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जी-20 से ब्रिक्स तक, भारत के ‘मानव-केंद्रित दृष्टिकोण’ का महत्व

अंतर्राष्ट्रीय संबंध अध्ययन का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है। पहले यह केवल कूटनीतिक इतिहास के अध्ययन तक सीमित था, लेकिन आज इसका प्रभाव कई अन्य विषयों पर भी है। इसने एक लंबा सफर तय किया है। इसका अध्ययन और प्रभाव केवल युद्धक्षेत्र तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण, पारिस्थितिकी और अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा है। पहले विश्व युद्ध से दूसरे विश्व युद्ध और फिर शीत युद्ध तक के इस सफर में, चिंता का एक अहम विषय कुछ विचारों का दबदबा और दूसरों की अनदेखी है। वैश्वीकरण शीत युद्ध के बाद के दौर की एक अहम पहचान बन गया।

सोवियत संघ का विघटन, बर्लिन की दीवार का गिरना और नव-उदारवाद का उदय उस समय की महत्वपूर्ण विशेषताएं बन गईं। हालांकि, समय के साथ सुधार लाने का अपना एक अनोखा तरीका होता है। वैश्विक शासन के मामले में भी ऐसा ही देखने को मिला। समय के साथ, वैश्वीकरण के विभिन्न पहलुओं में मानवीय पक्ष की कमी देखी गई। इसका मतलब यह नहीं है कि कोई आपस में जुड़ी हुई वैश्विक दुनिया नहीं चाहता। हालांकि, जब अर्थव्यवस्था, समाज, पर्यावरण और संस्कृति को सिर्फ मुनाफे के एजैंडे के हिसाब से ढाला जाता है, तो यह एक समस्या बन जाती है। यह समझना जरूरी है कि मुनाफा कमाना बुरी बात नहीं है, लेकिन यह शासन का एकमात्र पैमाना नहीं हो सकता।

संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के 75 साल पूरे होने से लेकर 2023 में जी-20 की अध्यक्षता और नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन तक, भारत ने हमेशा वैश्विक शासन में सुधार का महत्वपूर्ण आह्वान किया है। जी-20 समिट में ‘मानव-केंद्रित वैश्वीकरण’ से लेकर ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में ‘प्रतिनिधित्व, जवाबदेही और नियम-निर्माण’ पर ध्यान केंद्रित करने की बात तक, भारत ने ग्लोबल गवर्नैंस की गलतियों को सुधारने की अहम जरूरत पर बात की है। इसमें यह भी है कि ग्लोबल डिवैल्पमैंट के लिए किसी भी समस्या-समाधान के तरीके का आज के समय की वास्तविकताओं से जुड़ा होना जरूरी है। ब्रिक्स नई दिल्ली घोषणापत्र अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के लिए एक सुधारात्मक दृष्टिकोण पेश करने की सार्थक कोशिश करता है। शांति और सुरक्षा, विश्व व्यापार संगठन, कूटनीति और बातचीत पर ध्यान, परमाणु सुरक्षा आदि इस घोषणापत्र के महत्वपूर्ण ङ्क्षबदू हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि जी-20 से लेकर ब्रिक्स तक एक सक्रिय सदस्य होने के नाते, ‘लोगों पर केंद्रित दृष्टिकोण’ के विचार ने भारत को ‘मल्टी-अलाइनमैंट’ में ताकत और अहमियत दिलाई है।

इंसान को केंद्र में रखने वाला नजरिया जरूरी है क्योंकि बदलाव और गतिशीलता ही विकास की सच्चाई है। इंसानी पहलू की समझदारी ही किसी भी प्रक्रिया को जमीनी स्तर से जुडऩे की क्षमता देती है। तकनीकी तरक्की और दूसरे विकास हमेशा से इंसानी इतिहास का हिस्सा रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में ज्ञान के प्रमुख ढांचों ने मानवीय पहलू को नजरअंदाज किया। दूसरे विश्व युद्ध के बाद से दुनिया बहुत बदल गई है। आज के दौर में वैश्विक दुनिया के मुद्दे गतिशील हैं। राष्ट्रीय हित और शक्ति बहुआयामी हैं। ऐसे हालात में, लोगों पर केंद्रित दृष्टिकोण आॢथक लाभ हासिल करने की दिशा में काम करने के लिए बेहतर स्थिति प्रदान करता है। यही वजह है कि मतभेदों के बावजूद ईरान और यू.ए.ई. को एक ही मंच पर देखा गया। व्यापार बाधाओं को दूर करना, कौशल विकास को प्रोत्साहित करना, स्टार्ट-अप, इनोवेशन और आॢथक समझौतों पर काम करना और साथ ही लोगों पर केंद्रित दृष्टिकोण अपनाना भविष्य की बेहतर दुनिया के लिए बहुत फायदेमंद होगा।

वैश्विक शासन के लिए एक नए और अनोखे नजरिए की जरूरत है। लोगों को केंद्र में रखने वाले नजरिए और ‘मानवता सबसे पहले’ की भावना न केवल सभ्यतागत मूल्यों से जुड़ी है, बल्कि यह एक मजबूत भविष्य की ओर बढऩे का एक महत्वपूर्ण तरीका भी है। यह अतीत की गलतियों को सुधारने का एक अहम मौका देता है। यह सहयोग पर काम करने के लिए एक उपयोगी क्षेत्र पेश करता है। इसमें अलग-अलग हितों वाले पक्षों के बीच आम सहमति बनाने की क्षमता भी है।-डा. आमना मिर्जा  

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