
वर्ष 2013 में भी जब देश विदेशी मुद्रा भंडार संकट से गुजर रहा था, भारतीय रिजर्व बैंक के लगभग इसी प्रकार की विशेष स्वैप स्कीम के माध्यम से मात्र 85 दिनों में ही 34.3 अरब डॉलर जुटाए थे, जिनमें 26 अरब डॉलर एफसीएनआर के माध्यम से आए थे…
आठ जून से भारतीय रिजर्व बैंक ने एक विशेष स्वैप स्कीम की शुरुआत की और बैंकों को यह सुविधा दी कि इस स्कीम के तहत भारतवंशी यानी विदेश में भारतीय मूल के लोगों द्वारा भारतीय बैंकों में विदेशी मुद्रा जमा (3 वर्ष से 5 वर्ष की अवधि के लिए) को वर्तमान मूल्य से रिजर्व बैंक से स्वैप कर पाएंगे। यानी जिस मूल्य पर आज बैंक रिजर्व बैंक के पास जमा करेंगे, परिपक्व होने पर उसी मूल्य पर वे रिजर्व बैंक से विदेशी मुद्रा प्राप्त कर पाएंगे। इस स्कीम से प्रोत्साहित होकर बैंकों ने भारतवंशियों की जमाएं 6 से 7 प्रतिशत की ब्याज दर पर स्वीकार की, जिन पर पूर्व में केवल तीन से चार प्रतिशत ही ब्याज दिया जाता था। इसका कारण यह था कि रुपए में डॉलर के मूल्य बढऩे के जोखिम के लिए बैंकों को पहले हेजिंग करवानी पड़ती थी। हेजिंग की लागत समय-समय पर बदलती रही है, लेकिन वर्तमान समय में यह तीन प्रतिशत के आसपास है। इन विदेशी मुद्रा अनिवासी बैंक खातों पर अधिक ब्याज और दूसरी ओर भारतीय अर्थव्यवस्था, सरकार और बैंकों पर भरोसा, इन सभी कारणों से भारतवंशियों ने मात्र 3 महीने से भी कम समय में 127.2 अरब डॉलर जमा कर इतिहास रचा है। गौरतलब है कि वर्ष 2013 में भी लगभग इसी प्रकार की स्कीम के अंतर्गत मात्र 34.3 अरब डॉलर एकत्र हुए थे, जिनमें 26 अरब डॉलर एफसीएनआर के रूप में प्राप्त हुए। 2013 में यह स्कीम 85 दिनों तक खुली रही थी और 2026 की स्कीम भी 85 दिन चली, लेकिन इन 85 दिनों में एफसीएनआर खातों में कुल जमा 127.2 अरब डॉलर प्राप्त हुए, जबकि कुल प्राप्तियां 136.4 अरब डॉलर की रही। यानी 2026 में 2013 की तुलना में लगभग 4.9 गुना ज्यादा। हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक की स्कीम इस बार काफी सफल रही और उसके परिणाम भी दिखने शुरू हो गए हैं। लेकिन आर्थिक जगत के कुछ लोगों द्वारा इस स्कीम की आलोचना भी की जा रही है। आलोचकों का कहना है कि भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा बैंकों को हेजिंग लागत से मुक्त कर, वह भार स्वयं पर ले लिया है। जिसका खामियाजा रिजर्व बैंक को भविष्य में भुगतना पड़ेगा और जब ये जमाएं परिपक्व होंगी और डॉलर का मूल्य रुपयों में अधिक होगा तो नुकसान रिजर्व बैंक के लाभों को कम कर देगा। फलस्वरूप रिजर्व बैंक के लाभ कम होने से भारत सरकार की प्राप्तियां घट जाएंगी, जिससे बजट असंतुलन हो जाएगा।
क्यों सही नहीं हैं आलोचकों के तर्क : लोकतंत्र में नीतियों पर बहस एक स्वस्थ परंपरा है, लेकिन आलोचकों के तर्कों की सत्यता की पड़ताल भी उतनी ही जरूरी है, ताकि नीतियों को सही दिशा दी जा सके। रिजर्व बैंक की विशेष स्वैप स्कीम के लाभों पर चर्चा भी जरूरी है। फिर यह देखना होगा कि भविष्य में रिजर्व बैंक को इससे जिस संभावित नुकसान की चिंता की जा रही है, उसकी तुलना में इस योजना से कितना लाभ देश को होगा।
पूर्व में भी ऐसी स्कीम हुई थी सफल : वर्ष 2013 में भी जब देश विदेशी मुद्रा भंडार संकट से गुजर रहा था, भारतीय रिजर्व बैंक के लगभग इसी प्रकार की विशेष स्वैप स्कीम के माध्यम से मात्र 85 दिनों में ही 34.3 अरब डॉलर जुटाए थे, जिनमें 26 अरब डॉलर एफसीएनआर के माध्यम से आए थे। उस समय विदेशी विनिमय में भयंकर अनिश्चितता का माहौल था। इस स्कीम से पहले सामान्यत: करेंसी का जोखिम बैंकों को उठाना पड़ता था, इसलिए वे एफसीएनआर पर अत्यंत सीमित ब्याज दे पाते थे। 2013 की स्कीम के तहत रिजर्व बैंक ने बैंकों को यह गारंटी दी थी कि भविष्य में जब भी यह जमा 3 से 5 वर्ष के बीच परिपक्व होगी, रिजर्व बैंक उनसे 3.5 प्रतिशत वार्षिक ही वसूलेगा। इससे प्रोत्साहित होकर बैंकों ने ज्यादा ब्याज देकर एफसीएनआर जमाई बढ़ाने का प्रयास किया। वर्ष 2013-14 की अपनी वार्षिक रिपोर्ट में भारतीय रिजर्व बैंक ने यह स्वीकार किया था कि इस विशेष स्वैप स्कीम के तहत विदेशी मुद्रा भंडार बढऩे से रुपए को स्थिरता प्राप्त हुई। गौरतलब है कि वर्ष 2013 में सितंबर माह (जब यह स्कीम शुरू हुई थी) से पहले रुपए में तेजी से अवमूल्यन हो रहा था और अप्रैल 2013 से अगस्त तक रुपए का 16.2 प्रतिशत अवमूल्यन हो चुका था। लेकिन इस स्कीम और अन्य उपायों के फलस्वरूप विदेशी परिस्थितियों के बावजूद सितंबर 2013 से 31 मार्च 2014 के बीच रुपया 9.7 प्रतिशत मजबूत हुआ और हमारे विदेशी मुद्रा भंडार, जो अगस्त तक 275.5 अरब डालर था, जनवरी 2014 तक वो 292.1 अरब डालर तक पहुंच गया। समझना होगा कि 2013 की विशेष स्वैप स्कीम के कारण रुपए में मजबूती के फलस्वरूप भारत का पेट्रोलियम तेल और सोने की आयात लागत घटी। सरकारों और विदेशी ऋणों की अदायगी में लाभ हुआ, आयातित मुद्रास्फीति पर अंकुश लगा। विदेशों से पूंजी सस्ती हुई और चालू खाते पर दबाव घटा। इसलिए जो लोग रिजर्व बैंक द्वारा गारंटीशुदा कम स्वैप लागत की आलोचना कर रहे थे, उनके तर्क असत्य साबित हुए। और यदि रिजर्व बैंक द्वारा इस स्वैप स्कीम पर खर्च की तुलना, इस स्कीम के कारण देश पर आए विदेशी मुद्रा संकट से निजात, और देश को भारी लाभ से करें तो यह योजना लाभकारी ही मानी जाएगी। सबसे बड़ी बात तो यह थी कि भारतीय अर्थव्यवस्था, जिसे दुनिया की 5 सर्वाधिक कमजोर अर्थव्यवस्था में माना जा रहा था, उसे विदेशी मुद्रा संकट से बचाने में इस स्कीम की महती भूमिका रही।
वर्तमान विशेष स्वैप स्कीम और उसके फायदे : सर्वप्रथम, इससे रुपया मजबूती की ओर बढ़ रहा है। वर्तमान स्वैप स्कीम ऐसे समय में लाई गई जब विदेशी संस्थागत निवेश का लगातार बिकवाली कर सरकार द्वारा दबाव बना रहे थे कि उन्हें करों में रियायत दी जाए। सरकार को मजबूरी में कुछ रियायत देनी भी पड़ी थी। यही नहीं, युद्ध, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, तेल की बढ़ती कीमतों और अन्य वैश्विक कारणों से हमारा विदेशी व्यापार संतुलन बिगड़ रहा था, उस समय हमारा भारतीय रुपया लगातार कमजोर हो रहा था और वह 1 जनवरी 2026 में 89.50 रुपए प्रति डॉलर से कमजोर होते हुए 20 मार्च 2026 तक 96.96 रुपए प्रति डॉलर तक पहुंच चुका था। ऐसे में रुपए को स्थिरता से बचाने के लिए रिजर्व बैंक को भारी मात्रा में डॉलर बेचने पड़ रहे थे, जिनके कारण भारत में विदेशी मुद्रा भंडार का संकट मंडराने लगा था।
उन परिस्थितियों में रिजर्व बैंक ने विशेष स्वैप स्कीम के तहत 136.4 अरब डॉलर की प्राप्तियां, जिनमें 127.2 अरब डॉलर केवल एफसीएनआर बैंक जमा से मिले, डालरों के इस भारी अंतरप्रवाह के कारण, इस स्कीम के प्रारंभ से ही रुपया मजबूत होने लगा था। 5 सितंबर 2026 तक आते-आते यह 94.49 रुपए प्रति डॉलर तक पहुंच चुका था। मजबूत रुपए के स्वाभाविक लाभों के बारे में कोई संदेह नहीं है। दूसरे, ऐतिहासिक रूप से एफसीएनआर डिपॉजिट में एफपीआई निवेश की तरह उतार-चढ़ाव (वोलाटिलिटी) बहुत कम देखा जाता है। समझ से परे है कि जब आलोचकों को एफपीआई को ब्याज और कैपिटल गेन पर टैक्स छूट के रूप में लगातार फायदा देने में कोई दिक्कत नहीं होती, तो वे एफसीएनआर-बी को दी गई रियायतों को लेकर इतने चिंतित क्यों हैं? तीसरे, आरबीआई पर आने वाली लागत का मुद्दा है। आलोचक मान रहे हैं कि चूंकि आरबीआई की स्पेशल स्वैप व्यवस्था के तहत बैंकों को हेजिंग की लागत नहीं उठानी पड़ रही है, तो इसका मतलब है कि हेजिंग की लागत अब आरबीआई को उठानी पड़ेगी, जो असल में सही नहीं है। सच तो यह है कि ये डिपॉजिट विदेशी मुद्रा भंडार (फॉरेक्स रिजर्व) बढ़ाने में मदद करेंगे, जो आरबीआई के पास रहेगा, जिसे यदि अमरीकी फेडरल रिजर्व में जमा किया जाएगा तो उस पर 5 से 6 प्रतिशत ब्याज मिलेगा।
डा. अश्वनी महाजन




