देशसेवा व सामाजिक उत्थान के लिए समर्पित आरएसएस

जीवन के संघर्षों में भी अडिग रहना संघ से सीखा। छुटपन में संघ शाखा ने जो सिखाया, उसका चेतनावचेतन में यह प्रभाव बना रहा। किसी भी संगठन को इतना व्यापक, विशाल, सक्रिय, अनुशासित बने रहना उसके लिए सौ वर्ष कोई मायने नहीं रखते। इन सौ वर्षों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने ध्येय पर खड़ा रहा कि भारत एक ‘हिंदू राष्ट्र’ है। संघ की हिंदू राष्ट्र की परिभाषा भी बड़ी विशाल है। इस देश का प्रत्येक सम्प्रदाय जो भारत की धरती को अपनी मातृभूमि, पितृ भूमि मानता है वह हिंदू है। इसमें तनिक संकीर्णता नहीं। यह हिंदू राष्ट्र की विडम्बना है कि अंग्रेजों ने इस राष्ट्र को विभाजित कर दिया। अन्यथा म्यांमार व बंगलादेश और पाकिस्तान इसी में तो थे। आज भी सही मुसलमान यही कहेगा कि हमारे पुरखे हिंदू थे। जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला तो गर्व से कहते हैं कि हमारे दादा-पड़दादा ङ्क्षहदू ब्राह्मण थे। मुझे गर्व है कि मैं संघ परिवार का एक छोटा-सा घटक हूं।
‘हिंदू-मुस्लिम’ एकता बिन स्वराज्य नहीं। किसी भी संगठन की आत्मा है कि वह किस सीमा तक अपने कार्यकत्र्ताओं को प्रेरणा दे सकता है कि वह अपने संगठन और उस संगठन के विचारों और मूल्यों पर खड़ा रहे। संघ और उसका स्वयंसेवक विचारों और मूल्यों पर इन सौ वर्षों में अडिग रहा। यही ‘मानव स्वयंसेवक’ राष्ट्र की कायाकल्प का प्रमुख साधन है। मैं अपने आपको भाग्यशाली समझता हूं कि मुझे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघ चालक ‘गुरु’ गोलवलकर को निकट से देखने का अवसर मिला। ठाकुर राजेंद्र सिंह जी, माननीय बाला साहिब देवरस, के. सुदर्शन जी और वर्तमान सरसंघ चालक श्री मोहन भागवत के दर्शनों और उन्हें निकट से देखने के कई अवसर मिले। मुझे गर्व है कि मुझे अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण अडवानी, बलराज मधोक, दीन दयाल उपाध्याय, मुरली मनोहर जोशी, केदारनाथ साहनी जैसे सर्वश्रेष्ठ संघ प्रचारकों का आशीर्वाद मिला।
प्रचारकों का जीवन बड़ा कठिन हुआ करता था। 20-20 किलोमीटर साइकिल चलाकर संघ शाखाओं का विस्तार करना, नए-नए स्वयंसेवकों, संघ शिक्षा वर्गों द्वारा नए-नए विस्तारक, प्रचारक संघ के लिए खड़े करना उनका मुख्य उद्देश्य था। पर यह सब कुछ हसंते-हंसते करना है। प्रत्येक वर्ष मई-जून के महीनों में, तपती गर्मी और लू में संघ शिक्षा वर्गों में ट्रेनिंग लेना, शूद्र-ब्राह्मण का एक ही स्थान पर भोजन करना, संघ वर्गों में ‘परिवार-मिलन’ के क्या उत्तम गुण वहां सिखाए जाते हैं। सफेद कमीज, खाकी निक्कर, (अब पैंट), काली टोपी, काले बूट (फीतों वाले), खाकी जुराबें, हाथ में दंड, वेशभूषा से सजग स्वयंसेवक सचमुच भारत माता के रक्षक लगते हैं। कदम से कदम मिला कर ‘रूट मार्च’ निकालना दर्शकों को मुग्ध कर देता है।
बंटवारे के वक्त 1947 में हिंदू बहू-बेटियों को हिंदुस्तान की सीमा में ले आना, उजड़े हुए विस्थापितों को भिन्न-भिन्न शिविरों में पहुंचाना, उनके रहने, खाने-पीने का प्रबंध संघ के कार्यकत्र्ता का काम था। नाथू राम गोडसे द्वारा महात्मा गांधी वध के लिए राष्ट्रीय-स्वयं संघ को पूर्णतय: दोषी ठहरा कर निर्दोष स्वयं सेवकों को जेल में डाल देना, स्वयं सेवक संघ पर प्रतिबंध लगा देना, यह सब स्वयं सेवकों ने हंसते-हंसते सहन किया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ चुपचाप ङ्क्षहदू राष्ट्र की कल्पना को साकार करने में लगा रहा।
आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक वट वृक्ष बन गया है। अगर आपको दुनिया का सबसे विशाल, सबसे संगठित संगठन देखने को मिलेगा तो वह केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही होगा। इन सौ वर्षों में संघ के कई आलोचक हुए, कई संघ को गालियां भी देते रहे हैं। ऐसे वही लोग हैं, जिन्होंने संघ को निकट से देखा नहीं, संघ कैसे काम करता है, इसकी जांच तक नहीं की। मेरा निवेदन है कि संघ शाखाओं में आओ, ध्वज प्रणाम करो और ‘नमस्ते सदा वत्सले’ भारत मां की प्रार्थना करें और अपने-अपने काम धंधे में लग जाओ।
‘समूचा राष्ट्र’ एक कुटुम्ब हैं। संघ कट्टरवाद, अलगाववाद को देश के लिए जहर मानता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ धर्मांतरण को सबसे बड़ा शत्रु समझता है। यह एक ‘दैवी संगठन’ है। समाज को जोडऩा, उसमें समन्वय बनाए रखना, यही संघ विरोधियों को पचता नहीं। हमने जो कुछ सीखा, संघ से सीखा। यह भी संघ से ही सीखा कि अपने से छोटे कार्यकत्र्ता को अपने से आगे रखो। आदमी कभी-कभार बुरा हो सकता है, संगठन कभी बुरा नहीं होता। संघ के लगभग 80 ऐसे संगठन हैं जो समाज के भिन्न-भिन्न वर्गों में स्वतंत्र रूप से कार्य कर रहे हैं। मैं संघ जैसे पवित्र और विकासशील संगठन के प्रति कृतज्ञता का भाव रखता हूं।-.मोहन लाल




