संपादकीय

क्या एसआईआर ‘बेमानी’ है?

अंतत: चुनाव आयोग को लौट कर उसी बिंदु पर आना पड़ा, जहां से उसने मतदाता सूचियों के शुद्धिकरण के लिए ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) शुरू किया था। अब चुनाव आयोग ने राज्यों और संघशासित क्षेत्रों के मुख्य चुनाव अधिकारियों (सीईओ) को लिखित निर्देश दिए हैं कि पुराने मतदाता भी फॉर्म 6 भर सकते हैं और इस तरह अधिकृत मतदाता बन सकते हैं। जिनके नाम मतदाता सूची में थे और एसआईआर के दौरान हटा दिए गए, वे मतदाता फॉर्म 6 के जरिए नया आवेदन कर ‘मतदाता’ बन सकते हैं। एसआईआर के दौरान यह व्यवस्था नहीं थी, बल्कि चुनाव आयोग ने फॉर्म 6 के साथ एक हलफनामा भी जोड़ दिया था, जिसमें घोषणा करना ‘अनिवार्य’ तय किया गया था कि वह पहली बार मतदाता बनने के लिए आवेदन कर रहा है। उस हलफनामे में माता-पिता, दादा-दादी आदि के मतदाता होने की भी घोषणा करनी पड़ती थी। यह मामला अब सर्वोच्च अदालत के विचाराधीन है, लेकिन चुनाव आयोग को ‘बुद्धू की तरह लौट कर घर आना’ पड़ा है। अब कोई भी फॉर्म 6 भर कर मतदाता बन सकता है। देश के जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 31 के तहत ऐसा करना ‘दंडनीय अपराध’ है। यदि पुराना मतदाता फॉर्म 6 के जरिए आवेदन करता है, तो उसे एक साल जेल की सजा तक हो सकती है। लेकिन सर्वोच्च अदालत में प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली न्यायिक पीठ ने व्यवस्था दी थी कि जिनके नाम छूट गए हैं या गायब हैं अथवा काट दिए गए हैं, वे फॉर्म 6 के जरिए भी आवेदन कर सकते हैं। उनके खिलाफ कोई मुकदमा नहीं चलाया जाएगा और न ही उन्हें सजा होगी।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी इसी आशय की बात कही थी। सवाल है कि क्या अदालतें संसद द्वारा पारित और स्थापित कानून के खिलाफ भी व्यवस्था अथवा फैसला दे सकती हैं? सर्वोच्च अदालत की न्यायिक पीठ ने ही आयोग से कडक़ सवाल पूछा था कि पुराने मतदाताओं से फॉर्म 6 क्यों भरवाया जा रहा है? उनसे फॉर्म 8 के जरिए आवेदन लिए जाएं और स्वीकार किए जाएं। इस न्यायिक विरोधाभास को क्या समझा जाए? अहम सवाल तो यह है कि क्या एसआईआर का संपूर्ण अभियान ही बेमानी साबित हुआ? दरअसल अब चुनाव आयोग का कहना है कि यदि पुराने, छूटे हुए मतदाता भी फॉर्म 6 के जरिए आवेदन करते हैं, तो उसे ‘झूठी घोषणा’ नहीं माना जाएगा, लिहाजा दंडनीय कानूनी कार्रवाई भी नहीं की जाएगी। आश्चर्यजनक है कि एक संवैधानिक संस्था ही ‘संवैधानिक कानून’ के खिलाफ काम कर रही है! एसआईआर का अभियान 13 राज्यों और संघशासित क्षेत्रों में सम्पन्न हो चुका है। अंतिम मतदाता सूचियां भी जारी की जा चुकी हैं। कुछ संशोधन तो जारी रहेंगे, उनकी पूरक सूचियां प्रकाशित की जाएंगी। अभी तक के शुद्धिकरण में 3 करोड़ से अधिक ऐसे मतदाता सामने आए हैं, जिनका कोई अता-पता नहीं है। वे कौन हैं? किस मंगल ग्रह पर चले गए? कोई जानकारी नहीं है। वैसे यह बेहद अजीब स्थिति है, क्योंकि उनके नाम मतदाता सूची में रहे हैं। जाहिर है कि उन्होंने मतदान भी किया होगा! वे ‘दिवंगत’ की सूची में भी नहीं हैं। उप्र के सीईओ नवदीप रिणवा ने एक साक्षात्कार में खुलासा किया है कि उप्र में 7-8 लाख लोग ऐसे रहे, जिन्होंने अधिकृत फॉर्म भर कर नहीं लौटाए। बीएलओ बार-बार उनके आवास पर गए। अब तो उन्होंने मिलना ही बंद कर दिया है। क्या उन्हें ‘घुसपैठिए’ अथवा ‘फर्जी मतदाता’ मान लिया जाए? ऐसे 3 करोड़ से अधिक ‘पूर्व मतदाताओं’ को गृहमंत्री अमित शाह ने ‘बांग्लादेशी घुसपैठिए’ करार दिया है। मगर सवाल है कि यह आंकड़ा अचानक कहां से आ गया?

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