पेपर लीक: कल्याण सिंह की क्यों आई याद, कैसे नकलचियों की आई थी शामत; क्या 2024 का कानून नाकाफी?

केवल NEET ही नहीं, बल्कि देश से लेकर कई राज्यों के तमाम परीक्षाएं लीक हुईं. पेपर लीक की घटनाओं के बाद सवाल है कि क्या इसे रोकने के लिए कोई कानून नहीं बना है? अगर हां, तो वो नाकाफी क्यों है? देश के किस हिस्से में पेपर लीक को लेकर किस तरह की सजा का प्रावधान है? और इस मुद्दे का जिक्र होने पर यूपी के पूर्व सीएम कल्याण सिंह के दौर की याद क्यों आई, जब परीक्षा में नकल करने वालों की शामत आ गई थी.
Paper Leak Row: देश में मेडिकल एंट्रेस के लिए आयोजित होने वाली नीट परीक्षा के पेपर लीक ने अब बड़ा रूप ले लिया है. दिल्ली के जंतर-मंतर पर शुरू हुआ आंदोलन और फिर लगातार हिंसा के दौर ने मुद्दे को बड़ा बना दिया है. केवल NEET ही नहीं, बल्कि देश से लेकर कई राज्यों के तमाम परीक्षाएं लीक हुईं. पेपर लीक की घटनाओं के बाद सवाल है कि क्या इसे रोकने के लिए कोई कानून नहीं बना है? अगर हां, तो वो नाकाफी क्यों है? देश के किस हिस्से में पेपर लीक को लेकर किस तरह की सजा का प्रावधान है? और इस मुद्दे का जिक्र होने पर भाजपा के दिवंगत नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व सीएम कल्याण सिंह के दौर की याद क्यों आई, जब परीक्षा में नकल करने वालों की शामत आ गई थी. कल्याण सिंह सरकार द्वारा नकल माफिया के खिलाफ उठाए गए इस ऐतिहासिक कदम को आज भी भारत में शिक्षा सुधारों और परीक्षाओं की शुचिता बनाए रखने का सबसे साहसिक उदाहरण क्यों माना जाता है?
केंद्र सरकार ने पेपर लीक को रोकने के लिए लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) विधेयक, 2024 को पारित किया था. यह Public Examinations Prevention of Unfair Means Act, 2024 के तौर पर जानी जाती है. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू कि तरफ से इस विधेयक को अपनी मंजूरी दी गई, जिसके बाद यह कानून बन गया.
इस कानून का उद्देश्य संघ लोक सेवा आयोग (UPSC), कर्मचारी चयन आयोग (SSC), रेलवे, बैंकिंग भर्ती परीक्षाओं और नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) वगैरह की तरफ से आयोजित की जाने वाली सार्वजनिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों को रोकना है. नकल पर रोक लगाने के लिए इस कानून में न्यूनतम 3 से 5 साल की जेल का प्रावधान है, जबकि नकल के संगठित अपराधों में शामिल लोगों को पांच से 10 साल की सजा और न्यूनतम 1 करोड़ रुपये के जुर्माने का सामना करना पड़ेगा.
2024 के इस कानून की बात करें तो यह कई परीक्षाओं पर लागू है. इसमें UPSC, SSC, रेलवे (RRB), NTA (NEET, JEE, CUET), IBPS की परीक्षाएं शामिल हैं. वहीं सजा और जुर्माने की बात करें तो पकड़े जाने पर 3 से 5 साल तक की जेल और भारी जुर्माना शामिल है.
वहीं संगठित गिरोह और माफिया के लिए न्यूनतम 5 से 10 साल की जेल और 1 करोड़ तक का जुर्माना शामिल है. साथ ही परीक्षा आयोजित करने वाली सेवा प्रदाता कंपनियों के लिए एक करोड़ तक का जुर्माना और परीक्षा आयोजित करने से 4 साल तक का बैन शामिल है. इसके तहत सभी अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती बनाए गए हैं.
किस राज्य में क्या है कानून?
कई राज्य सरकारों ने अपने स्तर पर भी बहुत सख्त ‘एंटी-पेपर लीक’ अधिनियम बनाए हैं. आइए उन सभी पर एक नजर गौर फरमाते हैं.
राजस्थान: राज्य में ‘राजस्थान सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम’ के तहत पेपर लीक माफिया पर 10 साल से लेकर आजीवन कारावास की सजा और 10 करोड़ रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है. आरोपियों की संपत्ति जब्त करने का नियम भी है.
उत्तराखंड: उत्तराखंड प्रतिस्पर्धी परीक्षा (उपाय) अध्यादेश के तहत दोषी पाए जाने पर 10 लाख से 10 करोड़ तक का जुर्माना और आजीवन कारावास तक का प्रावधान है.
उत्तर प्रदेश: यूपी में ‘उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) अधिनियम’ के तहत दोषियों की संपत्ति कुर्क (जब्त) करने और 10 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा का नियम है.
गुजरात और असम: इन राज्यों में भी 3 से 10 साल की सजा और संपत्ति की जब्ती के कड़े कानून हैं.
कल्याण सिंह के दौर के यूपी की याद क्यों?
आज देश भर में पेपर लीक और परीक्षाओं में धांधली को लेकर सख्त कानूनों पर चर्चा हो रही है लेकिन उत्तर प्रदेश के इतिहास में एक ऐसा दौर भी रहा है जब परीक्षा में नकल करना सीधा ‘जेल का टिकट’ बन गया था. यह बात साल 1992 की है, जब प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह और उनके शिक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने यूपी बोर्ड की साख बचाने के लिए एक ऐसा सख्त कदम उठाया, जो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया.
क्या था 1992 का ऐतिहासिक ‘नकल अध्यादेश’?
90 के दशक की शुरुआत में उत्तर प्रदेश में नकल माफिया का बोलबाला चरम पर था. परीक्षा केंद्रों के बाहर गाइडों और पर्चियों का अंबार लगा रहता था. इस व्यवस्था को ध्वस्त करने के लिए कल्याण सिंह सरकार नकल विरोधी अध्यादेश, 1992 लेकर आई. इस कानून की कुछ सबसे बड़ी खासियतें थीं.
- गैर-जमानती अपराध: परीक्षा में नकल करते या करवाते पकड़े जाने पर इसे संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध घोषित कर दिया गया.
- सीधे जेल की हवा: यदि कोई छात्र हाथ में पर्ची या उत्तर पुस्तिका में नकल करते पकड़ा जाता, तो पुलिस उसे सीधे परीक्षा हॉल से गिरफ्तार कर हथकड़ी लगाकर जेल भेज देती थी.
- पुलिस को खुली छूट: पुलिस बल को परीक्षा केंद्रों के अंदर जाकर औचक निरीक्षण करने और दबिश देने का पूरा अधिकार दे दिया गया था.
जब 17% छात्रों ने छोड़ दी थी परीक्षा
जैसे ही यूपी बोर्ड की 10वीं और 12वीं की परीक्षाएं शुरू हुईं, नकल अध्यादेश का खौफ ऐसा फैला कि परीक्षा केंद्रों का नजारा रातों-रात बदल गया. लाखों परीक्षार्थियों ने मैदान छोड़ दिए. कानून और जेल जाने के डर से उस साल रजिस्ट्रेशन कराने वाले कुल छात्रों में से लगभग 17 प्रतिशत यानी करीब 3 से 4 लाख परीक्षार्थियों ने परीक्षा बीच में ही छोड़ दी थी.
ऐतिहासिक रूप से रिजल्ट गिरा था. कड़ाई इतनी जबरदस्त थी कि 10वीं बोर्ड का टोटल पासिंग प्रतिशत घटकर मात्र 14.70% और 12वीं का रिजल्ट सिर्फ 30.30% रह गया था. कई विद्यालय ऐसे थे, जहां से एक भी छात्र पास नहीं हो सका. जेलों में जगह कम पड़ने लगी. जगह-जगह से नकल करते पकड़े गए छात्रों और नकल माफिया के गुर्गों को हथकड़ियां पहनाकर थानों और जेलों में भेजा जाने लगा.
कल्याण सिंह के राज की डिग्री’
हालांकि, इस सख्त कानून के कारण छात्रों के अभिभावकों और राजनीतिक हलकों में काफी विरोध भी हुआ. यह फैसला इतना बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया कि 1993 में सत्ता में परिवर्तन के बाद मुलायम सिंह यादव की सरकार ने इस अध्यादेश को वापस ले लिया था.




