BJP, कांग्रेस, NCP, सपा, शिवसेना… सबके सामने चुनौती, सबको बड़ी उम्मीद, महाराष्ट्र चुनाव का पूरा समीकरण

मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनाव में कांग्रेस और प्रकाश आंबेडकर की वंचित बहुजन आघाड़ी (वीबीए) के बीच गठबंधन की घोषणा के बावजूद सियासी समीकरणों में उलटफेर देखने को मिल रहा है। इसके साथ ही 5 वार्डों में मैत्रीपूर्ण मुकाबला देखने को मिलेगा।
महाराष्ट्र में निकाय चुनाव हो रहे हैं। बीएमसी में 1997 से लगातार सत्ता पर काबिज उद्धव सेना के लिए यह चुनाव अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। छगन भुजबल, नारायण राणे, संजय निरुपम जैसे नेताओं के पार्टी छोड़ने के बाद भी पार्टी को जो धक्का नहीं लगा था, वह अकेले एकनाथ शिंदे ने बगावत करके दे दिया। लगातार पांच चुनावों में सफलता के बाद इस बार उद्धव सेना से सत्ता लेने की कोशिश में लगी है, सालों तक युति में रही बीजेपी। केंद्र और राज्य में सरकार होने के बाद बीजेपी बीएमसी में ट्रिपल इंजन की सरकार चाह रही है। इसके अलावा, मैदान में अकेले उतरी कांग्रेस और समाजवादी पार्टी भी चुनौती देने की कोशिश में है। पेश है इन पार्टियों के सामने वर्तमान चुनौती पर एक विस्तृत रिपोर्ट …
शिवसेना (उद्धव) के पास इस चुनाव में नतीजे देने के अलावा कोई ठोस पर्याय नही है। 2022 में महाराष्ट्र में हुई बगावत के चलते सरकार और पार्टी गंवाने के बाद उद्धव ठाकरे के लिए यह सबसे बड़ी परीक्षा है। बीएमसी की स्थायी समिति पर लंबे समय तक पार्टी का कब्जा रहा। पार्टी में टूट के बाद कैडर में जोश भरने के लिए इस चुनाव में उद्धव खुद मैदान में मोर्चा संभाल रहे है। मनसे की स्थापना के बाद से पहली बार दोनों भाइयों (राज और उद्धव) ने युति करके मुकाबला करने का फैसला किया है। उद्धव ने पार्टी का आधार स्तंभ यानी शाखाओ का दौरा शुरू कर दिया है। बेटे आदित्य भी अपनी प्रगतिशील छविके जरिए युवाओं को लुभाने की कोशिश कर रहे है। पार्टी को मराठी
मतदाताओं के अलावा मुस्लिमों वोटर्स पर काफी भरोसा है। लोकसभा चुनाव में विपक्षी एकता के तहत मिली जीत का स्वाद पार्टी विधानसभा में दोहरा नही सकी थी। इसीलिए, केवल वोटों के गणित की संख्या से मेयर बनाने की मुश्किल चुनौती सामने कायम है।
देशभर में विस्तार के मंत्र पर चल रही बीजेपी ने बीएमसी चुनाव में पहली बार पार्टी का मेयर बनाने का संकल्प लिया है। पिछली बार महज दो सीटों से पिछड़ने वाली बीजेपी
ने चुनाव की तैयारियों में कोर-कसर नहीं छोड़ी है। शिवसेना (शिंदे) के साथ युति कर पार्टी ने विधानसभा चुनावों की सफलता को दोहराने का पूरा रोडमैप बनाया है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उप-मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की साझा मौजूदगी में चुनाव प्रचार अभियान शुरू कर पार्टी कार्यकर्ताओ को मिलकर ठाकरे बंधुओं के मुकाबले का संदेश दे रही है। मुंबई बीजेपी अध्यक्ष अमित साटम और पूर्व अध्यक्ष आशीष शेलार की जमीनी सक्रियता के अलावा सभी विधायकों को काम दिया गया है। पार्टी की तरफ से शिवसेना को दी गई 90 सीटें ही एक्स फैक्टर मानी जा रही है, इनके नतीजे सीधे मेयर की कुर्सी का गणित बनाएंगे।
कांग्रेस अपनी जन्मस्थली पर ही जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रही है। 2014 में मुंबई से पार्टी के सफाए के बाद से ही यहां फिर से कांग्रेस वह मुकाम हासिल नहीं कर पाई है। किसी समय महानगर की 6 में से 5 लोकसभा सीटें पार्टी के पास थीं। इस बार पार्टी ने संगठन में जोश भरने के लिए अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया था, लेकिन अंत में वचित बहुजन आघाडी को 62 सीटें दे दी। हर बार की तरह उम्मीदवारों की लिस्ट भी देर से जारी की। कांग्रेस को मुस्लिम और दलित वोटो के अलावा अन्य वोटो पर भरोसा है। कांग्रेस 50 से ज्यादा सीटें जीतने का ख्वाब देख रही है, लेकिन मुस्लिम वोटों के लिए UBT के अलावा सपा, एनसीपी (AP) और AIMIM जैसी पार्टियां भी मैदान में है।
मुंबई में एनसीपी का वजूद पार्टी की 1999 में स्थापना के बाद से ही कभी मजबूत नहीं रहा है। बगावत के बाद स्थिति और बदल गई है। शरद पवार फिलहाल ठाकरे बंधुओं के साथ गठबंधन कर 11 सीटों पर मैदान में है, जबकि अजित पवार अकेले 94 सीटों पर उम्मीदवार उतार चुके है। इनमे बड़ी संख्या में मुस्लिम उम्मीदवार भी है। एनसीपी (AP) के चुनाव की पूरी कमान मलिक परिवार पर है और पार्टी इस बार सीटों की संख्या बढ़ाकर सत्ता बनाने की स्थिति में आना चाह रही है। ठाकरे बंधुओं के साथ गठबंधन के चलते पार्टी को चुनावों में अच्छे मुकाबले की उम्मीद बंधी हुई है।
मुंबई में उत्तर भारतीयों और मुस्लिमों के एक बड़े वर्ग की पसंदीदा रही समाजवार्दी पार्टी फिलहाल आतंरिक खीचतान में उलझी हुई है। पार्टी हर हाल में पिछला चुनावी प्रदर्शन दोहराना चाह रही है। पार्टी के 2 विधायको में से एक रईस शेख लबे समय तक बीएमसी के मुद्दो पर पार्टी का प्रभावी चेहरा रहे है, लेकिन उनकी और प्रदेश अध्यक्ष विधायक अबू आसिम आजमी से अदावत अब जग-जाहिर हो चुकी है। इसका नुकसान भी पार्टी को उठाना पड़ सकता है। खीचतान के बीच सपा को स्थाई समिति में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए 7-8 सीटें जीतनी ही होंगी।
किस पार्टी का कैसा रहा प्रदर्शन
शिवसेना (एकत्रित)
1997- 103
2002- 97
2007- 84
2012- 75
2017- 84
बीजेपी
1997- 17
2002- 35
2007- 28
2012- 31
2017- 82
कांग्रेस
1997- 50
2002- 35
2007- 75
2012- 52
2017- 31
NCP (एकत्रित)
1997 स्थापना नहीं हुई थी
2002- 12
2007- 14
2012- 13
2017- 9
समाजवादी पार्टी
1997- 23
2002- 10
2007- 7
2012- 9
2017- 6




