मानसून की बारिश को भूल जाइए : अब हमें थर्मामीटर की जरूरत

पिछले एक दशक में, हमने अर्थव्यवस्था पर मौसम के प्रभाव की अपनी समझ को लगातार परिष्कृत किया है। हमारे नवीनतम निष्कर्ष बताते हैं कि बढ़ती मुद्रास्फीति और धीमी आर्थिक वृद्धि के लिए तैयार होने का समय आ गया है। कुछ साल पहले, हमने बताया था कि भारत के खाद्य उत्पादन और मुद्रास्फीति के लिए वर्षा की तुलना में जलाशयों का जलस्तर अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि इनमें भूमिगत जल भी समाहित होता है। हाल ही में, हमने अपने विश्लेषण को वर्षा और जलाशयों से आगे बढ़ाकर तापमान पर केंद्रित किया है। वैश्विक तापवृद्धि के साथ, औसत तापमान ने पिछले स्तरों को पार कर लिया है। जैसा कि हम आगे समझाएंगे, अब इनका प्रभाव व्यापक खाद्य भंडार और मुद्रास्फीति पर वर्षा और जलाशयों की तुलना में कहीं अधिक है। वास्तव में, हमने पाया है कि सतह के तापमान पर नजर रखना ही खाद्य मुद्रास्फीति की दिशा का अच्छा अनुमान लगाने के लिए पर्याप्त है। भारत के अधिकांश हिस्सों में अब हमें वर्षा पर नजर रखने की भी आवश्यकता नहीं है।
परिणामस्वरूप, हम सतह के तापमान के महत्व पर अपने शोध को आगे बढ़ाते हुए यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि अल नीनो वर्षों में विशेष रूप से क्या होता है। अमरीका में राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन के वैज्ञानिकों ने न केवल अल नीनो के बनने की घोषणा की है, बल्कि उन्होंने इसके अल नीनो बनने की 63 प्रतिशत संभावना भी जताई है। परंपरागत रूप से, अल नीनो को उच्च तापमान, कम वर्षा, खाद्य मुद्रास्फीति में वृद्धि और धीमी वृद्धि से जोड़ा जाता है। हम पाते हैं कि अल नीनो की प्रकृति और प्रभाव भी बदल रहे हैं।
भारत में 1950 के दशक से औसत सतही तापमान के आंकड़े उपलब्ध हैं, जिनसे पता चलता है कि भारत में लू पहले शुरू हो रही है, अधिक समय तक चल रही है और अधिक तीव्र होती जा रही है। मार्च 2022 की लू ने गन्ने की फसल की पैदावार में 30 प्रतिशत की कमी कर दी, जबकि सब्जियों और तिलहन के उत्पादन को भी प्रभावित किया। मार्च 2024 में, कुछ क्षेत्रों में तापमान 50.5 डिग्री सैल्सियस तक पहुंच गया, जिससे गर्मी से होने वाली परेशानी और सब्जियों की कीमतों में भारी वृद्धि हुई। अल नीनो वाले वर्ष में ये सभी बातें और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती हैं। और सुर्खियों में दिखने वाले आंकड़ों से परे, भारत में अल नीनो के कुछ कम ज्ञात परिणाम भी हैं।
पहला, उच्च तापमान की संभावना कम बारिश की संभावना से कहीं अधिक है। उदाहरण के लिए, 2019-20 और 2024-25 के अल नीनो वर्षों में, इस घटना के बावजूद भारी बारिश हुई। लेकिन इन दोनों वर्षों में तापमान सामान्य स्तर से काफी ऊपर चला गया। दूसरा, अल नीनो वर्षों के दौरान तापमान में होने वाली वृद्धि बढ़ती जा रही है। किन फसलों पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा-सब्जियां और फल जैसी जल्दी खराब होने वाली फसलें परंपरागत रूप से अन्य फसलों की तुलना में लू के प्रति अधिक संवेदनशील रही हैं, और यह संवेदनशीलता बढ़ती जा रही है। अनाज, दालें, तिलहन और चीनी जैसी अपेक्षाकृत टिकाऊ फसलें भी पीछे नहीं हैं। इससे हम एक और महत्वपूर्ण प्रश्न पर आते हैं। यदि समय के साथ तापमान के प्रति खाद्य उत्पादन और मुद्रास्फीति की संवेदनशीलता बढ़ी है, तो वर्षा और जलाशयों की क्या भूमिका है? इस प्रश्न का सावधानी पूर्वक उत्तर देने के लिए, हम अपने सांख्यिकीय मॉडल का उपयोग करते हैं। हम पाते हैं कि खाद्य मुद्रास्फीति की व्याख्या और पूर्वानुमान करने में वर्षा की तुलना में तापमान कहीं अधिक प्रभावी कारक है। वास्तव में, तापमान को शामिल करने के बाद, वर्षा और जलाशय स्तरों का विश्लेषण करने का कोई महत्व नहीं रह जाता।
इन सब का 2026-27 पर क्या असर पड़ेगा- यह एक ऐसा दौर होगा जिसमें कई झटके एक साथ लगेंगे। होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से पैदा हुई ऊर्जा और औद्योगिक ईंधन की कमी से हम अभी पूरी तरह उबर भी नहीं पाए होंगे कि अल नीनो का प्रकोप शुरू हो जाएगा। इससे सभी आर्थिक कारकों, विशेष रूप से मुद्रास्फीति और विकास पर असर पडऩे की संभावना है। लू से किसानों पर असर पड़ेगा और उच्च मुद्रास्फीति से ग्रामीण और शहरी दोनों अनौपचारिक श्रमिकों पर असर पडऩे की संभावना है, जो आमतौर पर कीमतों के प्रति संवेदनशील होते हैं और मिलकर भारत के उपभोग का दो-तिहाई हिस्सा बनाते हैं। पिछले अनुभवों के आधार पर, अल नीनो के कारण विकास दर में 0.3 प्रतिशत अंकों की गिरावट आ सकती है। सरकार द्वारा ऋण गारंटी योजनाओं, ग्रामीण बेरोजगारी भत्तों और सार्वजनिक पूंजीगत व्यय के माध्यम से विकास को समर्थन देने के प्रयासों के चलते, राजकोषीय मंदी देखने को मिल सकती है। भारतीय रिजर्व बैंक उच्च मुद्रास्फीति और धीमी वृद्धि के बीच दुविधा में पड़ सकता है। चूंकि मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना उसका मुख्य दायित्व है, इसलिए उसे ब्याज दरें बढ़ानी पड़ सकती हैं, लेकिन संभवत: मामूली वृद्धि ही करनी होगी। इसका असर अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से पर महसूस होगा।-प्रांजुल भंडारी




