भारत में सच्चे संतों की कमी नहीं!

बाबा नीब करौरी के जीवन के पूर्वाद्र्ध पर बनी फिल्म ‘हनुमान अंश’ ने देश-विदेश के सनातनधर्मियों के हृदय को स्पर्श किया है। पिछले हफ्ते जब थिएटर में मैं ये फिल्म देख रहा था, तो अपनी भावनाओं को रोक नहीं पाया और आंखें कई बार छलछला गईं। कारण यह कि नीब करौरी बाबा का तो नहीं, पर उन जैसे कुछ संतों का सान्निध्य पिछले 28 वर्षों में मुझे निरंतर प्राप्त हुआ है। इन संतों की सहजता, दरिद्र नारायण के प्रति करुणा और अमीर-गरीब के बीच कोई फर्क न करने की प्रवृत्ति ने मुझे बहुत प्रभावित किया।
1998 में जब बरसाना के विरक्त संत श्री रमेश बाबा से मिला तो वह मानगढ़ की पहाड़ी पर एक खण्डहर-नुमा कमरे में रहते थे, जिसमें जून की गर्म दोपहरी में आते गर्म हवा के थपेड़ों को रोकने के लिए खिड़कियों पर फटी बोरियों को भिगो कर टांगा हुआ था। जब बाबा ने मुझे ब्रज की सांस्कृतिक धरोहरों को सजाने-संवारने का आदेश दिया तो उन्होंने यह भी कहा कि, ‘‘भगवान दीनबंधु दीनानाथ हैं, धनीबंधु वी.आई.पी. नाथ नहीं। पहले फकीर बनो, तब ब्रज की सेवा करना।’’ बाबा के सान्निध्य में 2002-05 के बीच मैंने भी ऐसा जीवन जीने का प्रयास किया। बोरी बिछा कर सोना, भिक्षा मांग कर रोटी खाना और बेहद साधारण कपड़े पहनना। पर इतना ही काफी नहीं था। अपने स्वभाव में दीनता लाने का भी अभ्यास करना था। इस तरह बाबा ने अनेक प्रकार से ब्रज सेवा के लिए प्रशिक्षित किया।
इसी तरह बरसाना की पीली पोखर पर रहने वाले विरक्त संत विनोद बाबा भी हैं। जिनके तप, सादगी, करुणा और हृदय की विशालता को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। मेरी मित्र मीरा बोरवांकर, जो महाराष्ट्र की चॢचत पुलिस अधिकारी रही और जिसके जीवन पर बॉलीवुड की फिल्म ‘मर्दानी’ बनी, वह विनोद बाबा के दर्शन को तैयार नहीं थी। पर मैं उसे ले गया। बाबा को देखते ही वह ऐसी स्तब्ध हुई कि वहां उनके सामने घंटों बैठने की इच्छा व्यक्त करने लगी। जिस तरह बादल रात में चुपचाप किसान के खेत पर वर्षा करके चले जाते हैं, वैसे ही संत भी हमारे जीवन में अपनी कृपा की वृष्टि अनायास ही करते रहते हैं। गोवर्धन के सियाराम बाबा, वृंदावन के कृपाविलास वाले महाराज, पिछले कुछ वर्षों में प्रेमानंद जी महाराज और केरल की संत माता अमृतानंदमयी ‘अम्मा’ के सान्निध्य में मुझे ऐसे ही अनेक अनुभव हुए हैं। सच्चे संत हमारी पात्रता को नहीं देखते, वे तो अहैतुकि कृपा करते हैं। नीब करौरी बाबा का जीवन भी ऐसा ही था। उन्होंने आडंबर और वैभव रहित सादगी भरा जीवन आम जनमानस के लिए समॢपत किया था। उनके क्रियाकलाप ये सिद्ध करने के लिए काफी हैं कि संत को आपके पद, धन, रुतबे और हैसियत से कुछ लेना-देना नहीं होता। दुर्भाग्य की बात यह है कि आज देश में सनातन धर्म के नाम पर शोर मचाने वाले ऐसे हजारों धर्मध्वजी, आत्मघोषित ‘संत’, गुरु, कथावाचक आदि सोशल मीडिया और समाज में छा गए हैं, जिनका आचरण दूर-दूर तक संतों जैसा नहीं है।
आम जनता अपने जीवन के कष्टों से मुक्ति पाने के लिए धर्म की शरण लेती है। पर उन्हें मिलता है ‘ऊंची दुकान और फीका पकवान’। पिछले 30 वर्षों में मैंने इस कॉलम में कई बार लिखा है कि जिसके सम्मुख बैठ कर आपकी भौतिक कामनाएं समाप्त हो जाएं और आध्यात्मिक जिज्ञासा का वेग प्रबल हो जाए, वही सच्चा संत है। बाकी तो सब धार्मिक मनोरंजन हैं। हमें भगवान या सच्चे संत से कुछ कह कर मांगना नहीं होता। नीब करौरी बाबा की तरह वे स्वयं ही जान लेते हैं कि हमें क्या चाहिए या हमारा भला किसमें है। भगवान श्री कृष्ण भगवद्गीता के 18वें अध्याय के 61वें श्लोक में कहते हैं कि, ‘ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥’ अर्थात् हे अर्जुन! ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में निवास करते हैं। तो उनसे कुछ बोल कर मांगने की क्या जरूरत है?
देश के कोने-कोने में ऐसे सच्चे संतों की कमी नहीं, जो हमें तत्वज्ञान भी करा सकते हैं और हमारी व्यग्रता को भी शांत कर सकते हैं। ऐसे संतों को हमसे धन, संसाधन की अपेक्षा नहीं होती। उन्हें जबरन शिष्य बनाने की इच्छा भी नहीं होती। ऐसे संत तो हमारे लाख बार नाक रगडऩे के बाद भी हमारी पात्रता को देख कर ही अपना शिष्य स्वीकार करते हैं। लगभग 500 वर्ष पूर्व महाप्रभु वल्लभाचार्य जी ब्रज चौरासी कोस यात्रा के दौरान एक जंगल में पड़े विशालकाय अजगर को देख कर ठिठक गए। उस अजगर को हजारों चींटियां खा रही थीं। वह दर्द से छटपटा रहा था। महाप्रभु ने वहीं ठहर कर श्रीमद् भगवद् के 108 पाठ करने का निर्णय किया। उनके अचंभित शिष्यों ने इसका कारण पूछा। महाप्रभु ने कहा कि यह अजगर पिछले जन्म में आत्मघोषित गुरु था। इसने हजारों लोगों को दीक्षा देकर अपना शिष्य बनाया। पर न तो वह अपना उद्धार कर सका और न ही अपने हजारों शिष्यों का। वही शिष्य इस जन्म में ये हजारों चींटियां बन कर उसका शरीर खा रही हैं। इसलिए कहा जाता है, ‘पानी पीजिए छान कर, गुरु कीजिए जान कर।’-विनीत नारायण




