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लोकतंत्र में मताधिकार व नागरिक उत्तरदायित्व

एक वोट अकेला नहीं होता, वह लाखों विचारों के साथ मिलकर परिवर्तन की शक्ति बनता है। इसे आत्मसात करने की जरूरत है…

विश्व की शासन व्यवस्थाओं में लोकतंत्र को बेहतर व्यवस्थाओं में से एक माना जाता है। क्योंकि लोकतंत्र जहां एक ओर विविधता को स्वीकार करता है, वहीं दूसरी ओर आलोचना की अनुमति भी प्रदान करता है। लोकतान्त्रिक व्यवस्था जनता की भागीदारी, स्वतंत्रता, समानता और प्रतिनिधित्व पर आधारित होने के कारण ‘मत’ लोकतंत्र का सबसे सशक्त हथियार है। यही वह ताकत है जिसके माध्यम से जनता सत्ता को दिशा देती है, सरकारों को वैधता प्रदान करती है, तथा शासन व्यवस्था को उत्तरदायी बनाती है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में मताधिकार केवल एक संवैधानिक अधिकार नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समानता और जन-संप्रभुता का प्रतीक है। विश्व इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि मताधिकार कभी भी सत्ता द्वारा सहजता से प्रदान नहीं किया गया। प्राचीन एथेंस में लोकतंत्र की अवधारणा विकसित हुई, परंतु वहां भी मताधिकार केवल स्वतंत्र पुरुष नागरिकों तक सीमित था।

महिलाओं, दासों और विदेशी नागरिकों को इस अधिकार से वंचित रखा गया। मध्ययुगीन यूरोप में राजतंत्र का वर्चस्व रहा, जहां जनता की राजनीतिक भागीदारी की कोई कल्पना ही नहीं थी। आधुनिक लोकतंत्र के विकास के साथ ही मताधिकार के लिए संघर्ष प्रारंभ हुआ। ब्रिटेन में मजदूर वर्ग और महिलाओं ने लंबे आंदोलनों के बाद वोट का अधिकार प्राप्त किया। अमेरिका में अश्वेत नागरिकों को संवैधानिक रूप से मताधिकार मिलने के बावजूद व्यावहारिक रूप से 1960 के दशक तक मतदान से रोका जाता रहा। यह इतिहास इस तथ्य को रेखांकित करता है कि मताधिकार कोई दान नहीं, बल्कि जनसंघर्षों की उपलब्धि है। भारत में मताधिकार का इतिहास भी संघर्ष और वंचना से जुड़ा रहा है। औपनिवेशिक शासन के दौरान मत देने का अधिकार अत्यंत सीमित था। 1909, 1919 और 1935 के अधिनियमों के तहत मताधिकार संपत्ति, कर और शिक्षा से जुड़ा हुआ था। महिलाओं, दलितों, आदिवासियों और गरीब तबकों के लिए यह अधिकार लगभग अप्राप्य था। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राजनीतिक चेतना तो विकसित हुई, किंतु आम जनता की निर्णायक भूमिका अभी भी सीमित थी। ऐसे में स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माताओं द्वारा सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का निर्णय एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी कदम था। 26 जनवरी 1950 को लागू भारतीय संविधान ने 21 वर्ष की आयु पूरी करने वाले प्रत्येक नागरिक को बिना किसी भेदभाव के मताधिकार प्रदान किया। बाद में जिसे संविधान के 61वें संशोधन अधिनियम 1988 के तहत घटाकर 18 वर्ष कर दिया गया। वर्ष 1950 में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का यह निर्णय उस समय के कई विकसित लोकतांत्रिक देशों से भी अधिक प्रगतिशील था। भारत का पहला आम चुनाव 1951-52 में हुआ, जिसे विश्व इतिहास का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक प्रयोग कहा गया। लगभग 17 करोड़ मतदाताओं वाला देश, जहां साक्षरता दर अत्यंत कम थी, वहां लोकतंत्र को सफल बनाना एक बड़ी चुनौती थी। चुनाव आयोग ने निरक्षर मतदाताओं के लिए चुनाव चिन्हों की व्यवस्था की, बैलट बॉक्स गांव-गांव तक पहुंचाए गए और महीनों तक चलने वाली इस प्रक्रिया में जनता ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

मतदान प्रतिशत लगभग 45.7 रहा, जो उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए उल्लेखनीय था। यह चुनाव केवल सत्ता चयन नहीं था, बल्कि लोकतंत्र में जनता के विश्वास की परीक्षा थी। इसके बाद के दशकों में भारत का लोकतंत्र अनेक उतार-चढ़ावों से गुजरा। 21वीं सदी आने तक स्थिति में कुछ सुधार हुआ। 2014 के आम चुनावों में मतदान प्रतिशत 66.4 और 2019 में 67.4 प्रतिशत तक पहुंच गया, जो अब तक का सर्वाधिक है। जबकि वर्ष 2024 के चुनावों में वोट प्रतिशत 66.10 प्रतिशत रहा। यह एक कटु सत्य है कि आज वही मताधिकार, जिसे प्राप्त करने के लिए विश्व और भारत में सदियों तक संघर्ष हुआ, उपेक्षा और उदासीनता का शिकार होता जा रहा है। चुनाव आते हैं, सरकारें बनती हैं, लेकिन मतदाता का एक बड़ा वर्ग मतदान केंद्र से दूरी बनाए रखता है। ‘सब नेता एक जैसे हैं’, ‘मेरे एक वोट से क्या फर्क पड़ेगा’ या ‘राजनीति गंदी है’ जैसे तर्क अक्सर सुनने को मिलते हैं। यह सोच लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के विपरीत है। लोकतंत्र में विकल्पों की पूर्णता नहीं, बल्कि बेहतर विकल्प का चयन महत्वपूर्ण होता है। मतदान न करना व्यवस्था से मोहभंग नहीं, बल्कि उसे और कमजोर करना है। जब कोई नागरिक मतदान नहीं करता, तो वह स्वयं को निर्णय प्रक्रिया से बाहर कर लेता है। वह अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार छोड़ देता है और परोक्ष रूप से गलत नेतृत्व को स्वीकार करता है। लोकतंत्र में भ्रष्टाचार, कुशासन और अयोग्य नेतृत्व की शिकायत करना आसान है, किंतु यह आत्ममंथन भी आवश्यक है कि क्या हमने अपनी भूमिका निभाई है? यदि कोई नागरिक मतदान के दिन घर पर बैठा रहता है और बाद में सरकार की नीतियों पर प्रश्न उठाता है, तो उसकी नैतिक स्थिति कमजोर हो जाती है। यह कथन कठोर लग सकता है, परंतु इसमें गहरा सत्य निहित है कि जो व्यक्ति वोट का प्रयोग नहीं करता, उसे लोकतंत्र में रहते हुए भ्रष्टाचारी नेताओं के खिलाफ बोलने का नैतिक अधिकार खोखला पड़ जाता है। हालांकि मताधिकार के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए समय-समय पर जागरूकता अभियान तथा नुक्कड़ नाटक चलाए जाते हंै।

इसके अतिरिक्त 25 जनवरी, 2011 को राष्ट्रीय मतदाता दिवस के रूप में मनाने का निर्णय युवाओं के मताधिकार के प्रति कम होते रुझान को देखकर लिया गया। बावजूद इसके यह विडंबना ही है कि सोशल मीडिया पर राजनीतिक बहस, सरकार की आलोचना और वैचारिक संघर्ष तो दिखाई देता है, किंतु मतदान केंद्र तक पहुंचने में वही वर्ग पीछे रह जाता है। लोकतंत्र केवल ऑनलाइन विमर्श से मजबूत नहीं होता, बल्कि मतपेटी तक पहुंचने से सशक्त होता है। युवा वर्ग से विशेष अपेक्षाएं हैं। भारत एक युवा देश है, जहां बड़ी आबादी पहली बार मतदान करने वाली है। यदि यह वर्ग उदासीन रहेगा, तो लोकतंत्र का भविष्य कमजोर होगा। युवाओं को यह समझना होगा कि मतदान केवल वर्तमान सरकार चुनने का माध्यम नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने का औजार है। एक वोट अकेला नहीं होता, वह लाखों विचारों के साथ मिलकर परिवर्तन की शक्ति बनता है। इसी बात को आत्मसात करने की जरूरत है, तभी लोकतंत्र सही मायनों में समृद्ध होगा।

प्रो. सतपाल

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