ई-कचरे की समस्या और समाधान

भारत सरकार ने ई-वेस्ट रीसाइक्लिंग से खनिज निकालने के लिए एक क्रिटिकल मिनरल मिशन शुरू किया है, जिसके लिए 650 करोड़ रुपए का बजट है…
भारत ई-कचरे का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, जो सालाना लगभग 1.4 मिलियन टन ई-कचरा पैदा करता है। हालांकि कुछ अनुमानों के अनुसार यह 3.2 मिलियन टन तक भी हो सकता है। भारत दुनिया में सबसे तेजी से बढऩे वाले ई-कचरा उत्पादक देशों में से एक है और वर्तमान में विश्व स्तर पर ई-कचरा पैदा करने वाले शीर्ष पांच देशों में शामिल है। डिजिटल अर्थव्यवस्था का तेज विकास, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का बढ़ता उपयोग और गैजेट्स का बार-बार बदला जाना इस वृद्धि के प्रमुख कारण हैं। भारत अन्य देशों से अवैध रूप से फेंके गए इलेक्ट्रॉनिक कचरे का गंतव्य भी बन रहा है, जिससे यह समस्या और बढ़ जाती है। भारत में क्षेत्रवार ई-कचरे में सबसे बड़ा योगदान कंप्यूटर और आईटी उपकरणों का है, जो लगभग 70 फीसदी है। इसके बाद दूरसंचार उपकरण करीब 12 फीसदी, अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण लगभग 8 फीसदी, चिकित्सा उपकरण करीब 7 फीसदी और घरेलू इलेक्ट्रॉनिक कचरा लगभग 3-4 फीसदी है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार भारत में 7226 ई-कचरा उत्पादक हैं, जो अपने ब्रांड नाम के तहत बिजली और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाते, बेचते या आयात करते हैं। ई-कचरा प्रबंधन नियमों के तहत विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (ईपीआर) के कारण उत्पादकों के लिए एक केंद्रीय पोर्टल पर खुद को पंजीकृत करना, ई-कचरे के संग्रह और रीसाइक्लिंग के विशिष्ट लक्ष्यों को पूरा करना, और अनुपालन रिटर्न दाखिल करना अनिवार्य है। इन लगभग 7000 पंजीकृत उत्पादकों के लिए, 295 आधिकारिक रीसाइक्लर हैं जो ई-कचरे को तोडक़र उसमें से धातु और खनिज निकालते हैं और 53 रीफर्बिशर हैं जो इस्तेमाल की गई वस्तुओं की मरम्मत और नवीनीकरण करके उन्हें दोबारा इस्तेमाल लायक बनाते हैं। ये सभी मिलकर देश में पैदा होने वाले कुल ई-कचरे का केवल 5.10 फीसदी ही प्रोसेस कर पाते हैं। चूंकि अनौपचारिक क्षेत्र की पहुंच बहुत अधिक है और उसके पास सस्ते श्रम का एक बड़ा नेटवर्क है, इसलिए औपचारिक क्षेत्र ई-कचरे के संग्रह और छंटाई के लिए कबाड़ीवालों जैसे लोगों पर निर्भर है। लेकिन ईपीआर प्रक्रिया उन्हें बाहर रखती है।
ई-वेस्ट क्या है : ई-वेस्ट का मतलब ऐसे इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण (ईईई) से है जिन्हें उपयोगकर्ता अपनी उपयोगी आयु खत्म होने के बाद, या तकनीकी बदलावों के कारण पुराने या बेकार हो जाने पर फेंक देते हैं। इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण वे हैं जो बिजली या इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड से चलते हैं। ई-वेस्ट तब पैदा होता है जब ये उपकरण ठीक से काम करना बंद कर देते हैं या उपभोक्ताओं को इनकी जरूरत नहीं रहती। इसमें इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों की मैन्युफैक्चरिंग, मरम्मत, रीफर्बिशमेंट और मेंटेनेंस के दौरान निकलने वाला कचरा भी शामिल है। ई-वेस्ट के आम उदाहरण मोबाइल फोन, कंप्यूटर, लैपटॉप, प्रिंटर, टेलीविजन, रेफ्रिजरेटर, वॉशिंग मशीन, एयर कंडीशनर और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट हैं।
ई-वेस्ट : महत्त्वपूर्ण खनिजों का स्रोत : स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए खतरा होने के अलावा, बिना सही उपकरणों के ई-वेस्ट को तोडऩे से ऐसे खनिज और धातुएं बर्बाद हो जाती हैं जो सर्कुलर इकोनॉमी में बहुत अहम हो रहे हैं। ई-वेस्ट लिथियम और कोबाल्ट जैसे महत्वपूर्ण और रेयर अर्थ खनिजों का बड़ा स्रोत है, जिनका इस्तेमाल ईवी बैटरी, रिन्यूएबल एनर्जी सिस्टम और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक सामानों में होता है। कुछ अनुमानों के मुताबिक भारत के ई-वेस्ट में मौजूद कीमती धातुओं और खनिजों की कीमत 4.9 बिलियन डॉलर है। इसको देखते हुए भारत सरकार ने ई-वेस्ट रीसाइक्लिंग से खनिज निकालने के लिए एक क्रिटिकल मिनरल मिशन शुरू किया है, जिसके लिए 650 करोड़ रुपए का बजट रखा गया है। अनौपचारिक क्षेत्र के कामगारों को ट्रेनिंग देकर उन्हें इस प्रक्रिया से जोडऩे से देश की फॉर्मल रीसाइक्लिंग क्षमता तो बढ़ेगी ही, साथ ही ई-वेस्ट में छिपी कीमत भी सामने आएगी।
ई-कचरा प्रबंधन की आवश्यकता और कानूनी पृष्ठभूमि : ई-कचरे का उचित प्रबंधन पर्यावरण की सुरक्षा और मूल्यवान संसाधनों को बचाने के लिए बहुत जरूरी है। परंपरागत तरीके जैसे जलाना और असंगठित क्षेत्र में रीसाइक्लिंग करने से जहरीले तत्व निकलते हैं जो पर्यावरण और मजदूरों के स्वास्थ्य दोनों को नुकसान पहुंचाते हैं। भारत में लंबे समय तक ई-कचरे के लिए कोई अलग कानून नहीं था। औद्योगिक खतरनाक कचरे के लिए फैक्ट्रीज एक्ट, 1948 का इस्तेमाल होता था। पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 मुख्य कानून था जो पर्यावरण से जुड़े सभी मुद्दों को देखता था। इसके अलावा खतरनाक अपशिष्ट प्रबंधन नियम 1989 थे जो खतरनाक कचरे के निपटान और सीमा पार आवाजाही को नियंत्रित करते थे। लेकिन इनमें से कोई भी कानून खास तौर पर ई-कचरे के लिए नहीं बना था। इस व्यापक कानूनी ढांचे की कमी के कारण ही भारत को ई-कचरे के लिए अलग नियम बनाने की जरूरत पड़ी। ई-वेस्ट मैनेजमेंट नियम 2016 को भारत में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा इलेक्ट्रॉनिक कचरे की बढ़ती समस्या से निपटने के लिए लाया गया था।
2016 के नियम लाने के मुख्य कारण : 2011 के नियमों में विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व यानी ईपीआर तो लाया गया, पर उसे ठीक से परिभाषित नहीं किया गया और न ही सख्ती से लागू किया गया। उत्पादकों के लिए कलेक्शन का कोई तय लक्ष्य या निपटान और रीसाइक्लिंग की साफ जिम्मेदारी नहीं थी, जिससे कंपनियां बच निकलती थीं। असंगठित क्षेत्र पर कमजोर नियंत्रण के कारण वहीं सबसे ज्यादा ई-कचरा संभाला जाता था। खुलेआम जलाने और तेजाब से प्रोसेस करने जैसी खतरनाक विधियां आम थीं, जिनसे प्रदूषण और स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ीं। उपभोक्ताओं के लिए भी कोई सख्त नियम या जुर्माना नहीं था, इसलिए ई-कचरा घर के कचरे में ही फेंक दिया जाता था। इसके अलावा 2011 के नियम सिर्फ आईटी और टेलीकॉम उपकरणों पर लागू होते थे। घरेलू उपकरण और बाकी इलेक्ट्रॉनिक्स छूट गए थे, जिससे बहुत सारा ई-कचरा बिना प्रबंधन के रह गया। इन सभी कमियों को दूर करने के लिए 2016 के नियम लाए गए। बहरहाल, ई-कचरा प्रबंधन आज भारत की एक बड़ी समस्या है। मुख्य चुनौती लोगों में जागरूकता की कमी है।-अरविंद सिंह गुलेरिया




