संपादकीय

मौत की इमारतों की राजधानी

दिल्ली देश की राजधानी है अथवा मौत की इमारतों का महानगर है! यह इसलिए कहना पड़ रहा है, क्योंकि हाल ही में मालवीय नगर के एक ‘अवैध’, संकरे कथित होटल में अग्निकांड हुआ, जिसमें 22 जिंदगियां भस्म होकर राख बन गईं। कभी राजेन्द्र नगर में बारिश का पानी भर जाता है, उसमें करंट भी प्रवाहित होने लगता है, नतीजतन आधा दर्जन युवा छात्र अचानक लाश बन जाते हैं। वे आईएएस बनने का सपना लिए पढ़ाई कर रहे थे, लेकिन मौत ने सब कुछ छीन लिया। कभी लक्ष्मीनगर में हादसा हुआ और फिर युवा जिंदगियों पर विराम लग गया। इसी जुलाई में ही रोहिणी में इमारत गिरी, साकेत और करोल बाग में हादसे हुए। मुस्तफाबाद में 11 मौतें इससे पहले हो चुकी थीं। ये हादसे, मौतें नहीं, बल्कि हत्याएं हैं, क्योंकि बचने के बंदोबस्त ‘शून्य’ थे। और अब संभ्रांत कॉलोनी मोतीबाग के पास सत्य निकेतन में भी एक 5-मंजिला इमारत जमींदोज हो गई। रविवार रात तक 5 मौतों की पुष्टि की जा चुकी थी। तीन छात्र अस्पताल में जिंदगी-मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। मौतों की संख्या अधिक भी हो सकती है, क्योंकि 25-30 छात्रों के मलबे में दबे होने की आशंका जताई गई है। इन तमाम इमारतों में एक तथ्य साझा है कि सभी ‘अवैध’ थीं। न अग्निशमन विभाग का एनओसी, न नगर निगम का एनओसी, स्वीकृत मंजिलों से अधिक मंजिलों का निर्माण और कई इमारतें तो सालों पुरानी थीं, जिनका रखरखाव भी नहीं किया गया था। सत्य निकेतन वाली इमारत भी 36 साल पुरानी बताई गई है। उस पर विभाग ने सील लगा दी थी, लेकिन फिर न जाने कैसे, वह सील भी खुल गई और यह हत्याकांड हो गया। इस इमारत की तीन मंजिलें ‘अवैध’ थीं, क्योंकि उसे भूतल और पहली मंजिल बनाने की ही अनुमति दी गई थी, लेकिन भूतल के ऊपर भी चार मंजिलों का निर्माण कर लिया गया। दिल्ली नगर निगम के एक पूर्व चेयरमैन और फायर ब्रिगेड के पूर्व निदेशक ने चौंका देने वाला खुलासा किया है कि दिल्ली में करीब 75 लाख इमारतें हैं। उनमें से करीब 1.75 लाख इमारतों के नक्शे पास हैं। शेष सभी इमारतें अवैध और अतिक्रमण की हैं।

देश की राजधानी में 1731 अनधिकृत कॉलोनियां हैं। उनमें से 1511 को अधिकृत, नियमित करने के मद्देनजर पीएम-उदय योजना के तहत रखा गया है। एक पुख्ता वोट बैंक की तैयारी…लेकिन यह कितना भयावह यथार्थ है! यदि इन अवैध, अनधिकृत इलाकों में कोई इमारत भरभरा कर गिर पड़ती है, तो कल्पना कीजिए कि नुकसान कितना होगा? सरकार मुआवजा भी नहीं देगी। आखिर ये अनधिकृत कॉलोनियां कैसे उभर आईं? किसने इन्हें बनाया और सरकार में किन्होंने इनकी मदद की? ये इमारतें कांग्रेस, भाजपा और आम आदमी पार्टी की सरकारों के दौरान बनी होंगी, लिहाजा कोई एक चेहरा या पार्टी ‘खलनायक’ नहीं है। इस भ्रष्ट हम्माम में सभी नंगे हैं। बहरहाल दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ने अप्रैल, 2025 के बाद से 241.51 एकड़ जमीन पुन: वापस ली है या प्रक्रिया में है। इसके अलावा, 235 एकड़ से अधिक जमीन पर जो अतिक्रमण, अवैध कब्जे थे, उन्हें मुक्त कराने का अभियान भी तय किया गया है। एक अनुमान है कि 70-75 फीसदी दिल्ली में अवैध या अतिक्रमण वाले कब्जे या निर्माण हैं। झुग्गी-झोपडिय़ों पर बुलडोजर चला कर तो गरीबों को बेघर किया जा सकता है, लेकिन राजधानी में जो अतिक्रमणकारी फॉर्म हाउस हैं, उन पर निर्णायक, मिट्टी-मलबा करने वाली कार्रवाई क्यों नहीं की जाती? यदि कोई कार्रवाई की गई है, तो दिखावे के लिए कुछ आंशिक तोड़-फोड़ जरूर की गई है। बहरहाल सत्य निकेतन की जो इमारत गिरी है, उसमें डिब्बेनुमा कुछ कमरे बनाए गए थे, जिन्हें ‘हॉस्टल’ का नाम दिया गया था। एक कमरे में, एक बिस्तर का किराया 15,000-18,000 रुपए माहवार वसूल रहे थे। संकरे रास्ते, संकरी-एकतरफा सीढिय़ां और आपातकालीन बंदोबस्त ‘शून्य’ थे। ऐसी इमारत के बेसमेंट में, बरसात के मौसम में, भरे पानी की स्थिति में कुछ निर्माण-कार्य किया जा रहा था। ऐसे में नींव का एक पिलर खिसका और पूरी इमारत धड़ाम से धरती पर गिरी। इन कमरों में केरल, हरियाणा, उप्र और खासकर पूर्वोत्तर राज्यों के वे छात्र रहते थे, जो दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रहे थे।

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