दीपावली : दीप जलें, मन का अंधकार मिटे

किसी जरूरतमंद के घर में दीप जलाना, किसी निराश व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान लाना और किसी अकेले बुजुर्ग के साथ कुछ पल बिताना भी उतना ही पुण्यकारी है जितना मंदिर में दीप प्रज्वलित करना। वास्तव में दीपावली की सार्थकता इस बात से तय नहीं होगी कि हमने कितने दीप जलाए, बल्कि इससे होगी कि हमने अपने भीतर के अहंकार के कितने अंधेरों को मिटाया…
दीपावली केवल दीप जलाने, मिठाइयां बांटने और घरों को सजाने का पर्व नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति के उस शाश्वत दर्शन का प्रतीक है जो मनुष्य को अंधकार से प्रकाश, अज्ञान से ज्ञान और अधर्म से धर्म की ओर बढऩे की प्रेरणा देता है। कार्तिक मास की अमावस्या की काली रात में असंख्य दीपों का प्रज्वलित होना इस विश्वास को मजबूत करता है कि अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, प्रकाश की एक छोटी-सी किरण उसे चुनौती देने के लिए पर्याप्त है। यही दीपावली का आध्यात्मिक सार और जीवन का सबसे बड़ा संदेश है। पौराणिक मान्यता के अनुसार त्रेतायुग में भगवान श्रीराम चौदह वर्ष का वनवास पूरा करने और लंकापति रावण का वध कर माता सीता तथा लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे थे। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के स्वागत में अयोध्यावासियों ने दीप प्रज्वलित कर पूरी नगरी को प्रकाशमय कर दिया था। यह प्रसंग केवल एक राजा की घर वापसी का उत्सव नहीं, बल्कि अहंकार पर विनम्रता, अन्याय पर न्याय और अधर्म पर धर्म की विजय का उद्घोष है। श्रीराम का जीवन हमें सिखाता है कि सत्ता से बड़ा कर्तव्य, अधिकार से बड़ा दायित्व और व्यक्तिगत स्वार्थ से बड़ा लोककल्याण होता है। दीपावली की अमावस्या को माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा का विशेष विधान है। लक्ष्मी समृद्धि की प्रतीक हैं और गणेश बुद्धि, विवेक तथा शुभारंभ के आराध्य। किंतु आज हमें स्वयं से यह प्रश्न भी पूछना चाहिए कि क्या केवल धन-संपत्ति अर्जित कर लेना ही समृद्धि है?
यदि घर में धन है, लेकिन रिश्तों में प्रेम नहीं, समाज में वैभव है, लेकिन गरीब के प्रति संवेदना नहीं, शिक्षा है, लेकिन चरित्र नहीं, तो ऐसी समृद्धि का वास्तविक मूल्य क्या है? लक्ष्मी की आराधना तभी सार्थक है जब धन के साथ सद्बुद्धि, ईमानदारी और परोपकार भी हमारे जीवन का हिस्सा बनें। दीपावली का धार्मिक महत्त्व किसी एक परंपरा तक सीमित नहीं है। दक्षिण भारत में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध को नरक चतुर्दशी के रूप में मनाया जाता है। जैन धर्म में भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण दिवस का विशेष महत्त्व है। सिख समुदाय इस अवसर को बंदी छोड़ दिवस के रूप में मनाता है, जो गुरु हरगोबिंद साहिब जी की मुक्ति और 52 राजाओं की रिहाई की स्मृति से जुड़ा है। पूर्वी भारत में मां काली की आराधना होती है। इन विविध मान्यताओं में एक साझा संदेश छिपा है- मानवता, मुक्ति, न्याय और सद्भाव। यही भारतीय संस्कृति की वास्तविक शक्ति है कि अलग-अलग आस्थाएं होते हुए भी हमारे उत्सव एक-दूसरे के आनंद में सहभागी बनते हैं। धनतेरस से भाई दूज तक पांच दिनों तक चलने वाला यह उत्सव स्वास्थ्य, समृद्धि, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और पारिवारिक संबंधों की मधुरता का संदेश देता है। नरक चतुर्दशी बुराई के अंत, गोवर्धन पूजा प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण तथा भाई दूज भाई-बहन के आत्मीय संबंधों का प्रतीक है। इस प्रकार दीपावली का प्रत्येक दिन जीवन के किसी न किसी महत्त्वपूर्ण मूल्य से जुड़ा हुआ है। इस पर्व का विद्यार्थियों के लिए विशेष संदेश है। जिस प्रकार एक दीपक स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देता है, उसी प्रकार शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल परीक्षा में अंक प्राप्त करना अथवा रोजगार हासिल करना नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार, संवेदनशील और चरित्रवान नागरिक बनना है। आज विद्यार्थियों को यह समझने की आवश्यकता है कि अज्ञान का अंधकार पुस्तकीय ज्ञान से ही नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण आचरण से दूर होता है। झूठ, नकल, ईष्र्या, नशा, अनुशासनहीनता और सामाजिक भेदभाव ऐसे अंधकार हैं जिन्हें जीवन से दूर करना ही सच्ची दीपावली है। विद्यार्थी संकल्प लें कि वे अपने ज्ञान का उपयोग केवल व्यक्तिगत सफलता के लिए नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के उत्थान के लिए भी करेंगे।
विडंबना यह है कि जिस दीपावली का मूल संदेश प्रकाश और पवित्रता है, उसी अवसर पर हम प्रदूषण, दिखावे और अनावश्यक खर्च की होड़ में शामिल हो जाते हैं। लाखों रुपए आतिशबाजी पर खर्च कर दिए जाते हैं, जबकि आसपास ऐसे परिवार भी होते हैं जिनके घरों में आर्थिक अभाव के कारण दीप तक नहीं जल पाते। तेज आवाज वाले पटाखे बुजुर्गों, बच्चों, बीमार व्यक्तियों और पशु-पक्षियों के लिए परेशानी का कारण बनते हैं। क्या हमारी धार्मिक आस्था का तकाजा नहीं कि उत्सव मनाते समय दूसरों के अधिकार और सुविधाओं का भी ध्यान रखें? मिट्टी के दीये खरीदकर स्थानीय कुम्हारों को आर्थिक संबल देना, जरूरतमंदों के साथ खुशियां बांटना और पर्यावरण के अनुकूल दीपावली मनाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। आज समाज को सबसे अधिक आवश्यकता आपसी विश्वास, सहिष्णुता और सामाजिक एकता की है। धर्म, जाति, भाषा और आर्थिक स्थिति के आधार पर बढ़ती दूरियां हमारी सांस्कृतिक विरासत के अनुरूप नहीं हैं। दीपावली हमें सिखाती है कि प्रकाश किसी एक घर या वर्ग की संपत्ति नहीं होता, वह सबके लिए होता है।
इसलिए किसी जरूरतमंद के घर में दीप जलाना, किसी निराश व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान लाना और किसी अकेले बुजुर्ग के साथ कुछ पल बिताना भी उतना ही पुण्यकारी है जितना मंदिर में दीप प्रज्वलित करना। वास्तव में दीपावली की सार्थकता इस बात से तय नहीं होगी कि हमने कितने दीप जलाए, कितनी मिठाइयां बांटीं या कितनी खरीददारी की, बल्कि इससे होगी कि हमने अपने भीतर के अहंकार, ईष्र्या, घृणा और स्वार्थ के कितने अंधेरों को मिटाया। आइए, इस दीपोत्सव पर संकल्प लें कि हमारे घरों के साथ हमारे विचार भी प्रकाशित होंगे, हमारी पूजा के साथ हमारा व्यवहार भी पवित्र होगा और हमारी खुशियों में समाज के अंतिम व्यक्ति की सहभागिता भी सुनिश्चित होगी। क्योंकि दीपावली का असली उत्सव तब है, जब दीप केवल घरों में नहीं, बल्कि इनसान के दिलों में भी जलें।-डा. अनुज आचार्य




