‘रामायण’ में इस रोल के लिए चुने गए थे सुनील लहरी, 1 संयोग ने बदल दी किस्मत, बन बैठे सबके चहेते ‘सुमित्रा नंदन’

नई दिल्ली. रामानंद सागर की ‘रामायण’ भारतीय टेलीविजन का वह सुनहरा अध्याय है, जिसने आस्था और मनोरंजन के संगम से इतिहास रच दिया. 1987-88 के दौर में दूरदर्शन पर आई इस कृति ने वाल्मीकि रामायण की पावन गाथा को हर भारतीय घर की चौखट तक पहुंचाया. शो के हर कलाकार को दर्शकों ने भगवान के समान दर्जा दिया. चाहे प्रभु राम के रूप में अरुण गोविल हों, माता सीता बनीं दीपिका चिखलिया या लक्ष्मण का किरदार निभाने वाले सुनील लहरी. सुनील ने लक्ष्मण की वीरता और भाई के प्रति अगाध प्रेम को पर्दे पर इस कदर जीवंत किया कि वह ‘सुमित्रा नंदन’ के रूप में घर-घर की पहचान बन गए. आज 9 जनवरी को लक्ष्मण के किरदार को अमर बनाने वाले सुनील लहरी अपना जन्मदिन मना रहे हैं.
‘रामायण’ ने सुनील लहरी को रातोंरात स्टार बना दिया. लक्ष्मण के रूप में उनका समर्पण, भावुकता और भाईचारे का चित्रण दर्शकों को इतना भाया कि आज भी लोग उन्हें इसी नाम से पुकारते हैं. शो की लोकप्रियता ने न केवल उनके करियर को नई ऊंचाइयां दीं, बल्कि भारतीय टेलीविजन के इतिहास में एक मिसाल कायम की. हालांकि, सुनील लहरी को यह आइकॉनिक किरदार मिलना पूरी तरह किस्मत का खेल था.
शत्रुघ्न के किरदार के लिए सिलेक्ट हुए थे सुनील लहरी
सुनील लहरी ने खुद इंटरव्यू में बताया कि उन्हें भगवान लक्ष्मण का किरदार कैसे मिला. गजब की बात है कि जब उन्हें पता चला कि रामानंद सागर रामायण सीरियल लेकर आ रहे हैं और किरदारों के लिए ऑडिशन चल रहा है, तो वह भी स्टूडियो गए और ऑडिशन दिया. उनका चयन भी हो गया, मगर लक्ष्मण के लिए नहीं बल्कि शत्रुघ्न के रोल के लिए.
लक्ष्मण का रोल मूल रूप से शशि पुरी को दिया गया था, लेकिन कुछ समस्याओं की वजह से शशि पुरी ने रोल छोड़ दिया. एक दिन रामानंद सागर ने सुनील को देखकर कहा कि वह लक्ष्मण का किरदार निभाएं. शशि पुरी ने भी खुद सुनील को इस रोल को करने की सलाह दी. इस तरह सुनील लहरी ‘सुमित्रा नंदन लक्ष्मण’ बन गए और उनका करियर हमेशा के लिए बदल गया.
शुरुआती करियर में सुनील लहरी को करना पड़ा स्ट्रगल
लक्ष्मण की भूमिका को छोटे पर्दे पर शानदार तरीके से निभाकर घर-घर लोकप्रिय हुए सुनील लहरी का शुरुआती करियर आसान नहीं था बल्कि संघर्षों से भरा था. वह दफ्तर-दफ्तर घूमते, ऑडिशन देते, लेकिन रिजेक्शन ही मिलता. थकान और निराशा उनके रोजमर्रा का हिस्सा बन गई थी. ऐसे मुश्किल दिनों में उनका सबसे सच्चा साथी एक पुराना टेप रिकॉर्डर था. सुनील ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर प्रशंसकों को उससे रूबरू कराया था.
संघर्ष के दिनों में टेप रिकॉर्डर पर सुनते थे यह खास गाना
रिजेक्शन के बाद जब मन उदास हो जाता, तो वह टेप रिकॉर्डर में कैसेट लगाकर गाने सुनते. उनका फेवरिट गाना था ‘ओ राही चल’. यह गाना उन्हें कभी न रुकने और आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देता था. सुनील ने बताया कि संघर्ष के दिनों में टेप रिकॉर्डर ने उनका बहुत साथ दिया और आज भी दे रहा है.




