘उर्वर’ मानी जाती है। इनसान काम करता है और अपने तथा देश के लिए संसाधन पैदा करता है। उसे ही ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ माना जा सकता है। देश की 65 फीसदी आबादी की उम्र 35 साल से कम है, सिर्फ यही ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ का आधार नहीं हो सकता। रपट के मुताबिक, 8.25 फीसदी युवा स्नातकों को ही उनकी शिक्षा और डिग्री के अनुकूल काम मिल पाता है। शेष की पढ़ाई को नौकरी के लायक नहीं समझा जाता, लिहाजा यह उद्योगपतियों और नियोक्ताओं के लिए भी भारी समस्या है कि युवा हुनरमंद नहीं है। उनकी डिग्री महज ‘कागज का टुकड़ा’ है। बेरोजगार स्नातक 13 फीसदी हैं, जबकि महिला स्नातकों में बेरोजगार 20.4 फीसदी हैं। देश का कुल कार्यबल (काम करने वाले) 65.4 करोड़ है। सिर्फ 14.19 फीसदी को ही नियमित वेतन या मजदूरी नसीब है। गैर-कृषि क्षेत्र में करीब 27 करोड़ लोगों को सामाजिक सुरक्षा हासिल नहीं है। सबसे डरावना और सवालिया आंकड़ा यह है कि केंद्र सरकार में 8,23,556 सरकारी पद खाली पड़े हैं। सरकार इन पदों पर भर्तियां क्यों नहीं करती? यही हाल राज्य सरकारों का है, जहां लाखों सरकारी पद आज भी खाली पड़े हैं, लेकिन नौकरियां दी नहीं जा रही हैं। सरकारें आउटसोर्स करके ठेके पर नौकरियां देती हैं, ताकि अरबों का पेंशन का बोझ खत्म किया जा सके। यह भयावह सवालिया स्थिति है। रक्षा मंत्रालय में 2.41 लाख और रेलवे में 2.40 लाख से अधिक पद खाली हैं। क्या ऐसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण मंत्रालय पर्याप्त कार्यबल के बिना ही चलाए जा रहे हैं? यहां देश की सुरक्षा और गति-शक्ति का भी सवाल है। कदाचित यही कारण हैं कि देश के युवा, जेन-जी और जेन-अल्फा, उबल रहे हैं, आक्रोशित और आंदोलित हैं।
फिलहाल दिल्ली, भोपाल, पटना, रायपुर, लखनऊ, सागर (मप्र), सिरोही (राजस्थान) और महोबा (उप्र) आदि शहरों में युवा सडक़ों पर हैं। विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं, लाठियां खा रहे हैं, आंसू गैस झेल रहे हैं, पानी की तेज बौछार उनकी गति को लडख़ड़ा रही है। फिर भी वे अपने अधिकारों और व्यवस्था को बदलने के लिए लड़ रहे हैं। जब बाल-आयु में भैंस-गाय के तबेलों में स्कूल की कक्षाएं लगेंगी, मात्र 4 कमरों में 512 बच्चे ठूंस कर बिठाए जाएंगे, एक ही कथित अध्यापक सभी कक्षाओं को पढ़ाएगा, न स्वच्छ शौचालय, न पीने का पानी, न ही क्लास रूम में पंखे और डेस्क की व्यवस्था होगी, तो ऐसे स्कूल में पढऩे वाले बच्चे को क्या खाक शिक्षा और नौकरी हासिल होगी? जिन राज्यों में आने वाले महीनों में विधानसभा चुनाव होने हैं, वहां नौकरियां देने की घोषणाएं की जा रही हैं। मसलन-उप्र में आगामी 6 माह में एक लाख नौकरियां देने का ऐलान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किया है। उन्होंने स्कूलों के कायाकल्प के लिए 1871 करोड़ रुपए के फंड की भी घोषणा की है। इसी तरह राजस्थान सरकार ने भी 12,500 करोड़ रुपए के फंड की घोषणा की है। मप्र के बड़वानी में जेन जी ने 20 किलोमीटर लंबा जुलूस निकाला। ऐसे कई प्रयासों से जेन-जी ने सरकारों के खिलाफ हल्लाबोल के हालात पैदा कर दिए हैं। आश्चर्य यह है कि देश में सबसे अधिक बेरोजगारी-दर 36.2 फीसदी संघशासित लक्षद्वीप में है, जबकि राज्यों में सर्वाधिक बेरोजगारी-दर केरल और हरियाणा में है। नीति आयोग ने सिफारिश की है कि कौशल-प्रशिक्षण को उच्च शिक्षा के बाद का विकल्प मानने के बजाय स्कूली स्तर से ही शुरू किया जाना चाहिए। कक्षा 6-12 तक सामान्य रोजगार और उद्यमिता कौशल सिखाए जाने तथा कक्षा 9 से व्यावसायिक पाठ्यक्रम शुरू किए जाने चाहिए। शायद उनसे देश की सूरत बदल सकती है! यह भी सत्य है कि सभी युवाओं को सरकारी रोजगार नहीं दिया जा सकता। इसलिए प्राइवेट क्षेत्र में रोजगार सृजन के लिए सरकार को नवीन योजनाएं बनानी चाहिएं। अब हमें यह मानसिकता छोड़ देनी चाहिए कि रोजगार तो केवल सरकारी ही अच्छा होता है। प्राइवेट क्षेत्र में भी बड़ी संख्या में लोग काम करके अपने और अपने परिवार के लिए रोजी-रोटी कमा रहे हैं।




