संपादकीय

 ‘दूषित’ शासन के शिकार

आजकल महाराष्ट्र में नगरपालिका चुनाव पूरे जोर-शोर से चल रहे हैं। सत्ताधारी भाजपा रंग-बिरंगे वादों के गुब्बारे आसमान में उड़ा रही है। लेकिन इंदौर और गुजरात के गांधीनगर में हुई भयानक घटनाओं ने इन गुब्बारों की हवा निकालकर रख दी है। इंदौर में दूषित पानी का कहर पिछले छह-सात दिनों से थमने का नाम नहीं ले रहा है। इसी बीच गुजरात के गांधीनगर में भी यह बात सामने आई है कि दूषित पानी के कारण सौ से अधिक बच्चे बीमार पड़ गए हैं। हालांकि, सौभाग्य से गांधीनगर में किसी की जान नहीं गई है, लेकिन इंदौर में दूषित पानी से मरने वालों की संख्या बढ़कर १७ हो गई है। इन दोनों राज्यों और नगरपालिकाओं में भाजपा ही सत्ता में है। गुजरात तो प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का गृह राज्य भी है। भाजपाई और अंधभक्त वर्षों से मोदी के ‘गुजरात मॉडल’ का ढोल पीटते आ रहे हैं। यही मंडली इंदौर शहर के विकास प्रबंधन का ढोल भी पीटती रहती है। फिर भी वहां दूषित पानी से १७ लोगों की मौत हो चुकी है। इसके अलावा सैकड़ों लोग अस्पतालों में इलाज करा रहे हैं। उनमें से कई की हालत गंभीर है। लगभग दो हजार निवासी इस दूषित पानी से प्रभावित हुए हैं। इंदौर शहर को ‘स्वच्छ शहर’ और वहां के भाजपा प्रशासन को ‘कुशल’ बताया जाता था, लेकिन अब इस प्रशासन की पोल खुल गई है। दूषित पानी के संबंध में नगरपालिका को शिकायतें मिलीं, बावजूद इसके
शिकायतों को नजरअंदाज किया
गया। भागीरथपुरा क्षेत्र में जहां इस जहरीले पानी से सबसे ज्यादा तबाही हुई, दूषित पानी की शिकायतों के मद्देनजर नई पाइपलाइन बिछाने के लिए निविदा भी जारी की गई थी। हालांकि, वह निविदा लालफीताशाही में फंसकर रह गई। नगरपालिका प्रशासन ने न तो पाइप बदले और न ही पुरानी पाइपों की मरम्मत की। सत्ताधारियों की इसी लापरवाही के कारण शहर में १७ निर्दोष लोगों की जान चली गई। नागरिकों को स्वच्छ पानी उपलब्ध कराना किसी भी स्थानीय स्वशासन निकाय के सत्ताधारियों का कम से कम प्राथमिक कर्तव्य है। इंदौर में भाजपा के लोगों ने न केवल इस प्राथमिक कर्तव्य को खूंटी पर टांग दिया, बल्कि आम इंदौरवासियों के घावों पर नमक भी छिड़का। वरिष्ठ भाजपा नेता, स्थानीय विधायक और राज्य शहरी विकास मंत्री वैâलाश विजयवर्गीय ने इंदौरवासियों से माफी मांगने के बजाय एक पत्रकार के सवाल का जवाब देते हुए अभद्र लहजे में कहा, ‘फोकट का सवाल पूछते हो’ उन्होंने अपशब्दों का भी प्रयोग किया। बाद में उन्होंने माफी वगैरह मांग ली, लेकिन भाजपा का जो असली चेहरा सामने आना था वो आ ही गया। मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता उमा भारती ने भी इस घटना को लेकर अपनी पार्टी को आड़े हाथों लेते हुए कहा, ‘मध्य प्रदेश सरकार को इस पाप का प्रायश्चित करना चाहिए।’ अब
१७ निर्दोषों की मौत के बाद
जागी सत्ताधारी पार्टी ने पानी के नमूने लेना, उनकी जांच करना और अन्य उपाय करना शुरू कर दिया है। लेकिन क्या इससे नाहक जिंदगी गंवाने वालों की जान वापस लाई जा सकेगी? क्या आपकी खोई हुई प्रतिष्ठा बहाल हो सकेगी? मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने दस साल पहले ही राज्य सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी थी, जिसमें कहा गया था कि न केवल इंदौर, बल्कि राज्य के कई अन्य स्थानों का पेयजल दूषित और पीने के लिए असुरक्षित है। लेकिन भाजपा की सत्ताधारी पार्टी ने इसे दबा दिया। यदि इस रिपोर्ट के अनुसार समय पर कार्रवाई की गई होती तो इंदौर में दूषित पानी के शिकार लोगों की जान बचाई जा सकती थी। केंद्र, राज्य और नगरपालिका की सत्ता एक ही पार्टी, यानी भाजपा को सौंप दें। इससे राज्यों और शहरों का तीव्र और सर्वांगीण विकास होगा, ऐसा राग भाजपाई हमेशा अलापते रहते हैं। महाराष्ट्र में नगरपालिका चुनावों के प्रचार में भी वे यही राग अलाप रहे हैं, लेकिन इंदौर और गांधीनगर में वर्षों तक शीर्ष से नीचे तक सत्ता में रहने के बावजूद आप नागरिकों को स्वच्छ पेयजल क्यों नहीं उपलब्ध करा सके? इंदौर में १७ लोगों की मौत क्यों नहीं रोक सके? आपके ‘स्वच्छ’ शासन के दांत क्यों सड़ गए? क्योंकि ये मौतें दूषित पानी से नहीं, बल्कि आपके ‘प्रदूषित’ शासन के चलते हुई हैं। नगरपालिका चुनावों में ‘स्वच्छ’ शासन का ढोल पीट रहे भाजपाइयों से मध्य प्रदेश के ‘दूषित’ शासन के बारे में जनता को जवाब मांगना चाहिए!

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