संपादकीय

राम नाम की लूट है…

अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा-चोरी के संदर्भ में अब यह अहम सवाल है कि ट्रस्ट को भंग क्यों नहीं किया गया? ट्रस्ट के सदस्यों और उनके पालतू चंपुओं पर सिर्फ चढ़ावे की चोरी-डकैती के ही आरोप नहीं हैं, बल्कि भगवान राम को पहनाए गए, हीरे-जवाहरात के हार, चांदी की चरण-पादुका, अन्य गहने-आभूषण गायब करने के भी संवेदनशील आरोप हैं। फिर आरोपित राम मंदिर के ट्रस्ट में क्यों हैं? ट्रस्ट के सदस्य अनिल मिश्रा पर राम मंदिर में ही इंजीनियर रहे दीनानाथ वर्मा के भ्रष्ट आरोप हैं कि वह निर्माण-कार्यों में 40 फीसदी कमीशन मांगते थे। फर्जी बिल बना कर निर्माण-कार्यों में मोटा घोटाला किया गया है। हम इन आरोपों की पुष्टि नहीं कर सकते, लेकिन कीचड़ तो उछला है! सबसे अधिक आपत्तिजनक और अवैध यह माना जा रहा है कि ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय बंसल ने ‘नजूल की जमीन’ कैसे और क्यों खरीदी? एक उदाहरण सामने आया है कि 2.92 करोड़ रुपए की नजूल-भूमि 23-24 करोड़ रुपए में क्यों खरीदी गई? नजूल की जमीन सरकारी संपत्ति होती है, जो राज्य सरकार को सौंपी जाती है। यह जमीन लीज, पट्टे पर तो दी जा सकती है, लेकिन इसे बेचा-खरीदा नहीं जा सकता। जमीन से जुड़ी ऐसी भ्रष्ट विसगतियों के आरोप तब से लगाए जा रहे हैं, जब राम मंदिर का निर्माण शुरू भी नहीं हुआ था। अभी दो-तीन दिन पहले उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अयोध्या के प्रवास पर थे, लेकिन ट्रस्ट को स्पष्ट आदेश दिए गए थे कि चंपत राय और अन्य आरोपितों, संदिग्धों को उनसे दूर रखा जाए। आखिर क्यों…? क्या विशेष जांच टीम ने मुख्यमंत्री को कुछ ‘विस्फोटक खुलासे’ किए हैं? चंपत राय समेत अनिल मिश्रा, गोपाल राव, सुभाष श्रीवास्तव आदि पर संगीन आरोप हैं और सभी आरएसएस के पदाधिकारी रह चुके हैं। क्या सरसंघचालक मोहन भागवत, सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले और प्रधानमंत्री मोदी इसीलिए खामोश हैं?

प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव रह चुके एवं राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेन्द्र मिश्र ने टीवी चैनलों के साक्षात्कारों में चढ़ावा-चोरी को ‘डाका’ करार दिया है और नजूल की जमीन खरीदने पर सवाल उठाए हैं। इसके बावजूद चंपत राय की चारित्रिक निष्ठाएं गाई जा रही हैं कि वह पूजा की थाली का चावल तक चुरा नहीं सकते। फ$कत $फकीर और संत किस्म के व्यक्ति हैं। सवाल है कि जिस मंदिर में करोड़ों रुपए का दान आता हो, करोड़ों रुपए निर्माण और व्यवस्था पर खर्च किए जाते रहे हों, क्या उसके प्रशासन का दायित्व किसी ‘संत-फकीर’ को सौंपा जा सकता है? क्या ट्रस्ट भी ‘दैवीय’ है अथवा ट्रस्ट के सदस्य या संबद्ध लोग खास ‘राम-भक्त’ हैं? सर्वोच्च अदालत के निर्देश पर, प्रधानमंत्री मोदी के आदेश पर, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने यह ट्रस्ट गठित किया था। ऐसे क्या सुर्खाव के पर लगे हैं, जो इसे खंडित नहीं किया जा सकता? वैसे अब चर्चा सुनी जा रही है कि एक हालिया सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी को राम मंदिर ट्रस्ट का सीईओ बनाया जा सकता है, लिहाजा कुछ चेहरों पर गाज भी गिर सकती है। दरअसल हमारी अगाध आस्था है कि प्रभु राम देश की आत्मा हैं, प्राण हैं, जिंदगी हैं, मन-विचार हैं, प्रार्थना हैं और असीमित मर्यादा हैं। करोड़ों राम-भक्तों की ऐसी आस्थाओं, भक्ति को धोखा नहीं दिया जा सकता। यह धारणा पैदा नहीं की जा सकती कि राम मंदिर भी लूट, चोरी-चकारी का अड्डा है। राम के प्रति जरा-सा भी मोहभंग यह देश बर्दाश्त नहीं करेगा। कोई ‘राम-नाम’ की लूट नहीं मची है कि कोई भी लूट ले! सवाल यह भी बेहद गंभीर है कि राम मंदिर ट्रस्ट में किसी भी शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और अखाड़ों के महामंडलेश्वर संतों को क्यों नहीं रखा गया? संघ परिवार का ही ट्रस्ट क्यों बना दिया गया? प्रधानमंत्री मोदी तो ‘परिवारवाद’ के कट्टर विरोधी हैं। बहरहाल आरोप तो आंदोलन के दौरान असंख्य ‘राम-शिलाओं’ को लेकर भी सामने आए हैं। उनमें चांदी की शिलाएं भी थीं। यह चोरी-डकैती तिरुपति मंदिर, वैष्णो देवी मंदिर, काशी विश्वनाथ मंदिर, शिरड़ी के साईं बाबा मंदिर आदि में भी होती रही है। करोड़ों की हेरा-फेरी, डकैती सामने आती रही है, लेकिन वक्त बीतने के साथ-साथ सब कुछ दब-ढक जाता है। क्या इस मामले में उचित कार्रवाई होगी?

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