सोशल मीडिया : जो इंसानियत के बिना अभिशाप बन सकता है

मानव इतिहास में इससे पहले कभी भी दुनिया आपस में इतनी जुड़ी हुई नहीं थी। एक छोटे से गांव का बच्चा हजारों मील दूर बैठे किसी प्रोफैसर का लैक्चर देख सकता है। महासागरों से अलग हुआ परिवार हर रोज एक-दूसरे की मुस्कान देख सकता है। एक संघर्षरत उद्यमी अपने मोबाइल फोन से एक सफल व्यवसाय खड़ा कर सकता है। सोशल मीडिया ने दुनिया को हमारी हथेली में लाकर रख दिया है। फिर भी, वही मंच, जो आशा फैलाता है, डर भी फैला सकता है। वही तकनीक जो परिवारों को एक करती है, समुदायों को तोड़ भी सकती है। वही स्क्रीन जो हमें दूसरे व्यक्ति की सफलता का जश्न मनाने का अवसर देती है, एक ऐसा हथियार भी बन सकती है, जो प्रतिष्ठा को नष्ट करती है, झूठ फैलाती है और स्थायी भावनात्मक घाव छोड़ जाती है।
सोशल मीडिया हमारे समय के सबसे महान आविष्कारों में से एक है लेकिन शायद यह हमारे चरित्र की सबसे बड़ी परीक्षाओं में से एक भी है। इसकी असाधारण शक्ति से कोई इंकार नहीं कर सकता। प्राकृतिक आपदाओं, बाढ़, भूकंप और दुर्घटनाओं के दौरान, सोशल मीडिया ने लोगों को अपने लापता प्रियजनों को खोजने, रक्त दान आयोजित करने, राहत कोष इकट्ठा करने और बचाव दलों को सचेत करने में मदद की है। छात्रों ने नए कौशल सीखे हैं, कलाकारों को दर्शक मिले हैं, छोटे व्यवसाय सफल उद्यमों में बदल गए हैं और लोगों ने ऐसे करियर खोजे हैं जिनकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। लेकिन हर महान आविष्कार के साथ जिम्मेदारी भी आती है। आज, एक लापरवाही भरा संदेश मिनटों में पूरे देश में यात्रा कर सकता है। एक एडिट किया हुआ वीडियो सच को बोलने का मौका मिलने से पहले ही गुस्सा पैदा कर सकता है। एक झूठी अफवाह किसी निर्दोष व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नष्ट कर सकती है। हर फर्जी कहानी के पीछे अक्सर एक वास्तविक इंसान होता है, जिसकी जिंदगी शायद फिर कभी पहले जैसी न रहे।
शायद सोशल मीडिया की सबसे बड़ी त्रासदी इसकी अविश्वसनीय गति है, जिससे वह यात्रा करता है। लोग यह जांचे बिना ही संदेशों को फॉरवर्ड कर देते हैं कि वे सच हैं या नहीं। वे एक तस्वीर पर भरोसा कर लेते हैं क्योंकि वह असली दिखती है। वे एक वीडियो पर विश्वास कर लेते हैं क्योंकि उनके किसी जानने वाले ने इसे सांझा किया है। ‘फॉरवर्ड’ बटन पर वह एक क्लिक भले ही हानिरहित लगे, फिर भी यह दहशत पैदा कर सकता है, नफरत फैला सकता है, व्यवसायों को नुकसान पहुंचा सकता है, समुदायों को विभाजित कर सकता है और निर्दोष परिवारों को डर और शर्म के साए में जीने के लिए छोड़ सकता है। एक झूठ ऑनलाइन भले ही कुछ ही दिनों तक चले लेकिन उसके भावनात्मक घाव सालों तक रह सकते हैं। हर दिन, लाखों लोग परफैक्ट छुट्टियों, परफैक्ट बॉडी, परफैक्ट घरों और परफैक्ट जिंदगियों की ध्यान से एडिट की गई तस्वीरों को स्क्रॉल करते हैं। वे अक्सर यह भूल जाते हैं कि ये तस्वीरें केवल हाइलाइट्स दिखाती हैं, उनके पीछे के संघर्षों को नहीं।
नतीजतन, कई युवा महसूस करते हैं कि वे काफी अच्छे नहीं हैं। वे अपने वास्तविक जीवन की तुलना किसी और की ध्यान से फिल्टर की गई वास्तविकता से करते हैं। आत्मविश्वास धीरे-धीरे आत्म-संदेह में बदल जाता है। खुशी की जगह ङ्क्षचता ले लेती है। क्रूर टिप्पणियों, सार्वजनिक अपमान, अज्ञात दुव्र्यवहार और ऑनलाइन उत्पीडऩ ने कई युवाओं को अलगाव में धकेल दिया है। कुछ अपना आत्मविश्वास खो देते हैं। कुछ समाज से पीछे हट जाते हैं। दुखद रूप से, कुछ तो पूरी तरह से उम्मीद ही खो देते हैं। ‘लाइक्स’ की कोई भी संख्या वास्तविक दयालुता का स्थान नहीं ले सकती। गोपनीयता एक और शिकार है। हर तस्वीर, हर लोकेशन, हर व्यक्तिगत विवरण, जिसे हम सांझा करते हैं, एक डिजिटल फुटप्रिंट छोड़ जाता है। जालसाज और साइबर अपराधी इस जानकारी का दुरुपयोग करने के अवसरों की तलाश में रहते हैं। हर दिन, लोग अपनी बचत, अपनी पहचान और अपने मन की शांति खो देते हैं क्योंकि किसी ने उसका फायदा उठाया, जो उन्होंने अनजाने में ऑनलाइन उजागर कर दिया था।
एक और शांत खतरा वास्तविक मानवीय जुड़ाव का खो जाना है। परिवार अक्सर एक साथ बैठते हैं जबकि हर कोई अलग-अलग स्क्रीन को घूर रहा होता है। दोस्त मिलते हैं लेकिन बातचीत करने से ज्यादा समय तस्वीरें लेने में बिताते हैं। माता-पिता स्क्रॉल करने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि वे यह नोटिस ही नहीं कर पाते कि उनके बच्चे बस इतना चाहते हैं कि कोई उनकी बात सुने। तकनीक ने हमारे उपकरणों को तो जोड़ दिया है लेकिन कई घरों में, इसने दिलों को चुपके से अलग कर दिया है। फर्जी अकाऊंट, डीपफेक और संगठित गलत सूचनाओं का अधिक प्रभावी ढंग से पता लगाया जाना चाहिए और उन्हें हटाया जाना चाहिए। सरकारों को ऐसे समझदारी भरे कानून बनाने चाहिएं, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए जान-बूझकर फैलाई जाने वाली गलत सूचनाओं को हतोत्साहित करें। जिम्मेदार पत्रकारिता और स्वतंत्र फैक्ट-चैकिंग आज से पहले कभी इतनी महत्वपूर्ण नहीं रही।
लेकिन फर्जी खबरों के खिलाफ सबसे बड़ी सुरक्षा एक जागरूक और जिम्मेदार नागरिक है। किसी भी संदेश को फॉरवर्ड करने से पहले, हमें बस कुछ सैकेंड के लिए रुकना चाहिए। खुद से पूछें-क्या यह जानकारी सत्यापित है? क्या यह किसी विश्वसनीय स्रोत से है? क्या इसे सांझा करने से अनावश्यक डर या नुकसान हो सकता है? सावधानी के वे कुछ पल संघर्ष को रोक सकते हैं, किसी निर्दोष व्यक्ति की रक्षा कर सकते हैं, या किसी की जान भी बचा सकते हैं। अपने मूल रूप में, सोशल मीडिया दुश्मन नहीं है। इसमें कोई भावनाएं नहीं हैं, कोई विवेक नहीं है और कोई इरादा नहीं है। यह केवल उन लोगों के मूल्यों को दर्शाता है जो इसका उपयोग करते हैं। यदि हम दयालुता चुनते हैं, तो यह दयालुता फैलाता है। यदि हम सच चुनते हैं, तो यह सच फैलाता है। यदि हम नफरत, अफवाहें और विभाजन चुनते हैं, तो यह उन्हें भयावह गति से बढ़ा देता है। क्या हम एक ऐसी डिजिटल दुनिया का निर्माण कर सकते हैं, जहां सनसनीखेजता से ज्यादा सच को महत्व दिया जाए, जहां क्रूरता से ज्यादा करुणा मजबूत हो और जहां हर उपयोगकत्र्ता याद रखे कि हर प्रोफाइल पिक्चर के पीछे एक वास्तविक इंसान है, जिसका एक परिवार है, भावनाएं हैं, सपने हैं और गरिमा है। सोशल मीडिया में दुनिया को बदलने की ताकत है। सवाल यह नहीं है कि क्या यह इसे बदलेगा, बल्कि यह कि क्या यह इसे बेहतर के लिए बदलेगा या बदतर के लिए। वह फैसला हमारे हाथों में है।-देवी एम. चेरियन




