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खेती में 76% हिस्सेदारी, जमीन पर सिर्फ 16% महिलाओं का मालिकाना हक: जमीन के हक से लेकर कमाई तक की चुनौती

ग्रामीण भारत में कृषि के कामकाज की तस्वीर बदल रही है। रोजगार की तलाश में पुरुषों के शहरों की ओर पलायन के बीच कई परिवारों में खेती संभालने की जिम्मेदारी महिलाओं पर आ गई है। बुवाई, निराई-गुड़ाई, कटाई, बीजों को सहेजने, अनाज के भंडारण और पशुपालन तक, हर मोर्चे पर वे जुटी रहती हैं। बावजूद इसके उन्हें किसान के बजाय कृषि में मददगार समझा जाता है। विडंबना यह है कि पुरुष खेत से दूर रहकर भी किसान कहलाता है, जबकि खेत में लगातार मेहनत करने वाली महिला उसकी सहयोगी बनकर रह जाती है।

सवाल यह है कि खेती में अहम भूमिका निभाने वाली महिला को किसान के रूप में कितनी स्वतंत्र पहचान मिल पाती है? जमीन पर उसका कितना हक है, अपनी मेहनत की कमाई पर उसका कितना अधिकार है और खेती से जुड़े फैसलों में उसकी कितनी भागीदारी है? महिला किसान की वास्तविक स्थिति का विमर्श इन्हीं सवालों से शुरू होता है।

योगदान का मूल्यांकन

कृषि में महिलाओं की मेहनत को परिवार के भीतर अक्सर अलग से आर्थिक योगदान के रूप में नहीं देखा जाता। वे खेत में बराबर काम करती हैं, लेकिन उनकी मेहनत का मूल्य न तो अलग से आंका जाता है और न ही खेती से होने वाली आय में उनकी हिस्सेदारी तय होती है। फसल बेचने से लेकर उसकी कमाई के इस्तेमाल तक के फैसलों में भी उनकी भूमिका बहुत सीमित होती है। इस तरह खेती में उनका योगदान परिवार की आय बढ़ाने में तो अहम होता है, लेकिन उस आय पर उनका स्वतंत्र अधिकार अक्सर सुनिश्चित नहीं हो पाता।

खेती में महिलाओं की भूमिका केवल श्रम तक सीमित नहीं है। पीढ़ियों से वे स्थानीय मिट्टी और मौसम के अनुकूल बीजों को पहचानती, चुनती और अगली बुवाई के लिए सहेजती आई हैं। बाजार से बीज खरीदने पर बढ़ती निर्भरता के बीच स्थानीय किस्मों को बचाए रखना चुनौती बनता जा रहा है। ऐसे में सामुदायिक बीज बैंक बनाने, बीजों के सुरक्षित भंडारण और महिला समूहों को जरूरी सहयोग देने की दिशा में ठोस पहल की जरूरत है। महिलाओं के इस पारंपरिक ज्ञान को सहेजना इसलिए भी जरूरी है, ताकि उनका यह अनुभव अगली पीढ़ी तक पहुंचे और यह विरासत बची रहे।

आदिवासी इलाकों में महुआ, तेंदूपत्ता, इमली और शहद जैसी लघु वन उपज जुटाने से लेकर उनकी सफाई तक में महिलाओं की अहम भूमिका होती है। यह काम उनके परिवार की आजीविका का सहारा है, लेकिन बाजार में कीमत तय करने की ताकत अक्सर उनके पास नहीं होती। भंडारण की कमी और पैसों की तत्काल जरूरत उन्हें बिचौलियों पर निर्भर कर देती है। वन अधिकार अधिनियम, 2006 और लघु वन उपज की न्यूनतम समर्थन मूल्य योजना जैसी व्यवस्थाओं के बावजूद उचित मूल्य और बाजार तक पहुंच आज भी आदिवासी महिलाओं के लिए चुनौती है। हर वन उपज संग्राहक महिला को किसान का दर्जा नहीं मिलता, लेकिन क्या इससे उसकी आजीविका और आर्थिक योगदान को नीतियों में उचित जगह देने की जिम्मेदारी कम हो जाती है?

मालिकाना हक का सवाल

भारत में महिलाएं ग्रामीण कृषि श्रमबल का 64 से 76 फीसद हिस्सा संभालती हैं, लेकिन केवल 13 से 16 फीसद महिलाओं के पास भूमि का मालिकाना हक है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (2019-21) के अनुसार, 15 से 49 वर्ष की 31.7 फीसद महिलाओं के पास अकेले या संयुक्त रूप से जमीन थी, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 42.3 फीसद था। ये आंकड़े सभी महिलाओं और पुरुषों के हैं, केवल किसानों के नहीं, लेकिन ये जमीन के अधिकार में अंतर जरूर दिखाते हैं। बेटियों को पैतृक जमीन में कानूनी अधिकार मिलने के बावजूद सवाल है कि कितनी बेटियों को वास्तव में उनका हिस्सा मिल पाता है? परिवार और खेती की जिम्मेदारियां उठाने वाली महिलाओं के नाम जमीन कितनी दर्ज होती है?

जमीन के कागजों में नाम होना महज मालिकाना हक का सवाल नहीं है। इससे कृषि ऋण लेने, फसल बीमा का लाभ पाने और जमीन से जुड़ी सरकारी योजनाओं तक पहुंच बनाना मुमकिन हो पाता है। यहां यह समझना भी जरूरी है कि महिला किसान के सशक्तीकरण का अर्थ केवल जमीन पर मालिकाना हक मिलना नहीं है। इसके लिए जरूरी है कि फसल के चयन, नई तकनीकों को अपनाने और उपज की बिक्री जैसे मामलों में उनकी राय को महत्त्व मिले और उन्हें स्वतंत्र निर्णय लेने का अवसर दिया जाए, ताकि वे केवल मेहनत करने तक सीमित न रहें, बल्कि खेती की दिशा भी तय कर सकें।

सशक्तीकरण की सीढ़ी

महिला किसानों के सशक्तीकरण के लिए केंद्र सरकार ने कई योजनाएं शुरू की हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2022-23 से 2024-25 के दौरान 2.58 करोड़ महिलाओं को कृषि-पारिस्थितिकी और पशुपालन का प्रशिक्षण दिया गया। मगर योजनाओं की सफलता लाभार्थियों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से तय होगी कि कितनी महिलाओं की आमदनी बढ़ी, उन्हें कितना कृषि ऋण मिला और खेती से जुड़े फैसलों में उनकी भागीदारी कितनी मजबूत हुई। छह राज्यों की महिला किसानों पर आधारित एक अध्ययन में पाया गया कि करीब 21 फीसद महिलाओं ने टिकाऊ कृषि पद्धतियां छोड़ दीं। कम मुनाफा और प्रशिक्षण की कमी इसके प्रमुख कारण थे। ऐसे में योजनाओं के जमीनी नतीजों और उनके असर का आकलन सरकार की जवाबदेही का अहम हिस्सा होना चाहिए।

इस दिशा में महाराष्ट्र सरकार की एक पहल सामने आई है, जिसके तहत महिला किसान प्रमाणपत्र के लिए ऑनलाइन पोर्टल शुरू किया गया है। मकसद उन महिलाओं को किसान के रूप में पहचान देना है, जिनके नाम जमीन नहीं है, लेकिन खेती की जिम्मेदारी वे संभालती हैं। इससे कृषि ऋण, बीमा और दूसरी सुविधाओं तक उनकी पहुंच आसान हो सकती है। हालांकि, प्रमाणपत्र मिलने से न जमीन पर मालिकाना हक मिलता है, न ही सरकारी योजनाओं का लाभ अपने आप सुनिश्चित हो पाता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, धुले जिले में 1,33,234 महिलाओं ने पंजीकरण कराया, लेकिन प्रमाणपत्र केवल 17,028 को जारी हुए। पंजीकरण और प्रमाणपत्र जारी होने के बीच का यह बड़ा अंतर योजना के क्रियान्वयन पर सवाल उठाता है।

आत्मनिर्भरता से आगे

महिला किसानों को पहचान और सम्मान के साथ अपनी उपज का उचित मूल्य, भंडारण की सुविधा और बाजार तक सीधी पहुंच चाहिए। महिला किसान समूहों और उत्पादक संगठनों को मजबूत करना होगा, ताकि वे अपनी उपज का बेहतर दाम हासिल कर सकें। जंगलों से विभिन्न उपज जुटाने वाली महिलाओं के लिए भी उसे तैयार करने और बाजार तक पहुंचाने की व्यवस्था जरूरी है। खेत हो या जंगल, महिलाओं की मेहनत को पारिवारिक जिम्मेदारी कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। महिला किसानों को जब अपनी मेहनत का उचित मूल्य मिलेगा, तो वे आर्थिक रूप से भी आत्मनिर्भर होंगी और खेती से जुड़े फैसले स्वतंत्र रूप से ले सकेंगी, तभी उनके श्रम को सही मायने में सम्मान मिलेगा। इससे न केवल उनकी अपनी जिंदगी बदलेगी, बल्कि लड़कियों की आने वाली पीढ़ी भी खेती-किसानी को मजबूरी नहीं, बल्कि सम्मान और आत्मनिर्भरता से जुड़े अवसर के रूप में देख सकेंगी।

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