जवाब दे चुनाव आयोग

चुनाव आयोग और विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) एक बार फिर चर्चा में नहीं, सवालों और विवादों में हैं। देश की राजधानी दिल्ली में करीब 47.5 लाख मतदाताओं के नाम काट दिए गए हैं। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के राज्य महाराष्ट्र में 2.07 करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए हैं। फिलहाल ड्राफ्ट सूची जारी हुई है। अभी लोगों के पास वक्त है कि वे आपत्ति और दावे दर्ज करा सकते हैं और मताधिकार के मौलिक अधिकार की रक्षा कर सकते हैं। दिल्ली में कुल मतदाता 1.45 करोड़ से अधिक थे, जिनमें से अब 97.53 लाख से कुछ अधिक ही नई सूची में दर्ज किए गए हैं। दिल्ली के तुगलकाबाद में 47.85 फीसदी मतदाताओं के नाम पर ‘लाल लाइन’ फेर दी गई है। ओखला, बदरपुर, कस्तूरबा नगर में भी 40-45 फीसदी मतदाताओं के नाम काट दिए गए हैं। राजधानी दिल्ली कोई सीमावर्ती क्षेत्र नहीं है, लिहाजा बांग्लादेशी या रोहिंग्या घुसपैठियों की संभावनाएं नगण्य हैं। जो बंगाली लोग दिल्ली में बसे हैं और वहां निरंतर काम कर रहे हैं, वे लंबे समय से दिल्ली में ही हैं। उनके मतदाता पहचान-पत्र भी बने हुए हैं और वे चुनावों में मतदान करते रहे हैं। दिल्ली में फरवरी-मार्च, 2025 में विधानसभा चुनाव हुए थे, संभवत: उन्होंने भी मतदान किया होगा, जिनके नाम अब एसआईआर में काट दिए गए हैं। जिन इलाकों में 40-47.8 फीसदी तक वोटर सूची से बाहर कर दिए गए हैं, वे भी विधानसभा क्षेत्र हैं, जाहिर है कि वहां भी वोट दिए गए होंगे और विधायक भी चुने गए हैं। क्या वे सभी ‘फर्जी’ जन-प्रतिनिधि हैं? इसका जवाब तो चुनाव आयोग ही दे सकता है। उसने कुछ वर्गीकरण स्पष्ट किए भी हैं, लेकिन वे पर्याप्त और स्पष्ट नहीं हैं। काम या नौकरी के लिए कोई भी व्यक्ति बाहर जा सकता है। क्या उसकी अनुपस्थिति दिखा कर उसका मताधिकार छीना जा सकता है? महाराष्ट्र में भी विधानसभा चुनाव नवंबर, 2024 में हुए हैं।
वहां करीब 9.78 करोड़ मतदाताओं ने विधानसभा के लिए मताधिकार का प्रयोग किया। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी 9 करोड़ से अधिक मतदाता थे, लेकिन अब एसआईआर के बाद ड्राफ्ट सूची में 7.71 करोड़ मतदाताओं के ही नाम दर्ज किए गए हैं। अर्थात 2.07 करोड़ मतदाता, किसी भी कारण से, ‘फर्जी’ करार दे दिए गए हैं। दिल्ली, महाराष्ट्र की घटनाएं, मताधिकार छीनने की कवायद, कोई सामान्य बात नहीं है। बेशक संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को मतदाता सूची के अधीक्षण, निर्देशन, नियंत्रण का अधिकार दिया गया है, तो अनुच्छेद 326 में प्रत्येक वयस्क भारतीय नागरिक को मताधिकार का मौलिक अधिकार भी प्राप्त है। उसे चुनाव आयोग कैसे छीन सकता है? एसआईआर की अभी तक कवायद में 6 करोड़ से अधिक मतदाताओं का मौलिक अधिकार छिन चुका है। सरकार की तो आंखें मिची हैं, क्योंकि उसकी पार्टी चुनाव-दर-चुनाव जीत रही है। कमोबेश सर्वोच्च अदालत तो निर्णायक हस्तक्षेप करे और नागरिकों को इस ‘संवैधानिक आघात’ से बचाए। यहां पश्चिम बंगाल का उल्लेख करना भी प्रासंगिक है। वहां इसी मई, 2026 में विधानसभा चुनाव हुए हैं और भाजपा की पहली बार सरकार बनी है। चुनाव से पहले एसआईआर के तहत 27.16 लाख मतदाताओं को ‘तार्किक विसंगति’ श्रेणी में रखा गया था। यह श्रेणी किसी अन्य राज्य में नहीं बनाई गई। बहरहाल सर्वोच्च अदालत के निर्देश पर ट्रिब्यूनल गठित किए गए। बीते दिनों तक 82,782 मामले ट्रिब्यूनल ने निपटाए हैं, जिनमें से 75,443 मतदाताओं के नाम और दावे सही पाए गए। गौरतलब यह है कि मालदा, उत्तर 24 परगना सरीखे क्षेत्रों में 100 फीसदी नाम सही पाए गए, लेकिन वे मतदाता वोट नहीं डाल पाए। बंगाल में कुल 91 फीसदी मतदाता सही पाए गए, जिनके नाम काट दिए गए थे, लेकिन विडंबना है कि करीब 7 लाख लोगों ने ही आपत्तियां और अपने दावे दर्ज कराए हैं। शेष 20 लाख कथित मतदाता कौन हैं, वे कहां हैं, आपत्तियां दर्ज क्यों नहीं कराईं? गंभीर सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग इतना खुदमुख्तार है कि 6 करोड़ मतदाताओं के नाम काट दे और यह देश के सामने स्पष्ट न हो कि इतने व्यापक स्तर पर संवैधानिक मताधिकार क्यों छीन लिए गए? बिंदुवार जवाब तो चुनाव आयोग ही दे सकता है। विपक्ष की कई पार्टियां इस मसले पर सवाल उठा रही हैं। लोकतंत्र में बेहतर यही होता है कि विपक्ष की आवाज को भी सुना जाए। चुनाव आयोग को यह भी प्रमाणित करना है कि उसने ये नाम दल विशेष की इच्छा पर नहीं हटाए हैं। चुनाव आयोग अगर यह प्रमाणित न कर पाया कि उसने सत्ता पक्ष के लाभ के लिए ऐसा नहीं किया है, तो उस पर लगे आरोपों को मजबूती मिलेगी। चुनाव आयोग को जल्द से जल्द इस मसले पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।




