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जयपुर में सेना दिवस, पराक्रम का उत्सव

आज आवश्यकता है कि भारत सरकार रक्षा खरीद और सैन्य सुधारों को केवल घोषणाओं तक सीमित न रखे, बल्कि उन्हें समयबद्ध ढंग से लागू करे। आधुनिक, पेशेवर और आत्मनिर्भर भारतीय सेना केवल सीमा सुरक्षा का साधन नहीं, बल्कि भारत के वैश्विक आत्मविश्वास की पहचान होगी…

भारत जैसे विशाल, विविधतापूर्ण और संवेदनशील भू-राजनीतिक परिवेश वाले देश के लिए सेना केवल एक सुरक्षा बल नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संप्रभुता, आत्मसम्मान और स्थायित्व की आधारशिला है। हर वर्ष 15 जनवरी को मनाया जाने वाला सेना दिवस इसी गौरवशाली परंपरा और बलिदान की याद दिलाता है। इस बार राजस्थान की राजधानी जयपुर में सेना दिवस परेड का आयोजन केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि इस संदेश का उद्घोष है कि भारतीय सेना अब जनता के और अधिक निकट आकर अपने शौर्य, तकनीकी क्षमता और पेशेवर प्रतिबद्धता का सार्वजनिक प्रदर्शन कर रही है। सेना दिवस मनाने की परंपरा हमें उन पुरानी यादों का पुन: स्मरण करवाती है, जब 15 जनवरी 1949 को फील्ड मार्शल केएम करियप्पा ने स्वतंत्र भारत के पहले भारतीय सेना प्रमुख के रूप में पदभार संभाला था। यह केवल एक पदभार ग्रहण नहीं था, बल्कि औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकलकर स्वदेशी सैन्य नेतृत्व की शुरुआत थी। तब से लेकर आज तक भारतीय सेना ने युद्ध, आतंकवाद, आपदा प्रबंधन और शांति स्थापना, हर मोर्चे पर अपनी क्षमता सिद्ध की है। किंतु इतिहास गवाह है कि जब-जब हमारी सैन्य तैयारियां कमजोर पड़ीं या राष्ट्रीय एकता शिथिल हुई, तब-तब बाहरी शक्तियों ने हमें चुनौती दी।

1962 का चीन युद्ध हो या सीमापार आतंकवाद की निरंतर चुनौती, ये सभी हमें सजग रहने की चेतावनी देते हैं। आज का समय पारंपरिक युद्धों का नहीं, बल्कि बहुआयामी संघर्षों का है। सीमाओं पर टकराव के साथ-साथ साइबर युद्ध, सूचना युद्ध, ड्रोन और मिसाइल तकनीक, अंतरिक्ष और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध नए रणक्षेत्र बन चुके हैं। ऐसे में भारतीय सेना की जरूरत केवल संख्या बल की नहीं, बल्कि उच्च प्रशिक्षित, तकनीकी रूप से दक्ष और बौद्धिक रूप से सक्षम पेशेवर सैनिकों की भी है। वर्तमान में भारतीय सेना अधिकारियों की लगभग 18 प्रतिशत कमी से जूझ रही है। ‘मशीन के पीछे खड़ा आदमी ही महत्वपूर्ण है’, यह कहावत आज के युद्ध परिदृश्य में और अधिक प्रासंगिक हो जाती है। भारत आज भी अपनी रक्षा जरूरतों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है। दशकों तक रूस और यूरोपीय देशों पर निर्भरता रही है। ‘आत्मनिर्भर भारत’ के तहत स्वदेशीकरण की दिशा में प्रयास अवश्य हुए हैं, तेजस विमान, आईएनएस विक्रांत जैसे उदाहरण आशा जगाते हैं, लेकिन अत्याधुनिक तकनीक, विशेषकर ड्रोन तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, हाइपरसोनिक मिसाइल, साइबर और अंतरिक्ष युद्ध क्षमताओं में हमें अभी लंबा रास्ता तय करना है। वैश्विक परिदृश्य में भारत का लगभग 75-80 बिलियन डॉलर का रक्षा बजट, जिसमें से आधे से अधिक वेतन और पेंशन में चला जाता है, हमारी सीमाओं को रेखांकित करता है। हमें चीन और पाकिस्तान दोनों से लगी सक्रिय सीमाओं पर सतर्क रहना पड़ता है तो अन्य पड़ोसी देश भी लगातार सिरदर्द पैदा कर रहे हैं। डॉनल्ड ट्रंप का हालिया दौर में बदला मिजाज संकेत देता है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में स्थायी मित्रता नहीं, स्थायी हित होते हैं। रूसी तेल आयात को लेकर अमेरिकी दबाव, अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अमेरिका का बाहर निकलना और भारतीय छात्रों को लेकर सख्त रुख अपनाना, ये सभी भारत को यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि, भारत के लिए अपनी रक्षा और विदेश नीति में आत्मनिर्भरता और संतुलन बैठाना कितना अनिवार्य हो गया है।

सैनिकों को कठोर शारीरिक प्रशिक्षण के साथ-साथ आधुनिक हथियारों के संचालन, कंप्यूटर, संचार, साइबर सुरक्षा, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, ड्रोन युद्ध, मनोवैज्ञानिक और मीडिया युद्ध की समग्र शिक्षा देना समय की मांग है। सोशल मीडिया, दुष्प्रचार, मनोवैज्ञानिक दबाव और हनीट्रैप जैसी चुनौतियां आधुनिक युद्ध का हिस्सा बन चुकी हैं, जिनसे निपटने के लिए हमारे सैनिकों की बौद्धिक और मानसिक तैयारी अनिवार्य है। इसके साथ ही पारंपरिक कार्यप्रणालियों, नियमों, रहन-सहन और व्यवस्थाओं में सुधार कर सैनिकों का मनोबल बढ़ाना भी आवश्यक है। भर्ती और पद संरचना में सुधार, उच्च शिक्षित युवाओं को नेतृत्व भूमिकाओं में लाना, पेशेवर सैन्य शिक्षा को प्राथमिकता देना और आधुनिक सैन्य पहचान के अनुरूप वेशभूषा एवं पदनामों पर विचार करना, ये सभी कदम सेना को भविष्य के लिए अधिक सक्षम बना सकते हैं। इसके लिए यह जरूरी है कि अग्निवीर भर्ती की जगह पुन: नियमित सैनिकों की भर्ती शुरू की जाए। भारतीय सेना के संख्या बल का विश्लेषण करें तो संसद की स्थायी समिति को रक्षा मंत्रालय द्वारा सूचित किया गया है कि, भारतीय सेना में 1 जुलाई 2024 तक अधिकारियों की वर्तमान संख्या 42095 है, जबकि स्वीकृत संख्या 50538 है। यानी सेना में 16.71 फीसदी अधिकारियों की कमी है। वहीं जेसीओ और एनसीओ की संख्या 1105110 है अर्थात् 7.72 फीसदी की कमी यहां भी है। कोरोना काल में भी 3 साल तक भर्तियां नहीं होने के कारण जवानों के संख्या बल में लगभग 16 फीसदी की कमी आई है।

इसके अलावा हमारा नाटो की तरह कोई गठजोड़ भी नहीं है। अब चीन, पाकिस्तान, रूस और उत्तर कोरिया जैसे देश भी अमेरिका के विरुद्ध लामबंद हो गए हैं। इन हालात में हमारी फौज को स्वतंत्र सैन्य ताकत बनाने की तत्काल जरूरत है और बिना पेशेवर नेतृत्व के यह मुकाम हासिल करना आसान नहीं होगा। जयपुर में आयोजित होने वाली सेना दिवस परेड इसी बदलाव का प्रतीक है, एक ऐसी सेना जो परंपरा और आधुनिकता के संतुलन के साथ आगे बढ़ रही है। आज आवश्यकता है कि भारत सरकार रक्षा खरीद और सैन्य सुधारों को केवल घोषणाओं तक सीमित न रखे, बल्कि उन्हें समयबद्ध ढंग से लागू करे। आधुनिक, पेशेवर और आत्मनिर्भर भारतीय सेना केवल सीमा सुरक्षा का साधन नहीं, बल्कि भारत के वैश्विक आत्मविश्वास की पहचान होगी। आने वाले समय में जिस प्रकार से अमेरिका जैसे देश दुनिया के देशों को आंखें दिखा रहे हैं, तब एक सशक्त भारतीय सेना ही राष्ट्र को सुरक्षित, स्वतंत्र और सम्मानित बनाए रख सकती है।-अनुज आचार्य

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