कल्पनाओं का नहीं, विज्ञान की विजय का प्रतीक है चंद्रमा

चंद्रमा की सतह पर मानव द्वारा पहली लैंङ्क्षडग की वर्षगांठ के रूप में 20 जुलाई को वर्ष 2022 से ‘अंतर्राष्ट्रीय चंद्रमा दिवस’ मनाया जा रहा है। इस वर्ष 5वां अंतर्राष्ट्रीय चंद्रमा दिवस ‘एक चंद्रमा, एक दृष्टि, एक भविष्य’ विषय के साथ मनाया जा रहा है. जो वैश्विक सहयोग और चंद्र अन्वेषण तथा मानवता के लिए इसके लाभों हेतु एक सांझा दृष्टिकोण पर जोर देता है। भारत सहित कई देश चंद्रमा पर जीवन के रहस्यों से पर्दा हटाने के प्रयासों में जुटे हैं और अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष कानून के दायरे में रहते हुए चंद्रमा पर मौसम तथा जीवन सहित अन्य संभावनाओं पर निरंतर कार्य कर रहे हैं।
भारत के लिए इस दिवस का महत्व बहुत ज्यादा है क्योंकि 14 जुलाई, 2023 को चंद्र मिशन के तहत ‘चंद्रयान-3’ लांच किया गया था, जिसके जरिए 23 अगस्त, 2023 को अंतरिक्ष क्षेत्र में अविस्मरणीय अध्याय लिखते हुए भारत ने स्वॢणम इतिहास रचा था। चंद्रयान-3 ने चंद्रमा के जिस बेहद रहस्यमयी और गुमनाम दक्षिणी ध्रुव पर कदम रखे थे, वह चंद्रमा का बेहद खतरनाक क्षेत्र माना जाता है और भारत के अलावा दुनिया का कोई भी देश चांद के दक्षिणी ध्रुव को नहीं छू सका था। इस मिशन की सफलता के साथ ही भारत अमरीका, रूस और चीन के बाद चंद्रमा पर पहुंचने वाला चौथा देश बन गया था। चंद्रयान-3 मिशन की बड़ी सफलता के बाद इसरो अब चंद्रयान-4 मिशन को लांच करने की तैयारियों में जुटा है। भारत के इस चौथे मून मिशन को 2028 तक लांच किए जाने की संभावना है। चंद्रयान-4 को चांद से मिट्टी के नमूने लाने के लिए बनाया जा रहा है, जो ‘शिव शक्ति’ ङ्क्षबदू से ये नमूने पृथ्वी पर लाएगा।
यह जानना भी दिलचस्प है कि चंद्रमा पर 14-15 दिन तक सूरज निकलता है और बाकी के 14-15 दिन अंधेरा रहता है। यही नहीं, चंद्रमा का एक दिन हमारे 29.5 दिन के बराबर होता है। 20 जुलाई, 1969 पूरी दुनिया के लिए एक ऐतिहासिक दिन था, क्योंकि उस दिन अमरीकी अंतरिक्ष उड़ान ‘अपोलो-11’ मिशन के हिस्से के रूप में अमरीकी अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग चंद्रमा पर कदम रखने वाले पहले मानव थे। उनके साथ चंद्र मॉड्यूल पायलट बज एल्ड्रिन भी थे। बज एल्ड्रिन 19 मिनट बाद नील आर्मस्ट्रांग से जुड़े थे और दोनों ने साइट की खोज में सवा दो घंटे साथ बिताए थे।
नील आर्मस्ट्रांग ने जब सीढ़ी से नीचे उतरकर चंद्रमा की सतह पर पहला कदम रखा, तब कहा था कि यह एक आदमी के लिए एक छोटा कदम है लेकिन मानव जाति के लिए एक बड़ी छलांग है। चंद्रमा की सतह पर रहते हुए नील और बज ने पृथ्वी पर अनुसंधान एवं अध्ययन के लिए लाने के लिए चंद्रमा से करीब 21.5 किलोग्राम सामग्री एकत्र की थी। नासा का यह बहुत बड़ा मिशन था, जिसके तहत नील और बज को अंतरिक्ष तक पहुंचाने के अपोलो मिशन में अंतरिक्ष यात्रियों से लेकर मिशन कंट्रोलर, वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर, नर्सें, गणितज्ञ, प्रोग्रामर, ठेकेदार, कैटरर इत्यादि करीब 4 लाख लोग सक्रिय थे। नासा के इस महत्वाकांक्षी मिशन के दौरान 20-30 व्यक्तियों की टीम हर पल सक्रिय रहती थी और नासा के मिशन कंट्रोलर को पूरी दुनिया में मौजूद ग्राऊंड स्टेशन से सम्पर्क रखना पड़ता था। बहरहाल, चांद पर इंसान का पहला कदम पडऩे के साथ ही अमरीका ने यह साबित कर दिया था कि पूरी दुनिया में इंसान से ताकतवर कोई नहीं है और इसी सफलता को सैलिब्रेट करने के लिए प्रतिवर्ष ‘अंतर्राष्ट्रीय चन्द्रमा दिवस’ मनाया जाने लगा है।
नासा के अंतरिक्ष यान अपोलो की चन्द्रमा की यात्रा का सफर 16 जुलाई, 1969 को शुरू हुआ था और बताया जाता है कि नील और बज जब चांद की सतह पर पहुंचे तो यान के अलार्म बज रहे थे, यान में ईंधन की मात्रा बेहद कम थी लेकिन फिर भी नील ने बड़ी सहजता से अंतरिक्ष यान को चांद पर उतार दिया और चन्द्रमा की बेहद उबड़-खाबड़ सतह पर पहला कदम रखते हुए चांद पर झंडा लहराकर इतिहास रच दिया था।
समस्त मानव जाति के लिए वह एक ऐसा ऐतिहासिक कार्य था, जिसके बाद विज्ञान और अंतरिक्ष को देखने का दुनिया का दृष्टिकोण ही बदल गया। दरअसल हजारों वर्षों से मानव सभ्यताएं हमारे एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह चंद्रमा की उत्पत्ति और रहस्यों पर विचार करते हुए आकाश की ओर देखती रही हैं। हालांकि चंद्रमा की उत्पत्ति को लेकर वैज्ञानिकों द्वारा कई तरह के सिद्धांत दिए गए हैं, जिनमें से सर्वाधिक मान्य ‘बिग इंपैक्ट थ्योरी’ ही है, जिसके अनुसार कई अरब वर्ष पूर्व मंगल ग्रह के आकार का एक पिंड हमारी पृथ्वी से टकराया और उस टकराव के परिणामस्वरूप पृथ्वी की ऊपरी सतह टूटकर अंतरिक्ष में बिखर गई। पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव के कारण वह मलबा पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाने लगा और धीरे-धीरे एक पिंड के रूप में बदल गया और इस प्रकार पृथ्वी के प्राकृतिक उपग्रह चंद्रमा का जन्म हुआ। पृथ्वी से हुई टक्कर के परिणामस्वरूप ही पृथ्वी अपने अक्ष से 23.5 डिग्री झुक गई और उसी के बाद पृथ्वी पर विभिन्न ऋतुओं का जन्म हुआ तथा पृथ्वी के घूर्णन में स्थिरता आई।
अंतरिक्ष वैज्ञानिकों का मानना है कि सौरमंडल में जब पृथ्वी का जन्म हुआ, तब वह आज की भांति हरी-भरी नहीं थी बल्कि एक धधकता हुआ आग का गोला थी और उसकी गति, घूर्णन तथा दिन-रात की अवधि भी पूरी तरह अलग थी लेकिन उस टक्कर की वजह से ही पृथ्वी पर जीवन के उद्भव के लिए अनुकूल पर्यावरण का जन्म हुआ। अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के मुताबिक यदि हमें पृथ्वी को समझना है तो उसके लिए पहले चंद्रमा को समझना जरूरी है, क्योंकि उसके बगैर हम अपने सौरमंडल को भी सही ढंग से नहीं समझ सकते।-योगेश कुमार गोयल




