लेख

विनम्रता से ही निखरता है व्यक्तित्व, घमंड और आडंबर इंसान को बनाते हैं कमजोर | दुनिया मेरे आगे

हमारे समाज में ऐसे बहुत से लोग मिल जाएंगे, जिन्होंने न केवल घमंड का आवरण ओढ़ रखा है, बल्कि उनके आचार-व्यवहार में वह आमतौर पर दिखाई भी पड़ता है। हम अगर अपने आसपास झांक कर देखेंगे, तो ऐसा कोई एक व्यक्ति नहीं मिलेगा, बल्कि ढेरों मिलेंगे। चूंकि ऐसे लोग बहुतायत में हैं, इसलिए इनका डर भी फैला रहता है। सरकारी विभागों में ऊंचे ओहदे पर काम करने वाले हों या निजी कंपनियों को चलाने वाले।

चिकित्सालयों, विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के प्रबंधन में शामिल हों या राजनीतिक दल में, इस तरह के लोग हर कहीं अपने हाथ में एक चाबुक लेकर बैठे हुए नजर आते हैं। इन लोगों को किसी व्यक्ति की तो दूर, समाज और देश की प्रगति में भी कोई रुचि नहीं होती। उन्हें केवल अपना ही हित पूरा करना होता है और वे महज अपने दायरे में कैद होकर सिर्फ खुद के बारे में सोचते हैं। ऐसे लोग आडंबर रचते हैं और फिर उस आडंबर को हटाने के लिए आगे बढ़ रहे और हिम्मत दिखा रहे लोगों को, उनके परिवार को अपना शिकार बनाते हैं या उन्हें अलग-अलग तरह से परेशान करते हैं।

अगर हम कुछ दशक पहले के यथार्थ उदाहरणों से आगे प्राचीनकाल के इतिहास या लोककथाओं की बात करें, तब भी इस प्रकार के कुटिल लोगों की कमी नहीं थी। इसके लिए हम चाहे भारतीय महाकाव्य पढ़ें या रूसी साहित्य, शेक्सपियर के नाटक पढ़ें या रवींद्रनाथ ठाकुर की रचनाएं, प्रेमचंद की कहानियां पढ़ें या गालिब, मीर, फैज की शायरी, ऐसे पात्र हर जगह हैं और इसीलिए इन पुस्तकों में वे शामिल हैं। यही वजह है कि मनुष्य ने अपना विकास कर लिया है, लेकिन मानवता का विकास नगण्य ही रहा।

वर्तमान में किसी भी परिवार की स्थिति पर गौर किया जाए, उनके मुखिया और अन्य सदस्य खुद को संस्कारवान कहने में नहीं हिचकते। कायदे से देखें, तो इसे अलग से कहना ही उनके असंस्कारी होने का प्रतीक है। स्वयं की प्रशंसा या केवल खूबियों का प्रचार-प्रसार करना, अपने आप को धोखा देने के साथ ही एक सामाजिक अपराध भी है। किसी भी शैक्षणिक योग्यता में उपाधि होती है और हमारे भावी जीवन की वह मुख्य आवश्यकता भी है। शिक्षा से हम अपना अर्थतंत्र विकसित कर सकते हैं। इसके विपरीत संस्कार किसी उपाधि का नाम नहीं है। समाज और परिवार की देखरेख में यह संस्कार फलते-फूलते हैं। संस्कार के लिए गुरु औपचारिक शिक्षा नहीं देते, वे हमारे अध्ययन की दिशा बदल देते हैं। इस प्रकार के अनुभव हम अपने परिवार के बुजुर्गों से भी प्राप्त कर सकते हैं।

बचपन की अवस्था में ही इसके लिए बीज बोया जा सकता है। अभी तो नादान उम्र है, समय आने पर स्वयं ही समझदार हो जाएगा, यह सोच अधूरी है। समय की गति को कोई बांध नहीं सकता। जिस तरह कुछ नया सीखने की कोई उम्र नहीं होती, ठीक उसी तरह संस्कारवान होने का उम्र से कोई संबंध नहीं होता। यह एक सतत प्रक्रिया है और जिस दिन हम बोलना सीखते हैं, उसी दिन से यह प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है। अब अगर कोई यह सोच ले कि उसने सब सीख लिया है, तो यह उसकी नादानी ही है। सीखने की प्रक्रिया जीवन भर चलती रहती है।

सीखने के लिए पहली शर्त है विनम्रता। केवल बाहरी पहनावे, शरीर के रंग या बनावट, शक्ति और धनाढ्य स्थिति किसी भी व्यक्ति के पूर्ण परिचय को इंगित नहीं करते। इसलिए इन सबसे यह पता नहीं चलता कि वह कितना विनम्र है। विनम्रता के लिए हमारा व्यवहार, आहार, हमारी वाचालता, हमारा धैर्य, अनुभव, हमारी तर्क क्षमता, हमारा अर्थमोह आदि का स्तर देखा, जांचा और परखा जा सकता है। इन सबसे हमारा व्यक्तित्व सामने आ सकता है और यह व्यक्तित्व ही हमारी विनम्रता का परिचय दे देता है।

अगर इस संबंध में हम सैद्धांतिक रूप की बात करें, तो आडंबर से मुक्त होकर सादगी से जीवन बिताना ही विनम्रता है। धार्मिक और आध्यात्मिक ग्रंथों में बताया गया है कि विनम्र होने की पहली शर्त मानवता की सेवा करना और घमंड से दूर रहना है। अपनी गलतियों के लिए क्षमा मांगना और बहुत बार अपनी कमियों को जान लेने के बाद दूसरों से सलाह लेना भी विनम्रता का प्रतीक ही है। इस प्रकार जो व्यक्ति शालीन हो, कोमल स्वभाव वाला हो, नम्र भाव रखता हो, गुस्से पर काबू करना जानता हो और शिष्टाचारी हो, विनम्र कहलाता है। इसके लिए जो एक सबसे अनिवार्य तत्व है, वह है वैसे व्यक्ति की कद्र करना, जो हमारी कद्र करता हो।

अपने देश को स्वतंत्र बनाने के लिए हमने लाख प्रयत्न किए हों, लेकिन किसी भी काल का कोई भी शासक हिंदुस्तान के प्रति कभी विनम्र नहीं रहा। हमारे कितने ही लोग उनकी चालाकियों और यातनाओं का शिकार बने। हमें जानवरों की तरह समझकर उसी तरह का व्यवहार किया गया, हजारों ने लाठियां और गोलियां खाईं, फिर भी शासकीय विनम्रता दूर-दूर तक दिखाई नहीं दी। यहां तक कि उन्होंने हमारी खनिज संपदा और प्राकृतिक संपत्तियों से अपना घर भरा, हमारी धरोहरों को मिटाने के प्रयास किए।

वर्तमान में भी हमारा देश विकासशील है, न कि विकसित। इसका मुख्य कारण यही है कि आज भी हमारे अनेक नागरिकों के भीतर उनका स्वार्थ बार-बार पनपता है और वे सर्वहित से जुड़ना ही नहीं चाहते। सत्ता के घमंड का अंकुश बेहद खतरनाक होता है, इसे सिरे से खत्म करना होगा। इस दिशा में हम सबको इस तरह से एक होना होगा कि कोई भी दूसरा देश हमें आंख दिखाने की हिम्मत न करे। इसके लिए हमें एक-दूसरे के प्रति विनम्र रहना होगा। विनम्रता की मिट्टी से किया गया स्नान ही हमें पवित्र मन का मालिक बनाता है।

Related Articles

Back to top button