क्या छात्र हित में है नया पेपर लीक कानून

2024 के कानून में भी दस साल तक की जेल और करोड़ों का जुर्माना था, फिर भी प्रश्नपत्र लीक होते रहे। इसलिए सवाल है कि सिर्फ आंकड़े बढ़ाने से कितना फर्क पड़ेगा? जानकारों का कहना है कि पेपर लीक असल में पेपर की छपाई, ढुलाई और रखरखाव के दौरान या कोचिंग माफिया के नेटवर्क से होता है। जब तक इस पूरी प्रक्रिया की सुरक्षा, साइबर निगरानी और तकनीकी ऑडिट मजबूत नहीं होगा, तब तक अकेली सजा से पेपर लीक नहीं रुकेगा…
सरकार ने सोमवार को लोकसभा में सार्वजनिक परीक्षाएं (अनुचित साधन रोकथाम) संशोधन विधेयक 2026 पेश किया। इस विधेयक का उद्देश्य ‘सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधन रोकथाम) अधिनियम 2024 में संशोधन करना है। इस कानूनी सुधार की जरूरत क्यों पड़ी? देश में लगातार सामने आ रहे पेपर लीक मामलों, विशेषकर नीट-यूजी परीक्षा में कथित पेपर लीक और परीक्षा अनियमितताओं के बाद लाखों छात्रों में नाराजगी देखने को मिली। इस मुद्दे को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर सहित देश के कई हिस्सों में छात्रों और विभिन्न छात्र संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किए। प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि पेपर लीक के दोषियों पर कड़ी कार्रवाई हो, परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता लाई जाए और छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों को सख्त सजा दी जाए। इन विरोध प्रदर्शनों के बाद यह मुद्दा संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और सरकार पर परीक्षा सुरक्षा को लेकर प्रभावी कदम उठाने का दबाव बढ़ा। इसी पृष्ठभूमि में 24 जुलाई 2026 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम 2024 में कुछ संशोधन करते हुए, कानून को और अधिक सख्त बनाने वाले संशोधन विधेयक को मंजूरी प्रदान कर दी है।
यह कानून सार्वजनिक परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक, डिजिटल हैकिंग, संगठित नकल, परीक्षा में धोखाधड़ी तथा भर्ती प्रक्रियाओं में होने वाले अपराधों पर रोक लगाने के उद्देश्य से तैयार किया गया एक सख्त कानूनी ढांचा है। इसका उद्देश्य केवल अपराधियों को दंडित करना नहीं, बल्कि परीक्षा प्रणाली में छात्रों का विश्वास दोबारा स्थापित करना भी है। सरकार का मानना है कि यदि पेपर लीक जैसे अपराधों पर समय रहते कठोर कार्रवाई नहीं की गई, तो लाखों युवाओं की मेहनत, सरकारी भर्ती प्रक्रिया और शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित होगी। इसलिए इस कानून में पहले की तुलना में अधिक कठोर दंड, भारी आर्थिक जुर्माना और त्वरित न्यायिक प्रक्रिया का प्रावधान किया गया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा मंजूर किए गए इस कानून में सार्वजनिक परीक्षाओं की सुरक्षा को मजबूत करने और पेपर लीक जैसे संगठित अपराधों पर प्रभावी अंकुश लगाने के लिए कई कठोर प्रावधान प्रस्तावित किए गए हैं। इनका उद्देश्य दोषियों को कड़ी सजा देना, परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही तय करना और छात्रों के लिए निष्पक्ष परीक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करना है। इसके अंतर्गत परीक्षा की पूरी लागत की वसूली और संपत्ति कुर्क करने की कार्रवाई की जा सकती है। डिजिटल परीक्षा सुरक्षा कानून में केवल प्रश्नपत्र चोरी ही नहीं, बल्कि सर्वर हैकिंग, डिजिटल डेटा चोरी, अनधिकृत एक्सेस, परीक्षा प्रणाली से छेड़छाड़ और साइबर माध्यम से प्रश्नपत्र साझा करने जैसे अपराधों को भी शामिल किया गया है। पेपर लीक मामलों की समयबद्ध जांच और त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट की व्यवस्था करने का प्रस्ताव है, ताकि दोषियों को जल्द सजा मिल सके। यह विधेयक सार्वजनिक परीक्षाओं में पारदर्शिता बढ़ाने, पेपर लीक माफिया पर अंकुश लगाने और योग्य अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा करने के उद्देश्य से लाया गया है।
यह बिल सात मुख्य संशोधन पेश करता है। इनका मकसद नीट-यूजी 2026 परीक्षा में बड़े पैमाने पर हुई गड़बडिय़ों के बाद लागू करने में आ रही कमियों को दूर करना, खास न्यायिक तंत्र बनाना और आपराधिक मुकदमों में तेजी लाना है। इस बिल में राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासन को सेशन कोर्ट को स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट के तौर पर नामित करने का अधिकार दिया जाएगा। यह खास तौर पर इस कानून के तहत अपराधों की सुनवाई करेंगे। विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट में कार्यवाही रोजाना के आधार पर होनी चाहिए। चार्जशीट दाखिल होने की तारीख से तीन महीने के भीतर सुनवाई पूरी होनी चाहिए। गंभीर या एक से ज्यादा राज्यों से जुड़े परीक्षा धोखाधड़ी के मामलों को संभालने के लिए केंद्र के पास एक स्पेशल टास्क फोर्स बनाने का अधिकार होगा। इस कानून के तहत अपराधों की जांच दो महीने के भीतर पूरी करनी होगी। राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासन को परीक्षा में गड़बडिय़ों के मुकदमे के लिए खास तौर पर कानूनी सलाहकार नियुक्त करने का अधिकार होगा। संगठित पेपर लीक के दोषी पाए जाने वाले व्यक्तियों, कोचिंग सेंटरों और सर्विस प्रोवाइडरों के लिए जेल की सजा और भारी आर्थिक जुर्माने का प्रावधान होगा। बिल में अपील को लेकर भी साफ व्यवस्था दी गई है, जो पहले नहीं थी। नई धारा 12-बी के मुताबिक फास्ट ट्रैक कोर्ट के किसी फैसले या सजा के खिलाफ सीधे हाईकोर्ट में अपील की जा सकेगी। इस अपील को हाईकोर्ट के दो जजों की बेंच सुनेगी और तीन महीने के अंदर निपटाने की कोशिश करेगी।
अपील तीस दिन के अंदर करनी होगी और उचित कारण होने पर हाईकोर्ट इसे नब्बे दिन तक बढ़ा सकता है, लेकिन इसके बाद अपील नहीं सुनी जाएगी। जमानत देने या न देने के आदेश के खिलाफ भी हाईकोर्ट में अपील का रास्ता रखा गया है। अब असली सवाल है कि जब 2024 का कानून पहले से मौजूद था तो नए बिल की जरूरत क्यों पड़ी? इसका जवाब पिछले दो साल के हालात में छिपा है। कड़ा कानून होने के बावजूद बड़ी परीक्षाओं में गड़बड़ी और लीक की खबरें आती रहीं। रिपोट्र्स के मुताबिक, कथित नीट यूजी 2026 पेपर लीक से बाईस लाख से ज्यादा अभ्यर्थी प्रभावित हुए और आखिरकार परीक्षा रद्द करनी पड़ी। सरकार ने बिल के उद्देश्यों में खुद माना है कि मौजूदा व्यवस्था में मुकदमे सालों तक खिंचते रहे और तेज सुनवाई के लिए कोई अलग अदालत नहीं थी। यही वजह है कि नए बिल में समयबद्ध जांच, फास्ट ट्रैक कोर्ट और अपील की व्यवस्था लाई गई है। सरकार का तर्क है कि कड़ी सजा के साथ अगर सुनवाई भी तेज हो तो अपराधियों में असली डर पैदा होगा। हालांकि, यह भी कहना होगा कि केवल कठोर कानून बना देना पर्याप्त नहीं है।
इसके साथ आधुनिक डिजिटल सुरक्षा, एन्क्रिप्टेड प्रश्नपत्र प्रणाली, साइबर सुरक्षा, परीक्षा केंद्रों की निगरानी, नियमित ऑडिट और दोषियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई भी उतनी ही आवश्यक होगी। तभी इस कानून का वास्तविक उद्देश्य पूरा हो सकेगा। कानून कागज पर चाहे जितना सख्त हो, असली परीक्षा उसके लागू होने में होती है। 2024 के कानून में भी दस साल तक की जेल और करोड़ों का जुर्माना था, फिर भी प्रश्नपत्र लीक होते रहे। इसलिए सवाल है कि सिर्फ आंकड़े बढ़ाने से कितना फर्क पड़ेगा? जानकारों का कहना है कि पेपर लीक असल में पेपर की छपाई, ढुलाई और रखरखाव के दौरान या कोचिंग माफिया के नेटवर्क से होता है। जब तक इस पूरी प्रक्रिया की सुरक्षा, साइबर निगरानी और तकनीकी ऑडिट मजबूत नहीं होगा, तब तक अकेली सजा से पेपर लीक नहीं रुकेगा। देश के छात्र जवाबदेही और भरोसेमंद व्यवस्था चाहते हैं। बार-बार लीक होने से मेहनती छात्रों में गुस्सा और निराशा दोनों है, क्योंकि सालों की तैयारी एक पेपर लीक से बेकार हो जाती है। उम्मीद है नए कानूनी प्रावधान छात्र हितों पर पहरा देंगे।-डा. वरिंद्र भाटिया




