अंतर्राष्ट्रीय

क्या आईएसकेपी का इस्तेमाल कर रहा पाकिस्तान?: तालिबान और बलूचिस्तान से क्या है कनेक्शन; रिपोर्ट में बड़ा दावा

आईएएनएस, इस्लामाबाद। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तान आईएसकेपी का इस्तेमाल तालिबान और बलूच विद्रोहियों पर दबाव बनाने के लिए कर रहा है। क्या इससे पूरे क्षेत्र की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है? पढ़िए रिपोर्ट-

पाकिस्तान कथित तौर पर इस्लामिक स्टेट-खुरासान प्रांत (आईएसकेपी) को वैचारिक समर्थन की वजह से नहीं, बल्कि तालिबान और बलूच विद्रोहियों पर दबाव बनाने के एक साधन के रूप में संरक्षण दे रहा है। एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है। 

30 जून को आई रिपोर्ट्स में कहा गया था कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच सीमा पार गतिविधियां हुईं। इनका संबंध कथित तौर पर आईएसकेपी के छिपने के ठिकानों से था।

रिपोर्ट के अनुसार, हाल के वर्षों में इस तरह की घटनाएं कई बार हो चुकी हैं। तंजानिया के अखबार ‘सिटिजन’ में प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान ने क्षेत्र में मौजूद दूसरे आतंकवादी समूहों का इस्तेमाल करके तालिबान का मुकाबला करने की योजना बनाई है।

मोरक्को की शोधकर्ता और पत्रकार फातिमा एल हाशिमी ने सिटिजन में लिखा, आज मौजूद साक्ष्य बताते हैं कि पाकिस्तान आईएसकेपी को संरक्षण देता हुआ दिखाई दे रहा है। यह वैचारिक समर्थन के कारण नहीं, बल्कि अफगान तालिबान और बलूच विद्रोहियों दोनों पर दबाव बनाने की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस घटनाक्रम पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि इसके वैश्विक असर हो सकते हैं। 

तालिबान से क्यों बिगड़े पाकिस्तान के रिश्ते?
उन्होंने आगे लिखा, यह समझने के लिए कि पाकिस्तान की सेना आईएसकेपी को क्यों बढ़ावा दे सकती है, यह जानना जरूरी है कि अगस्त 2021 के बाद से इस्लामाबाद और अफगान तालिबान के संबंध काफी खराब हो गए हैं। पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सेनाओं के बीच सीमा पर झड़पें पहले की तुलना में अधिक और ज्यादा गंभीर हो गई हैं। 

रिपोर्ट में कहा गया है कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) ने केवल वर्ष 2025 में ही एक हजार से अधिक हमले किए। इन हमलों में खैबर पख्तूनख्वा में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों को काफी नुकसान उठाना पड़ा।

बलूचिस्तान में क्यों बढ़ी पाकिस्तान की मुश्किलें?
रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच समझौता कराने की सभी कोशिशें सफल नहीं हुईं। इसी दौरान बलूच सशस्त्र समूहों ने बलूचिस्तान में सुरक्षा बलों और बड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर हमले बढ़ा दिए। इनमें चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) भी शामिल है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन ने पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व के सामने अपने नागरिकों और परियोजनाओं की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है। इसके कारण पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर पर अच्छे परिणाम देने का भारी दबाव है।

क्या सख्त नीति से और बढ़ा संकट?
रिपोर्ट के मुताबिक, मुनीर ने इसके जवाब में खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में सख्त सरकारी नीति अपनाई। इससे पश्तून और बलूच लोगों में नाराजगी और बढ़ी तथा समस्या सुलझने के बजाय और गंभीर हो गई।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इन परिस्थितियों के बीच पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था ने पुराने तरीके अपनाने शुरू कर दिए हैं। इसमें राजनीतिक शिकायतों को नजरअंदाज करना और इस्लामिक स्टेट जैसे आतंकवादी संगठनों के साथ नए संबंध बनाकर संतुलन बनाने की कोशिश करना शामिल है।

रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में संयुक्त राष्ट्र के एक मंच पर बलूच नेशनल मूवमेंट (बीएनएम) के अध्यक्ष नसीम बलूच ने कहा था कि बलूचिस्तान में आईएसआईएस के प्रशिक्षण शिविर पाकिस्तान की सेना की निगरानी में चलते हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि यह दावा उन रिपोर्ट्स से मेल खाता है, जिनमें बताया गया था कि सेना समर्थक स्थानीय समूहों ने बलूचिस्तान के मस्तुंग और खुजदार में आईएसकेपी की सुविधाएं बनाई हैं। आरोप है कि इनका इस्तेमाल बलूच विरोध को दबाने और अफगानिस्तान में हमले करने के लिए किया जाता है।

क्या आईएसकेपी के जरिये बनाया जा रहा दबाव?
फातिमा एल हाशिमी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा, खवर्ष 2025 में लश्कर-ए-तैयबा के नेताओं ने बलूचिस्तान में एक बैठक की। इसमें उन्होंने उन ताकतों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष जारी रखने की बात कही, जिन्हें उन्होंने ‘पाकिस्तान विरोधी’ बताया।  

इससे उनका मतलब बलूच राष्ट्रवादी और अफगान तालिबान के ऐसे गुटों से था, जो पाकिस्तान सरकार के दबाव या प्रभाव में नहीं आना चाहते थे। उन्होंने आगे लिखा, आईएसकेपी के नेता, प्रचार से जुड़े अधिकारी, विदेशी भर्ती करने वाले लोग और बाहरी सहयोगी लगातार पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा के आसपास दिखाई देते रहे हैं। यह केवल कानून लागू करने में विफलता नहीं लगता। 

Related Articles

Back to top button