मध्यप्रदेश

बेरोजगार अविवाहित बेटी माता-पिता से गुजारा-भत्ता पाने की हकदारः हाईकोर्ट

जबलपुर: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बुधवार को एक बड़ा फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने कहा कि अगर कोई बालिग अविवाहित बेटी आर्थिक रूप से अपना खर्च उठाने में असमर्थ है, तो वह अपने माता-पिता से गुजारा-भत्ता पाने की हकदार है। कोर्ट ने एक व्यक्ति की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उसे अपनी बेटी को हर महीने 2000 रुपए देने के निर्देश दिया गया था।

पत्नी और बेटी ने गुजारा-भत्ता की मांग की थी

दरअसल, यह फैसला गंगा सिंह की याचिका पर आया, जब उनकी तलाकशुदा पत्नी देवी सिंह और बेटी रक्षा ने संयुक्त रूप से सीआरपीसी की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ते की मांग की थी। इस प्रवाधान के तहत किसी व्यक्ति को अपनी पत्नी, दिव्यांग बच्चों या अपना खर्च उठाने में असमर्थ माता-पिता को हर महीने आर्थिक सहायता देनी होती है।

रक्षा को हर महीने 2000 रुपए देने के निर्देश

वहीं, फैमिली कोर्ट ने पत्नी के दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वह यह साबित नहीं कर पाई कि वह उसकी कानूनी रूप से ब्याही पत्नी है लेकिन कोर्ट ने रक्षा को हर महीने 2000 रुपए देने का आदेश दिया। गंगा सिंह ने हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द करने की मांग की थी।

फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द करने से किया इनकार

जस्टिस डीडी बंसल ने कहा कि रक्षा को सीआरपीसी की धारा 125 के बजाय हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 20 के तहत गुजारा भत्ते की मांग करनी चाहिए थी। हालांकि, कोर्ट ने तकनीकी आधार पर फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द करने से इनकार कर दिया है। साथ ही कहा है कि आखिरकार न्याय हुआ है।

इस आधार पर बेटी को भत्ता देने के निर्देश

पिता की दलील को खारिज करते हुए भरण पोषण अधिनियम के तहत केवल दिव्यांग बालिग बेटी ही गुजारा भत्ते की मांग कर सकती है। कोर्ट ने धारा 20(3) का हवाला दिया। यह धारा माता-पिता को उस अविवाहित बेटी का भरण-पोषण करने के लिए बाध्य करती है जो अपनी कमाई या संपत्ति से अपना खर्च नहीं उठा सकती।

इसके साथ ही जस्टिस बंस ने कहा कि यह जरूरी नहीं है कि वह किसी दिव्यांगता से पीड़ित हो। यह मानते हुए कि रक्षा ने कानूनी जरूरत को पूरा किया है, हाईकोर्ट ने गंगा सिंह की याचिका खारिज कर दी है।

Related Articles

Back to top button