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सी.जे.पी. ने अपनी क्षमता से कहीं बड़ा लक्ष्य चुन लिया

नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत का वार्षिक विजयादशमी व्याख्यान और प्रधानमंत्री का इंद्रप्रस्थ रामलीला मैदान में संबोधन, भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार और उसके वैचारिक स्रोत में बढ़ती चिंता को दर्शाते हैं।आर.एस.एस. प्रमुख के मन में स्पष्ट रूप से कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले युवाओं द्वारा हाल ही में किए गए विरोध-प्रदर्शन और राहुल गांधी के नेतृत्व वाले विपक्ष का विचार था, जब उन्होंने कहा कि समाज, न कि विरोध प्रदर्शन, बदलाव ला सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि ‘बुरी ताकतें भारत को तोडऩा चाहती हैं।’

भागवत की टिप्पणियों से पता चलता है कि मोदी सरकार के कामकाज की शैली को लेकर आर.एस.एस. के जो भी मतभेद रहे हों, हाल के विरोध-प्रदर्शनों के मुद्दे पर संगठन पार्टी की सोच के साथ खड़ा है। इन प्रदर्शनों में अब तेजी से ‘सत्ता परिवर्तन’ की मांग उठाई जा रही है। एक असामान्य कदम उठाते हुए प्रधानमंत्री मोदी, जो आमतौर पर आर.एस.एस. पर सार्वजनिक रूप से टिप्पणी नहीं करते, ने कहा कि उन्हें भागवत का व्याख्यान ‘अत्यंत प्रेरणादायक’ लगा। राष्ट्रीय राजधानी में विजयादशमी समारोह के दौरान अपने भाषण में मोदी ने कहा कि जब देश के हित दांव पर हों, तो सभी राजनीतिक दलों और संगठनों को एकजुट होकर खड़ा होना चाहिए। भाजपा नेता देश में हाल के विरोध प्रदर्शनों के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ होने का आरोप लगाते रहे हैं और दावा करते रहे हैं कि इन प्रदर्शनों का वास्तविक उद्देश्य ‘सत्ता परिवर्तन’ का प्रयास है। विरोध प्रदर्शनों के बढ़ते दायरे को देखते हुए यह चिंता उचित हो सकती है। फिलहाल विभिन्न कारणों से विरोध प्रदर्शनों में विराम आया है और यह देखना बाकी है कि विपक्षी दल या कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व वाला युवा आंदोलन फिर से अपनी गति हासिल कर पाता है या नहीं।

हालांकि, शुरूआती लामबंदी, जिसकी शुरूआत भारत के मुख्य न्यायाधीश की कॉकरोचों पर की गई टिप्पणी के आधार पर किए गए एक ट्वीट से हुई थी, पहले चरण का विरोध प्रदर्शन समाप्त होने के बाद से कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है। इसका संकेत सी.जे.पी. नेताओं की सोशल मीडिया पोस्ट पर घटती प्रतिक्रिया और मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर किए गए विरोध प्रदर्शन के आह्वान पर अपेक्षाकृत कमजोर प्रतिक्रिया से मिलता है। सी.जे.पी. नेताओं की कई गलतियों के कारण युवा आंदोलन को मिलने वाला समर्थन घटता दिखाई दिया। पहली बात, संगठन ने खुद को उन राजनीतिक दलों से दूर कर लिया, जिनकी मांग भी वही थी। इतना ही नहीं, सीजेपी के कुछ नेताओं ने अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया और यहां तक कि कांग्रेस पार्टी का मजाक भी उड़ाया।

दूसरी बात, देश के अन्य हिस्सों में आंदोलन खड़ा करने की कोशिश करने की बजाय नेतृत्व को मुख्य रूप से महाराष्ट्र तक सीमित रखना एक बड़ी गलती थी। अब यह संगठन दिशाहीन दिखाई देता है और इसका नेतृत्व स्पष्ट रूप से मानता है कि उसे दूसरों की सलाह या समर्थन की कोई आवश्यकता नहीं है। सरकार द्वारा दो शीर्ष नेताओं की हिरासत बढ़ाए जाने के साथ ही पार्टी अपनी दिशा खोती दिखाई दे रही है। हालांकि, अभी इसके अंत की घोषणा करना जल्दबाजी होगी, लेकिन सीजेपी नेताओं को केवल इस्तीफों की मांग करने की बजाय युवाओं को आंदोलन से जोड़े रखने के तरीके खोजने होंगे। इसी संदर्भ में ‘सत्ता परिवर्तन’ की मांग का समर्थन करने के उसके फैसले की जांच की जानी चाहिए। यह मांग सबसे पहले कांग्रेस के नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शन में उठाई गई थी और वामपंथी छात्र नेता नेहा बोरा ने इसका समर्थन किया था। इसके बाद

प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव जैसे अन्य ‘स्वतंत्र’ कार्यकत्र्ताओं ने भी इसका समर्थन किया। इनमें से कुछ लोग श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में हुए इसी तरह के जन आंदोलनों की ओर इशारा करते रहे हैं। यह सच है कि वे आंदोलन भी बिना किसी एक नेता के थे, युवाओं के नेतृत्व में चले थे और वास्तव में उनके परिणामस्वरूप ‘सत्ता परिवर्तन’ हुआ था। हालांकि, यह मानना मूर्खतापूर्ण होगा कि भारत में भी इस तरह का ‘सत्ता परिवर्तन’ लाया जा सकता है, ठीक उसी तरह जैसे देश में सैन्य तख्तापलट होना असंभव है। इसका मुख्य कारण यह है कि भारत एक विशाल और विविधतापूर्ण राष्ट्र है। यह एक उपमहाद्वीप है, जहां अलग-अलग क्षेत्र, संस्कृतियां और सामाजिक समूह हैं। इसके अलावा, यहां लोकतंत्र की मजबूत परंपराएं हैं और हम सभी जानते हैं कि 1975 में आंतरिक आपातकाल लगाए जाने से पैदा हुई असामान्य स्थिति के पीछे क्या कारण थे। पड़ोसी देशों में जहां इस तरह का ‘सत्ता परिवर्तन’ संभव हुआ, उसका कारण यह था कि वे छोटे देश हैं। वे देश भारत के कुछ राज्यों से भी छोटे हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि देश की बहुत-सी संस्थाओं, जिनमें निर्वाचन आयोग भी शामिल है, ने जनता का विश्वास खो दिया है, लेकिन ‘सत्ता परिवर्तन’ लागू करने का एकमात्र तरीका चुनावी प्रक्रिया है। विपक्ष, विशेष रूप से कांग्रेस, को यह साबित करना होगा कि वह केवल विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व करके नहीं, बल्कि जनता के समर्थन से बदलाव ला सकती है। जहां तक सी.जे.पी. और उसके नेताओं का सवाल है, ऐसा लगता है कि उन्होंने अपनी क्षमता से कहीं अधिक बड़ा लक्ष्य चुन लिया है। वे शिक्षा प्रणाली में बदलाव ला सकते हैं या भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ सकते हैं, लेकिन ‘सत्ता परिवर्तन’ की मांग करने से उन्हें उस तरह का जनसमर्थन नहीं मिलने वाला, जैसा उन्हें उस समय मिला था जब वे तत्कालीन शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहे थे।-विपिन पब्बी

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