अंतर्राष्ट्रीय

अमरीकी सामाजिक व्यवस्था प्रबंधन व शिकागो से नियाग्रा फॉल्स दर्शन

अमरीका आने का अनुभव केवल एक देश की यात्रा का अनुभव नहीं है। यह अपने साथ अनेक प्रश्न लेकर आता है। यहां की सड़कें, इमारतें, शहर, लोगों का रहन-सहन, काम करने का तरीका और सामाजिक व्यवस्था, हर चीज अपने आप में कुछ कहती दिखाई देती है। लेकिन मेरे लिए इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष केवल अमरीका को देखना ही नहीं, बल्कि अमरीका को भारतीय की दृष्टि से समझने का प्रयास करना रहा।

ऐतिहासिक आर्ट इंस्टीच्यूट आफ शिकागो पहुंचते ही स्वामी विवेकानंद जी का स्मरण हुआ, जहां 1893 में विश्व धर्म संसद के मंच से उन्होंने पूरी दुनिया को ‘सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका’ कहकर संबोधित किया था। उस संबोधन में केवल शब्द नहीं थे, बल्कि भारत के ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ यानी मानवता को एक परिवार के रूप में देखते हुए सहिष्णुता और विभिन्न धार्मिक परंपराओं के सम्मान का भाव था। विस्कोन्सिन, इलीनॉयस, मिशिगन, ओहायो, पैन्सिल्वेनिया, न्यूयार्क, इंडियाना राज्यों, शिकागो, रैसीन, केनोशा होते हुए जब नियाग्रा फॉल्स की यात्रा की तो अमरीका को केवल एक राज्य या शहर के रूप में नहीं, बल्कि एक व्यवस्था के रूप में देखने का अवसर मिला। लंबे रास्ते, व्यवस्थित सड़कें, ट्रैफिक का अत्यधिक अनुशासन, अलग-अलग स्थानों की अपनी विशेषता और सुव्यापक व्यवस्था से उनका जुड़ाव, ये बातें ध्यान आकॢषत करती हैं।

भारत तेजी से विकास कर रहा है। हमारे शहर बदल रहे हैं, सड़कें बन रही हैं, नई इमारतें खड़ी हो रही हैं और तकनीक का इस्तेमाल बढ़ रहा है। लेकिन भारत और अमरीका के अनुभव में एक अंतर कई जगह दिखाई देता है। अमरीका में किसी व्यवस्था के पीछे पहले से तय नियम, मानक और जिम्मेदारी का भाव अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। भारत में कई बार परिस्थितियों के अनुसार व्यवस्था को ढालने और तत्काल समाधान निकालने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। लेकिन लंबे समय की मजबूत व्यवस्था के लिए केवल ‘जुगाड़’ पर्याप्त नहीं हो सकता।
यहां लोगों का अपने काम और सार्वजनिक व्यवस्था के प्रति व्यवहार, सड़क पर नियमों का पालन केवल पुलिस के डर से नहीं, बल्कि सामान्य सामाजिक व्यवहार का हिस्सा दिखाई देता है। नागरिकों का व्यवहार भी विकास का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा है। 

अमरीका में अलग-अलग देशों और संस्कृतियों से आए लोग रहते हैं। भारतीय, चीनी, मैक्सिकन, यूरोपीय, अफ्रीकी और अनेक अन्य समुदाय यहां अपनी-अपनी पहचान के साथ जीवन जीते हैं। इसके बावजूद एक सांझी अमरीकी नागरिक पहचान बनाने का प्रयास दिखाई देता है। यह अनुभव भारत के लिए भी विचारणीय है कि अपनी मूल पहचान को बनाए रखते हुए एक व्यापक राष्ट्रीय पहचान को कैसे मजबूत किया जाए।

इसी यात्रा के दौरान रैसीन शहर में भारतीय गुजराती कम्युनिटी के गरबा कार्यक्रम व हिंदू मंदिर में गणेश विसर्जन में शामिल होने का अवसर मिला। वहां पहुंचकर लगा कि हजारों मील दूर अमरीका में रहते हुए भी भारतीय समाज ने अपनी परंपराओं और संस्कारों को जीवित रखा है। अमरीका में रहने वाले भारतीयों ने अपने बच्चों को आधुनिक शिक्षा और अमरीकी जीवन-पद्धति के साथ-साथ भारतीय त्यौहारों, भाषा, भोजन और संस्कारों से जोडऩे का प्रयास किया है। फिर यात्रा नियाग्रा फॉल्स की ओर बढ़ी। नियाग्रा फॉल्स प्रकृति का ऐसा दृश्य है जिसके सामने मनुष्य की बनाई हुई सारी भव्यता छोटी लगने लगती है। पानी की विशाल धार, उसकी आवाज, चारों ओर उठती फुहार और प्रकृति की शक्ति, यह सब देखकर मन कुछ देर के लिए शांत हो जाता है। यहां अमरीका और कनाडा की सीमा के आसपास विभिन्न देशों और समुदायों से आए लोगों को एक साथ घूमते, आनंद लेते और एक-दूसरे के साथ सहज व्यवहार करते देखना भी अपने आप में एक अनुभव था। अमरीका में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को काफी महत्व दिया जाता है। व्यक्ति अपनी पसंद, जीवनशैली और विचारों के अनुसार जीवन जीने का प्रयास करता है। लेकिन इसके साथ कानून और व्यक्तिगत जिम्मेदारी का संबंध भी दिखाई देता है। स्वतंत्रता तभी सार्थक होती है जब उसके साथ जिम्मेदारी जुड़ी हो।

अमरीका में व्यक्ति की स्वतंत्रता अधिक प्रमुख दिखाई देती है, जबकि भारत में परिवार और सामाजिक संबंधों की भूमिका अधिक गहरी दिखाई देती है। दोनों व्यवस्थाओं की अपनी अच्छाइयां हैं और दोनों की अपनी चुनौतियां भी। 
भारत को अमरीका से व्यवस्था प्रबंधन, समय की पाबंदी, सार्वजनिक अनुशासन और संस्थागत कार्यप्रणाली के कुछ पहलू सीखने चाहिएं। वहीं अमरीका को भारत की पारिवारिक आत्मीयता, सामुदायिक जुड़ाव और विभिन्न परंपराओं को साथ लेकर चलने की क्षमता से सीखने के अवसर उपलब्ध हैं।समय बदल गया है, परिस्थितियां बदल गई हैं लेकिन मानवता का मूल प्रश्न आज भी वही है-हम अलग होते हुए भी एक-दूसरे के कितने करीब रह सकते हैं? यात्रा समाप्त हो जाती है लेकिन यात्रा से मिले विचार साथ चलते रहते हैं। शायद यात्रा का सबसे बड़ा लाभ यही है कि हम केवल दूसरे देश को देखकर वापस नहीं लौटते, हम अपने देश को भी एक नई दृष्टि से देखने लगते हैं।-डी.पी. चंदन

Related Articles

Back to top button