संपादकीय

 कहां है गणतंत्र?

हमारे देश ने २६ जनवरी, १९४९ को संविधान अपनाया था और २६ जनवरी, १९५० को यह संविधान पूरी तरह से लागू हुआ था। तब से २६ जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। मनाया गया गणतंत्र दिवस ७७वां है। यानी देश में संविधान लागू होने और ‘कानून का शासन’ शुरू होने के बाद से साढ़े सात दशक बीत चुके हैं, लेकिन क्या आज भी देश में संविधान और कानून का शासन बचा है? ७६ साल पहले स्वतंत्र भारत के नागरिकों को कानून का शासन चलाने का अधिकार मिला था, लेकिन पिछले दस-ग्यारह वर्षों में न तो कानून का शासन कायम रहा और न ही नागरिकों को राज्य चलाने का अधिकार। लाखों बलिदान देकर, लाठी-गोलियां खाकर इस गणतंत्र को हासिल किया था, लेकिन मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से देश तानाशाही की ओर बढ़ रहा है। मोदी के समर्थक मोदी के शासनकाल को देश का ‘सच्चा स्वतंत्रता दिवस’ मानते हैं, लेकिन लोकतंत्र की मूल परिभाषा, ‘जनता द्वारा, जनता के लिए और जनता द्वारा संचालित राज’, को इन दस वर्षों में सत्ताधारी वर्ग ने मिटा दिया है। अब एक नई परिभाषा गढ़ने का काम चल रहा है, ‘दो लोगों द्वारा संचालित राज’। ऐसे में
संविधान और लोकतांत्रिक मूल्य
का क्या होगा? गणतंत्र के रूप में प्राप्त नागरिक अधिकार और विधि का शासन कैसे सुरक्षित रहेगा? केंद्र में सत्ताधारी दल और राज्यों में उनकी सरकारें राजनीतिक लाभ के लिए संविधान का हनन कर रही हैं। इसके लिए वे विभिन्न हथकंडों का उपयोग कर रहे हैं। संविधान द्वारा प्रदत्त राजनीतिक, धार्मिक और नागरिक अधिकारों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कम किया जा रहा है। धार्मिक और जातिगत भेदभाव को बढ़ावा देकर ‘सर्व धर्म समभाव’ के संवैधानिक अधिकार से वंचित किया जा रहा है। अंधभक्त इस बात का डंका पीटते हैं कि मोदी काल ही ‘संविधान का गौरव काल’ है। सच तो यह है कि इस काल में सत्तापक्ष ने जितने संविधान विरोधी कारनामे किए हैं उतना इससे पहले कभी नहीं हुए हैं। पिछले एक दशक में विपक्ष को कुचलने, विपक्षी नेताओं को ब्लैकमेल करने और उन्हें झूठे आरोपों में कैद करने के लिए संवैधानिक संस्थाओं और जांच एजेंसियों के दुरुपयोग की मात्रा पहले कभी इतनी अधिक नहीं रही। मतदाता सूचियों के पुनर्रचना के नाम पर, ‘गणतंत्र’ द्वारा प्रदत्त मतदान के संवैधानिक अधिकार को देश के करोड़ों लोगों से छीना जा रहा है। ईवीएम घोटाला और वोट चोरी के जरिए
जनता के अधिकारों पर
कुठाराघात किया जा है। राजनीतिक दबाव के कारण लोकतंत्र के चारों स्तंभ ढहने के कगार पर हैं। दिल्ली से लेकर सड़कों तक, एक भयावह स्थिति उत्पन्न हो गई है जहां ‘कानून का शासन’ का अर्थ ‘शासकों की मनमानी’ हो गया है। लोकसभा चुनावों से लेकर ग्राम पंचायत सदस्यों के चुनावों तक, हर जगह यही स्थिति है। ‘निर्विरोध चुनाव’ शासकों का नया हथियार बन गया है। इसके कारण देश की राजनीतिक नैतिकता और सदाचार अभूतपूर्व रूप से पतन की ओर अग्रसर हैं। भारतीय जनता पार्टी ‘शत-प्रतिशत केवल हम’ एकसूत्री कार्यक्रम लागू करने के लिए दिल्ली से लेकर सड़कों तक साम-दाम-दंड-भेद का उपयोग कर रही है। उनका प्रयास है कि वे उस ‘संविधान’ को और उस संविधान द्वारा जनता को प्रदत्त ‘गणतंत्र’ को भी न छोड़ें जो इस प्रयास में बाधा है। फिर भी, दिल्ली के लाल किले में गणतंत्र दिवस समारोह हमेशा की तरह उत्साह के साथ मनाया जाएगा। राष्ट्रपति देश को संबोधित करेंगे। परेड निकलेगी, लेकिन वह संविधान वह गणतंत्र कहां है जिसने साढ़े सात दशक पहले देश की जनता को यह ‘गणतंत्र’ दिया था? ७७वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर लोगों के मन में यही सवाल उठ रहा है। क्या लाल किले से दिए जानेवाले आज के भाषण से इस सवाल का जवाब मिलेगा?

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