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विकृत ऋतुचक्र में दिवाली का चहुंमुखी महत्त्व

वन, ग्राम, परंपरा एवं मानवता को छोडक़र आधुनिक चाल-चलन अपनाने वाले मानवों के पास अंतत: कोई विशेष उपलब्धि नहीं होती। इस सत्य को आत्मसात करते हुए जीवन को पारंपरिक लगन के साथ जीना होगा। परंपरा का अग्रणी उत्सवधर्म है दिवाली। इससे जुड़ें। प्राकृतिक होकर इसमें सम्मिलित हों। धार्मिक होकर इसे समझें। इसके मर्म को जानें…

ऋतुचक्र अव्यवस्थित है। मेरे जीवनकाल में संभवत: प्रथम अवसर है, जब निज दृष्टि दशहरा से लेकर दिवाली तक के दिवसों में वर्षा, आंधी, चक्रवात, भूस्खलन, मेघ विस्फोट, अतिवृष्टि तथा तुषारापात की साक्षी बनी है। रामलीला आरंभ होने की अवधि से लेकर दिवाली तक तो ऋतु समशीतोष्ण हुआ करती थी। श्रावण, भाद्रपद व आश्विन माहों द्वारा उत्पन्न प्राकृतिक संपदाएं एकत्र करने की ऋतु होती थी कार्तिक। किंतु इस वर्ष ये क्या हो गया! संपूर्ण हिमालयी पर्वत श्रृंखला पूष की भांति हो गई है। पर्वत-पर्वत तुषारावृत्त हैं। वहां से लेकर मैदानी नगरों-महानगरों तक शीत लहर परिव्याप्त है। कार्तिक माह में ही धरा अति नम होकर मनुष्य की संतुलित मनोवृत्ति को खंडित कर रही है। प्राय: समशीतोष्ण ऋतु प्रभाव से संतुलित रहने वाले संवेदनशील मनुष्यों के मन, हृदय व आत्मा, तीनों प्रस्तर अवसादग्रस्त हैं। हां, जो मानव मशीनी सोच-विचार व वैज्ञानिक मस्तिष्क के साथ जीवन में उपस्थित हैं, उन पर ऐसे ऋतु असंतुलन का कोई व कुछ भी अच्छा-बुरा प्रभाव नहीं है। वे अपने भ्रमित, स्वप्निल, क्षणभंगुर व समाप्तप्राय: जीवन को चिर-स्थिर समझ कर धन-संसाधन एकत्र करने की गतिविधियों में संलिप्त हैं। उन्हें कार्तिक मास में पूष मास की ऋतुगत उपस्थिति पर कोई आश्चर्य नहीं है। वे विस्मृतियों के पुतले बनते जा रहे हैं।

उन्हें व्यतीत दिवस, रात्रि, सप्ताह, माह, वर्ष, पंचतत्वों, जीवन व जैविक गतिविधियों से कोई सरोकार नहीं है। वे प्रगतिवान हैं। वे आगे बढ़ रहे हैं। लक्ष्यहीन होकर कहां जा रहे हैं, ये न उन्हें ज्ञात है तथा न ही उनके आधुनिक मार्गदर्शकों को। इन दिनों दिवाली के स्वागत कार्यक्रम हो रहे हैं। भारतवर्ष प्राकृतिक एवं आधुनिक आपदाओं को भूलकर हर्षोल्लास में डूबा हुआ है। ऐसा होना स्वाभाविक है। कार्तिक माह का दीपोत्सव है ही ऐसा, जो बीती कितनी ही समस्याओं व दु:खों को भुलाकर आधुनिक ढंग से ही सही, किंतु एक उत्सवजन्य प्रेरणा तो प्रदान करता ही है। आज से बीस, तीस, चालीस या अधिक वर्ष पीछे लौटकर कार्तिक मास के दीपोत्सवी अनुभवों का स्मरण करें तो मन-हृदय व्याकुल हो उठते हैं। तब क्या ऋतु छवि होती थी! कार्तिक मास व्यस्त समय होता था! जन-जन अक्षत खाद्यान्न श्रृंखला के अनेक उत्पादों को एकत्र-संग्रहीत करने खेतों में कार्यव्यस्त होते थे। धान की मनहर सुगंध वायु में प्रसारित रहती थी। जीवन प्राकृतिक व्यवस्था के अधीन एक अथाह आनंद, शांति व संतुष्टि का पर्याय हुआ करता था। कार्तिक माह में जलवायु अनुकूल होती थी। न अधिक ग्रीष्म और न अधिक शीत। पूर्णत: समशीतोष्ण। अधिसंख्य मानवों के तन स्वस्थ एवं मन शांत-संतुलित होते थे। दीपावली से एक माह, एक सप्ताह पूर्व का वातावरण कितना उमंगित हुआ करता। मनुष्य जीवन में सुख की पराकाष्ठा होता था ऐसा वातावरण। मनुष्य जीवन की जैसी अनुकूल गति होनी चाहिए, कदाचित जीवन वैसा ही होता। क्षितिज श्रृंखलाएं मद्दिम धुंध के आवरण में होतीं। सूर्यप्रकाश में तीव्रता, तीक्ष्णता एवं पीताभा की अधिकता होती। प्रमुख खाद्यान्न के रूप में धान की कटाई, छंटाई, एकत्रीकरण एवं भंडारण की गतिविधियां लोकोत्सव में परिवर्तित रहतीं। खेत-खलिहान लोक संस्कृति के वाहक हुआ करते। गीत-संगीत में विशुद्ध मानवता से लेकर पवित्र प्रेम तक के गहन अनुभव होते। संपूर्ण ग्रामीण जीवन किसी स्वर्गिक चलचित्र की भांति प्रदर्शित होता। प्रकृति का मान-सम्मान, स्वागत-सत्कार तथा ऋतुगत अभिवादन-अभिनंदन होता। इन परिस्थितियों में मानवीय सद्गुणों एवं सöावनाओं का स्वाभाविक संचारण होता। दुर्गुणों से मानव दूर होता।

दीपावली में ग्रामीण हाट-मेले व्यापार व वाणिज्य के स्वदेशी संस्करण बने रहते। मिट्टी के दीपक, शुद्ध सरसों का तेल, विषैले मिश्रण से मुक्त खील-बताशे व मिष्ठान, इत्यादि सब कुछ धरती के साथ प्राकृतिक संबंध का आधार बनते। कार्तिक मास, ज्योति उत्सव, उत्सवी कार्यक्रम, गतिविधियों, हलचल, उमंग-तरंग, हर्षोल्लास के धार्मिक-आध्यात्मिक सूत्र हिंदुओं के पौराणिक ग्रंथ रामायण से संबद्ध होते। दिवाली से एक-डेढ़ माह पूर्व रामलीलाओं का मंचन आरंभ होता। अक्षत खाद्यान्न की श्रेणी वाले समस्त कृषि उत्पादों के समुचित भंडारण के उपरांत लोगों के पास आगामी कृषि उत्पादन में व्यस्त होने से पूर्व जो रिक्त समय होता, उसमें वे रामलीलाओं का आयोजन करते। यह उपक्रम सदियों से एक महान परंपरा में परिवर्तित होता रहा, जो आधुनिक विसंगतियों के साथ संपन्न तो आज भी रहा है, किंतु अब इसमें महानता व गंभीरता अदृश्य है। अब यह एक व्यावसायिक औपचारिकता हो गया है। अब यह एक नीरस उत्सवी अभ्यास हो चुका है, जो लोक संस्कृतियों, प्रकृतिवत होने की जीवन-युक्तियों, मानवता-सज्जनता की संगतियों से पृथक हो चुका है। अब दिवाली के लिए जो व जैसी भी आधुनिक परिस्थितियां हों अथवा जैसी भी प्राकृतिक विकृतियां उपस्थित हों, दीपक के प्राकृतिक एवं पुरुषोत्तम महत्त्व के साथ मनुष्यों का जुड़ाव आवश्यक है। मानवों के अंदर धीरे-धीरे समाप्त होते मानवीयता के गुणों की रक्षा के लिए अब दिवाली जैसी पारंपरिक पद्धतियों का ही सहारा है। भारत के होली-दिवाली जैसे पारंपरिक त्योहार ही हैं, जो मनुष्यों को पुन: मनुष्यता की प्राकृतिक भावनाओं के साथ जोड़ सकते हैं। भारत हो या कोई भी अन्य देश, वहां मानवता की पुनस्र्थापना के लिए अब परंपरागत त्योहारों की भूमिका ही अधिक होगी। जिस प्रकार आधुनिकता का जीवन-चरित्र मानव को मन से खोखला कर रहा है, उस स्थिति में भला दुनिया के सामने पारंपरिक त्योहारों के अतिरिक्त कौनसे उपाय हैं, जो मानव-जीवन को पुन: समुचित व संतुलित बना सकेंगे। वास्तव में आधुनिक प्रगति की तीव्र यात्रा में अधिसंख्य मानव ये भूल ही जाते हैं कि उनके पास जीवन के अधिक वर्ष नहीं हैं। वे इस सत्य के साथ खड़े ही नहीं रहते कि छोटे-से जीवनकाल में उनके पास जीवन को पहले आधुनिकता के प्रयोग में लगाकर, और इसमें विफल होने पर, बाद में प्राकृतिक प्रयोग में लगाने के लिए, न तो समय और न ही अवसर ही है।

यदि ध्यानपूर्वक सोचें तो यही पता चलेगा कि आधुनिकता का हर चरण अंतत: एक निष्फल एवं अमानवीय दुर्गति को प्राप्त होता है। वन, ग्राम, परंपरा एवं मानवता को छोडक़र आधुनिक चाल-चलन अपनाने वाले मानवों के पास अंतत: कोई विशेष उपलब्धि नहीं होती। इस सत्य को आत्मसात करते हुए जीवन को पारंपरिक लगन के साथ जीना होगा। परंपरा का अग्रणी उत्सवधर्म है दिवाली। इससे जुड़ें। प्राकृतिक होकर इसमें सम्मिलित हों। धार्मिक होकर इसे समझें। आध्यात्मिक होकर इसके मर्म को जानें। इसकी जीवंत ऊर्जा से जीवन का उद्देश्य पहचानने की शक्ति प्राप्त करें। दिवाली के पौराणिक कथा-आधार रामायण के शिक्षातत्त्व से परिचित होने का प्रयास करें। इस समय जीवितावस्था में जीवन में उपस्थित लोगों को जो भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष अथवा आधुनिक-प्राकृतिक आघात लग रहे हैं, उनका समाधान आध्यात्मिक साधना द्वारा ही प्राप्त हो सकेगा, और दिवाली में दिवाली का प्राकृतिक वातावरण इस साधना के लिए मनुष्य को आत्मप्रेरणा अवश्य प्रदान करता है। दीपज्योतियों की ऊष्मा में जीवन को नवीन दृष्टि से देखने का अवसर है भारतीयों के पास। ऐसा अवसर प्राप्त कर इससे लाभान्वित होना चाहिए। यह प्रगति एवं आधुनिकता के आत्मदंश से सुरक्षित रहने का श्रेष्ठ प्राकृतिक उपाय है।

विकेश कुमार बडोला

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