संपादकीय

भारत में संकटों का दौर

राष्ट्रपति टं्रप ईरान पर बम गिराएंगे या नहीं अथवा मध्यावधि चुनाव के बाद हमलों का नया दौर शुरू करेंगे, यह वह ही जानते हैं। कुछ भी कहना अनिश्चित है, क्योंकि टं्रप भी मानसिक तौर पर अस्थिर राजनेता हैं। यह राष्ट्रपति टं्रप का दिमागी फितूर, अहंकार और उनकी सनक है, जिसके मुताबिक वह फैसले लेते हैं। यह अमरीकी जनता के लिए भी महंगाई, बेरोजगारी, मंदी का दौर है, यूरोपीय देश जबरदस्त विरोध-प्रदर्शनों से धू-धू जल रहे हैं, दुनिया के अधिकतर देश सप्लाई चेन के टूटने के कारण ‘त्राहिमाम’ कर रहे हैं। यदि ईरान युद्ध का नया दौर शुरू हुआ, तो वह पहले से अधिक भयावह और विध्वंसक होगा, लिहाजा कच्चे तेल के दाम 150-200 डॉलर प्रति बैरल तक उछल सकते हैं, ऐसे अर्थशास्त्रियों और अनुभवी रक्षा विशेषज्ञों के आकलन हैं। ‘इंडियन बॉस्केट’ में कच्चा तेल करीब 120 डॉलर प्रति बैरल पड़ रहा है, जबकि बाजार के दाम 115 डॉलर को छू चुके हैं। भारत के लिए यह कई संकटों का दौर है। बेशक युद्ध बुनियादी कारण है, लेकिन कुदरत भी हमसे नाराज है। हमारी मुद्रा ‘रुपए’ का लगातार अवमूल्यन जारी है। विदेशी निवेश कम मिल रहा है। जिन विदेशी निवेशकों ने भारत के बाजार में निवेश किए थे, उन्होंने अक्तूबर माह में ही 48056 करोड़ रुपए निकाल लिए हैं। जनवरी से अब तक करीब 3.08 लाख करोड़ रुपए के निवेश निकाले जा चुके हैं। कच्चे तेल की कीमतें महंगी होने के कारण आयात बिल 11.25 लाख करोड़ रुपए से बढ़ कर करीब 20 लाख करोड़ रुपए हो सकता है। यह भुगतान डॉलर में करना पड़ता है, लिहाजा विदेशी मुद्रा भंडार भी प्रभावित होगा। अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, ईरान युद्ध के कारण तेल के दाम बढऩे से भारत को करीब 6 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका है। भारत सरकार ने जो कर्ज ले रखा है, उस पर ब्याज ही 14 लाख करोड़ रुपए है। आखिर यह पैसा कहां से आएगा? ऐसे देश में कोई विदेशी निवेशक बड़ा निवेश क्यों करेगा? भारत सरकार के सूत्रधार यह स्वीकार करें अथवा न करें, हकीकत की एक बानगी तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने पेश की है। उन्होंने किसानों से आग्रह किया है कि वे इस बार रबी की फसल न बोएं, क्योंकि वह पानी मुहैया नहीं करा सकते। पानी की घोर किल्लत है।

पानी के भीषण संकट के कारण तेलंगाना के किसान 55 लाख हेक्टेयर में से 13 लाख हेक्टेयर भूमि पर खेती करना पहले ही छोड़ चुके हैं। किसानों ने अपना धंधा ही छोड़ दिया है और शहर में मजदूर बन रहे हैं। अब ई-100, अर्थात 100 फीसदी एथेनॉल वाली, कारों की घोषणा सरकार ने की है, लेकिन इस पर न तो अर्थशास्त्री और न ही विपक्ष आवाज उठा रहे हैं कि एथेनॉल और डाटा केंद्रों में कितना पानी बहाया जा रहा है? भारत में भयंकर सूखे के ऐसे हालात हैं कि महाराष्ट्र में 358 में से 305 और कर्नाटक में 240 में से 226 तालुका ‘सूखाग्रस्त’ घोषित किए जा चुके हैं। किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं। कर्नाटक में 150 सालों का सूखे का सबसे भीषण संकट सामने है। यह कोई सामान्य तस्वीर नहीं है। महाराष्ट्र देश की नंबर वन और कर्नाटक तीसरे स्थान की अर्थव्यवस्था वाले राज्य हैं। सरकारें खाद्य-संकट से कैसे बचाएंगी? इसका सीधा असर कृषि पर पड़ेगा, जिस पर देश का 42 फीसदी कार्यबल आश्रित है। भारत जो कच्चा तेल और गैस खाड़ी देशों से लेता था, अब अमरीका से अंगोला जैसे देशों के सहारे है। बीते एक साल में अमरीका से एलएनजी का आयात 10 फीसदी से बढ़ कर 67 फीसदी पर पहुंच गया है। अमरीका से तेल-गैस मंगवाना 20 फीसदी महंगा पड़ रहा है। एसबीआई रिसर्च के मुताबिक, हालात ये हैं कि महंगाई की दर 6.45 फीसदी तक बढ़ सकती है। खाद्य महंगाई दर अभी 8 फीसदी से अधिक है। दिसंबर में रेपो रेट भी 5.5 से बढ़ कर 6 फीसदी हो सकता है। मार उस आम आदमी पर ही पड़ेगी, जो किस्तों में जिंदगी जी रहा है। अर्थशास्त्री मान रहे हैं कि इससे और महंगे तेल के कारण हमारा चालू खाता घाटा 2 फीसदी तक बढ़ सकता है। यह दौर सरकार की चुप्पी का नहीं है। आसार ऐसे उभर रहे हैं कि सरकार ने ठोस कदम नहीं उठाए, तो देश में कमोबेश यूरोप जैसे हालात बन सकते हैं! पूरे विश्व में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से हाहाकार मचा हुआ है। इससे भारत भी प्रभावित हुआ है। तेल की खरीद के लिए देश को लाखों डालर खर्च करने पड़ रहे हैं।

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