राजनीति

आंदोलन का मौसम…`

गर्मी का मौसम अब जाने लगा है। आंदोलन का मौसम दस्तक दे चुका है। पहले गर्मी ने परेशान किया। गर्मी के बीच लगने वाले बिजली कट ने परेशान किया। फिर हर महीने भारी भरकम बिजली के बिलों ने परेशान किया। अब आंदोलन का मौसम परेशान करने वाला है। आंदोलन के मौसम में भले ही कई दलों के राजनीतिक नेताओं की चांदी हो जाए लेकिन हमारे जैसे आम आदमी को आंदोलन के दौरान कभी सडक़ जाम तो कभी सरकारी बसों की हड़ताल से जूझना पड़ता है। जब जब आंदोलन होते हैं आम आदमी के मुख से यही निकलता है कि…‘इस आंदोलन ने बड़ा दुख दीना!’ अब मौसम विभाग को भी अपनी जिम्मेदारी बढ़ा लेनी चाहिए। तापमान और बारिश के साथ यह भी बताना चाहिए कि आज शहर में आंदोलन का तापमान कितना रहेगा। कहां धरना होगा, कहां चक्का जाम होगा और किस रास्ते से निकलने पर आम आदमी की शाम घर पहुंचने से पहले ही रात हो जाएगी। हमारे यहां आंदोलन भी अब मौसम की तरह मौसमी हो गए हैं। चुनाव नजदीक आते ही इनकी रफ्तार वैसे ही बढ़ जाती है जैसे गर्मी में बिजली का बिल। आंदोलन शुरू होते ही सबसे पहले माइक आता है, फिर बैनर, फिर नारे और अंत में नेता जी। नेता जी आते ही जनता के दुख-दर्द को इतनी गंभीरता से बताते हैं जैसे कल ही उन्हें इस देश में पैदा किया गया हो। कैमरा सामने आते ही आवाज में क्रांति उतर आती है- ‘हम जनता के साथ हैं!’ आम आदमी मन ही मन पूछता है- साहब, जनता के साथ हैं तो रास्ता भी जनता के लिए छोड़ दीजिए। मगर यह सवाल पूछने का समय किसके पास है? नेता जी को भाषण देना है, कार्यकर्ताओं को नारे लगाने हैं और पुलिस को बैरिकेड संभालने हैं। फंसना सिर्फ आम आदमी को है।

अस्पताल जाने वाला मरीज, स्कूल से लौटता बच्चा, नौकरी पर जाने वाला कर्मचारी और दुकान खोलने वाला दुकानदार- सब लोकतंत्र की इस महान कवायद में अनजाने प्रतिभागी बन जाते हैं। आंदोलनकारी कहते हैं- ‘हम जनता की लड़ाई लड़ रहे हैं।’ सडक़ पर फंसा आम आदमी सोचता है- ‘भाई, लड़ाई मेरी है तो कम से कम मुझे घर तो जाने दो!’ सरकारों का भी आंदोलन से निपटने का अपना विज्ञान है। पहले ज्ञापन लो, फिर आश्वासन दो, फिर कमेटी बनाओ। कमेटी अध्ययन करेगी, अध्ययन के बाद रिपोर्ट आएगी और रिपोर्ट आने तक अगला आंदोलन शुरू हो जाएगा। इस तरह समस्या भी जीवित रहती है और राजनीति भी। विपक्ष में बैठा नेता आंदोलन को लोकतंत्र की आवाज बताता है और सत्ता में आते ही वही आंदोलन उसे कानून-व्यवस्था का संकट दिखाई देने लगता है। राजनीति में कुर्सी सचमुच बहुत शक्तिशाली वस्तु है, कुर्सी बदलते ही विचारधारा का चश्मा भी बदल जाता है। आजकल आंदोलन का एक डिजिटल रूप भी आ गया है। पहले नारे दीवारों पर लिखे जाते थे, अब सोशल मीडिया पर हैशटैग चलते हैं।

धरना स्थल पर जितने लोग हों उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वीडियो कितने लोगों ने देखा। क्रांति अब लाइव होती है और कभी-कभी रील बनकर अगले दिन तक खत्म भी हो जाती है। मगर असली समस्या वहीं रहती है- महंगाई, बेरोजगारी, बिजली के बिल, सडक़ें और आम आदमी की रोजमर्रा की परेशानियां। हमें आंदोलन से कोई शिकायत नहीं। लोकतंत्र में विरोध जरूरी है और सरकार को जनता की आवाज सुननी भी चाहिए। लेकिन एक विनम्र सुझाव जरूर है- जनता की लड़ाई लड़ते समय जनता को ही बंधक न बनाया जाए। सरकार के खिलाफ नारे लगाइए, ज्ञापन दीजिए, धरना दीजिए, बैरिकेड हिलाइए, मगर आम आदमी के लिए एक लेन खुली छोड़ दीजिए। क्योंकि नेता जी का आंदोलन खत्म होने का इंतजार किया जा सकता है, सरकार से बातचीत भी हो सकती है, मगर घर से आया फोन टाला नहीं जा सकता- ‘कहां रह गए? सब्जी लेते हुए आना।’ यही वह आदेश है जिसके आगे बड़े-बड़े आंदोलन भी शांतिपूर्वक स्थगित हो जाते हैं!

गुरमीत बेदी

Related Articles

Back to top button