राजनीति

बोस्निया की मतदान प्रक्रिया में ऐसा क्या है, जो भारत के लिए बन सकता है मिसाल?

हाल ही में बोस्निया-हर्जेगोविना में जिस तरह से मतपत्रों के जरिए चुनाव हुआ, क्या वह भारत के लिए आदर्श बन सकता है? बोस्निया ने इस बार के चुनाव में मतदान के लिए डिजिटल स्कैनर और बायोमेट्रिक मतपत्रों का इस्तेमाल किया। बाल्कन प्रायद्वीप पर अवस्थित इस देश को ‘बोस्निया और हर्जेगोविना’ भी कहते हैं। यूरोपीय संघ की शर्त है कि जो भी इसका सदस्य बनने का आकांक्षी है, वह चुनावों में पहले मतपत्र या बैलेट पेपर के जरिए मतदान कराए।

बोस्निया में आम चुनाव के लिए तेरह अगस्त की सुबह मतदान शुरू हुआ। इस देश में कई अलग-अलग जातीय समूहों के लोग रहते हैं और ज्यादातर नागरिक रोजमर्रा की समस्याओं पर ध्यान दे रहे हैं, जबकि कुछ मुख्यधारा के नेता युद्ध के समय के तनाव को फिर से हवा दे रहे हैं। इन तनावों ने 1992-95 के भयानक संघर्ष के बाद से ही देश को विभाजित कर रखा है।

बोस्निया में लगभग 34 लाख (3.4 मिलियन) मतदाता देश की मिली-जुली जातीय संरचना वाली प्रेसिडेंसी के तीन सदस्यों, राष्ट्रीय संसद के सांसदों और देश के दो हिस्सों के संस्थानों के प्रमुखों को चुन रहे हैं। ये दो हिस्से हैं- मुस्लिम-बहुसंख्यक ‘फेडरेशन आफ बोस्निया एंड हर्जेगोविना’ और ‘रिपब्लिका सर्पस्का’, जहां जातीय सर्बों का दबदबा है।

STORIES YOU MAY LIKE

बोस्निया में शासन करने वाले संस्थानों का एक जटिल ढांचा है। इसे वर्ष 1995 में अमेरिका की मध्यस्थता से हुए शांति समझौते के तहत बनाया गया था। इसका मकसद मुस्लिम बोस्नियाक, ऑर्थोडॉक्स सर्ब और कैथोलिक क्रोट समुदायों के बीच जातीय मतभेदों को संभालना था, जिनकी वजह से युद्ध हुआ था।

बोस्निया इस समय वैश्विक ताकतों के बीच प्रभाव बढ़ाने का एक बड़ा केंद्र बना हुआ है। चुनाव के नतीजे इस क्षेत्र में अमेरिका और रूस के भू-राजनीतिक प्रभाव को सीधे तौर पर प्रभावित कर सकते हैं। चुनाव लड़ रही बोस्निया की ज्यादातर राजनीतिक पार्टियां देश के सर्ब-नियंत्रित रिपब्लिका सर्पस्का और बोस्नियाक-क्रोएट फेडरेशन आफ बोस्निया-हर्जेगोविना में जातीय आधार पर बनी हैं। ये दोनों हिस्से केंद्रीय प्रेसिडेंसी और संसद के जरिए एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

बोस्नियाक राष्ट्रवादी पार्टी आफ डेमोक्रेटिक एक्शन ने अपना अभियान सर्ब अलगाववाद के खिलाफ बोस्निया को एकजुट रखने की कोशिशों पर केंद्रित किया है। बोस्नियाई क्रोट भी ज्यादातर अपनी जातीय पार्टियों का समर्थन करते हैं, जिनमें क्रोएशिया की सत्ताधारी कंजर्वेटिव क्रोएशियन डेमोक्रेटिक यूनियन की बोस्नियाई शाखा भी शामिल है।

दरअसल, यूरोप के सबसे गरीब देशों में से एक है बोस्निया। वर्ष 1992 में जातीय लड़ाई तब शुरू हुई, जब बोस्निया ने सर्ब-नेतृत्व वाले पूर्व यूगोस्लाविया से आजादी की घोषणा की थी। जातीय सर्बों ने अपना अलग राज्य बनाने और सर्बिया में शामिल होने के लिए हथियार उठा लिए थे। इस संघर्ष में एक लाख से ज्यादा लोग मारे गए और लाखों लोग विस्थापित हुए थे। बहरहाल, बोस्निया और हर्जेगोविना के केंद्रीय चुनाव आयोग के अनुसार, आधिकारिक और अंतिम चुनाव परिणाम 20 नवंबर, 2026 तक जारी कर दिए जाएंगे।

बहरहाल, इस समय विमर्श का विषय यह है कि जिस इलेक्ट्रॉनिक पहचान के साथ बोस्निया में मतपत्र के जरिए मतदान हुआ है, वह कितना सुरक्षित है? हालांकि, यह चुनावी धांधली रोकने और पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में एक बेहद मजबूत कदम साबित हुआ है। बायोमेट्रिक पहचान से एक व्यक्ति द्वारा दूसरे के नाम पर या मृत लोगों के नाम पर फर्जी वोट डालने की गुंजाइश लगभग खत्म हो जाती है। चूंकि मतदान आखिर भौतिक मतपत्र (फिजिकल बैलेट पेपर) पर ही होता है, इसलिए किसी भी तकनीकी खराबी या साइबर हमले की स्थिति में भौतिक मतपत्रों की दोबारा सामान्य तरीके से गिनती की जा सकती है। यह पूरी तरह से डिजिटल या ऑनलाइन मतदान के मुकाबले कहीं अधिक सुरक्षित है।

इस संबंध में बोस्निया और हर्जेगोविना के केंद्रीय चुनाव आयोग के अध्यक्ष जोवन कालाबा का बयान उल्लेखनीय है कि बायोमेट्रिक्स से छद्म मतदान की समस्या हमेशा के लिए खत्म हो जाती है, जबकि स्कैनर मानवीय दखल और जानबूझकर गिनती में होने वाली गलतियों को रोकते हैं, जिससे मतदान केंद्र बंद होने के तुरंत बाद शुरुआती नतीजे मिल जाते हैं।

जाहिर है, अनियमितताओं की न्यूनतम गुंजाइश किसी चुनाव की शुचिता और विश्वसनीयता को कायम रखने के लिए जरूरी है। पोड लुपोम बोस्निया और हर्जेगोविना स्थित एक प्रमुख स्वतंत्र नागरिक गठबंधन है। पोड लुपोम के शोध से पता चलता है कि बोस्निया और हर्जेगोविना के लगभग चालीस फीसद नागरिकों को अपने वोट को लेकर किसी न किसी तरह के दबाव का सामना करना पड़ा है।

नई प्रक्रिया में मतदाता की पहचान को मतदान केंद्र का अधिकारी ‘बारकोड रीडर’ से स्कैन करता है। फिंगरप्रिंट स्कैनर यानी अंगुलियों के निशान से वोटर की पहचान की पुष्टि मतदाता सूची के रिकॉर्ड से होती है। इस प्रणाली में पहचान की पुष्टि होने के बाद ही मतदाता को मतपत्र मिलते हैं।

मतपत्र का डिजाइन भी बदला गया है। मतदाता को अपनी पसंद की पार्टी या उम्मीदवार के बगल में बने गोले को पूरी तरह से भरना होगा, न कि ‘एक्स’ का निशान लगाना होगा। एक खास बात यह भी है कि मतपत्र पर उम्मीदवारों के नाम नहीं थे। इसके बजाय पार्टियों और उम्मीदवारों के नंबर लिखे थे। नाम एक अलग जानकारी वाले पत्र पर दर्ज थे। अब सवाल है कि अगर कभी भारत की चुनाव प्रक्रिया में मतपत्र की वापसी हुई, तो वोट देने वाली आम जनता के लिए ऐसी प्रक्रिया कितनी सुगम होगी!

भारत में आम चुनावों में कागजी मतपत्र का आखिरी प्रयोग वर्ष 1999 में किया गया था। इसके बाद 2004 के चौदहवें लोकसभा चुनाव से देश की सभी 543 संसदीय सीटों पर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) को अनिवार्य रूप से लागू करने के साथ मतपत्र से मतदान की प्रणाली को समाप्त कर दिया गया था।

मगर आज भी मतपत्रों का सीमित प्रयोग हो रहा है। मसलन, भारत के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में सांसद और विधायक आज भी मतपत्र पर अपनी प्राथमिकता दर्ज करके वोट डालते हैं। संसद के उच्च सदन और राज्यों के विधान परिषद चुनावों में मतपत्र का ही उपयोग किया जाता है। हालिया पंचायत चुनावों में पंच और सरपंच के चुनाव मतपत्र से कराए जा रहे हैं, जबकि पंचायत समिति और जिला परिषद सदस्यों के लिए ईवीएम का उपयोग हो रहा है।

कहा जा सकता है कि देश में मतपत्र की विदाई स्थायी रूप से नहीं हुई है। इस प्रक्रिया से मतदान करने में जो कमियां दिखती थीं, उस सूरत में पर्चियों की हाथों से गिनती की जाती थी, जिससे चुनाव परिणाम आने में कई दिनों की देरी होती थी। बूथ कब्जा जैसी घटनाएं आम हुआ करती थीं। पहचान पुख्ता करने की आधुनिक डिजिटल व्यवस्था न होने के कारण एक ही व्यक्ति बार-बार अलग-अलग नामों से या मृत या अनुपस्थित मतदाताओं के नाम पर फर्जी वोट डाल देता था।

मतपत्रों के जरिए मतदान में कागजों की बर्बादी भी एक बड़ा मुद्दा बना, लेकिन कागजों की बर्बादी को एक तरफ छोड़ दें, तो जिस ढांचे या प्रणाली के तहत बोस्निया में वोट डाले गए, वह काफी उत्साहवर्धक और विश्वसनीय लगता है।

Related Articles

Back to top button