शक्ति संतुलन, कूटनीति और जलवायु संकट

प्रत्येक वर्ष किसी न किसी ऋतु में कोई न कोई प्रतिकूल संकटजन्य ऋतुगत घटना हो ही रही है। इस सत्य को सम्मुख रखते हुए संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों और विशेषकर विकसित सदस्य देशों को जीवन-जगत के संबंध में मानवीय एवं प्राकृतिक दृष्टिकोण अंगीकार करना होगा…
विश्व में अनेक स्तर पर हो रहे युद्धों, दो या अधिक देशों के पारस्परिक सशस्त्र संघर्षों तथा अन्य राजनीतिक प्रतिकूलताओं व नकारात्मक प्रतिस्पद्र्धाओं के बीच संपन्न संयुक्त राष्ट्र की वार्षिक महासभा में अत्यधिक हलचल रही। सन् 2014 के बाद महासभा में ऐसी हलचल प्रत्येक वर्ष हो रही है और आगामी वर्ष में तीव्र से तीव्रतम हो रही है। जब तक दुनिया में संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य देशों- अमरीका, चीन, फ्रांस, रूस और ब्रिटेन के देशज हित सधते रहे, तब तक महासभा का आयोजन शेष विश्व के लिए एक साधारण आयोजन हुआ करता था। किंतु जब से उक्त पांच देशों के मध्य स्वार्थ साधने एवं शीर्ष पर स्थापित होने की स्पर्धा बढ़ी तथा इनके प्रतिस्पद्र्धी बनकर दुनिया के कुछ अन्य देश भी खड़े हुए हैं, तब से महासभा की वार्षिक बैठक आरोप-प्रत्यारोप का मंच बन गई है। पांच देशों के प्रतिस्पद्र्धी बनकर खड़े होने वाले देशों में सम्मिलित हैं भारत, जर्मनी, जापान, ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया। विशेषकर भारत में 2014 के बाद जो शासन तंत्र स्थापित हुआ और जिस प्रकार स्वदेशी गौरव के प्रति एक तीव्र शासकीय एवं लोकतांत्रिक हलचल होनी आरंभ हुई, उस परिस्थिति में संयुक्त राष्ट्र के प्रभुत्व में दबदबा बनाए रखने वाले प्रमुख पांच देशों में से अमरीका, चीन एवं ब्रिटेन को कुछ अधिक बेचैनी हो गई है। भारत, रूस एवं चीन के नेतृत्व में ब्रिक्स सहित दक्षिण एशियाई एवं मध्य पूर्वी देशों के बीच अमरीकी-यूरोपीय शासकीय प्रभुत्व को खंडित करने के लिए वैचारिक एवं व्यावहारिक स्तर पर जो नवचेतना जागृत हुई है, उसने भी विश्व को पिछले एक-डेढ़ दशक में पहले तो शीतयुद्ध में धकेला और अब उस कारण धीरे-धीरे विभिन्न स्तरों पर देशों के मध्य सशस्त्र संघर्ष भी बढ़ रहा है।
जिस प्रकार विश्व समय-समय पर शीतयुद्ध से प्रभावित रहा है, उसी प्रकार भारत के केंद्रीय कल्याणकारी भूमिका में अवतरित होने के बाद संपूर्ण विश्व में शीत-समन्वय की धारणा जड़ें जमा रही है। अघोषित रूप से भारत की विदेश नीति सर्वमान्य हो रही है। विदेशों में भारत के मानवतावादी सिद्धांत की प्रशंसा हो रही है। किसी भी मंच पर भारत का मत स्वार्थ से विलग जगहित के लिए होता है। इस भाव को दुनिया के अधिसंख्य देश पहचान रहे हैं। भारत के शत्रु देश भी इस भावना से भलीभांति परिचित हैं। इसीलिए वे भारतीय पराभव के लिए अनेक प्रकार के षड्यंत्रों में लिप्त हैं। महासभा के मंच पर जहां अधिसंख्य देशों एवं उनके प्रमुखों तथा प्रमुखों की अनुपस्थिति में उनके प्रतिनिधियों ने अपने-अपने हितों के रक्षार्थ भाषण किया तथा अपने शत्रु देश के प्रति आक्रोश से भरकर अपनी-अपनी आपत्तियां प्रकट कीं, वहीं भारतीय प्रतिनिधि विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अत्यंत शांत होकर, संयम एवं विनीत भावना के साथ वैश्विक युद्धजन्य संघर्षों, प्राकृतिक चुनौतियों, असमान सुख-सुविधाओं के वितरण, आदि मानवीयता-केंद्रित विषयों पर संभाषण किया तथा पारस्परिक सेवा व सहयोग के विचार के साथ विकसित होने के विचार पर बल दिया। हालांकि उन्होंने भी भारत के पारंपरिक शत्रु देश पाकिस्तान पर मंच से दोषारोपण किया, किंतु ऐसा आरोप कल्पना आधारित नहीं है। यह अनेक स्तर पर प्रामाणिक है। यह अलग बात है कि न तो अमरीका और न ही संयुक्त राष्ट्र ने इस पर आज तक गंभीरतापूर्वक विचार किया है। संयुक्त राष्ट्र की अप्रासंगिकता एवं अनुपयोगिता को स्वीकार करके ही तो दक्षिण एवं पश्चिमी एशिया में ब्रिक्स जैसा संगठन वर्ष-प्रतिवर्ष वृहद आकार ले रहा है। इस संगठन की व्यावहारिक व उपयोगी कार्यप्रणालियों के कारण शनै:.शनै: जी-7 एवं जी-20 जैसे समूहों की आवश्यकता व उपयोगिता पर संकट मंडरा रहा है।
जी-7 एवं जी-20 जैसे समूहों के बल पर ही संयुक्त राष्ट्र की भी प्रासंगिकता है। ऐसे में यदि ब्रिक्स का आकार प्रत्येक वर्ष बढ़ता रहा और इसमें यूरोप, अफ्रीका एवं दुनिया के अन्य द्वीपों के देश सदस्यों के रूप में जुड़ते रहे तो वास्तव में अमरीका, ब्रिटेन व यूरोप का वैश्विक प्रभाव अत्यंत कम हो जाएगा। इन्हीं चिंताओं से घिरकर अमरीका, ब्रिटेन के नेतृत्व में विश्व को निरंतर विभिन्न स्तर पर सशस्त्र युद्धों, आतंकी घटनाओं एवं लोकतंत्र के विरोध में अराजक आंदोलनों में धकेला जा रहा है। इस संवेदनशील स्थिति में पूरे विश्व में भारत ही एकमात्र देश है, जो सर्वहित की बात करता है, जो परस्पर सहायता एवं सहयोग के बल पर विकसित होने का विकल्प सम्मुख रखता है, जो कठोर सशस्त्र संघर्षों के बीच भी समझौता, शांति एवं मानवता के मार्ग को चुनने की सलाह देता है। संयुक्त राष्ट्र के मंच से भी भारत ने एस. जयशंकर के माध्यम से ऐसा ही किया है। विदेश मंत्री की बातों के मर्म को समझा जाए तो स्पष्ट होता है कि यह भारतीय अध्यात्म, दर्शन, धर्म एवं सर्वहितैषी भाव के केंद्रीय विचार का ही संभाषणीय प्रतिपादन है। ऐसी भावना का प्रतिनिधि भारत ही हो सकता है। ब्रिक्स हो अथवा संयुक्त राष्ट्र, सभी मंचों पर अब देश को न तो इंडिया लिखा जाता है और न बोला जाता है। अब देश का संबोधन भारत के रूप में होता है। यह हिंदुस्थानियों के लिए अत्यंत गर्व का विषय है। लाख शासकीय कमियों के उपरांत भी विगत 12 वर्षों के भारतीय केंद्रीय शासन की विदेश नीति सबसे अच्छी नीति के रूप में साकार हुई है और इसमें विदेश मंत्री एस. जयशंकर की अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका है। हालांकि भारत विभिन्न प्रकार के संघर्षों में उलझी हुई दुनिया और इसके देशों के लिए सकारात्मक संभाषण करते हुए हरेक मंच को सकारात्मकता प्रदान करता है, किंतु वास्तविकता पर ध्यान लगाएं तो वह यही है कि संघर्षों के लिए दोषी देश केवल मंच की परिधि में ही रहकर भारत या किसी अन्य देश की ऐसी सकारात्मकता पर ध्यान लगाते हैं, और मंचावधि समाप्त होते ही पुन: अपने-अपने हठ, स्वार्थ एवं अहंकार की पूर्ति में लग जाते हैं। इस समय जगत में सशस्त्र संघर्ष ही एक प्रमुख एवं दीर्घ कारण नहीं, जो चिंता का विषय है, बल्कि जलवायु की प्रतिकूलता सबसे बड़ा चिंतनशील विषय है। दुर्भाग्य से यह विषय विकसित देशों के लिए चिंता एवं चिंतन का विषय है ही नहीं। आज 27 सितंबर अपराह्न 3 बजे जब यह लेख लिखा जा रहा है, उस समय संपूर्ण उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, विदर्भ, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश आदि प्रदेशों में विगत 30 से अधिक घंटों से निरंतर वर्षा हो रही है। नेपाल में भी यही स्थिति है।
आश्विन मास में जब श्राद्ध अर्थात् पितृपक्ष प्रारंभ होते हैं, तब प्राय: ऐसा वर्षण नहीं होता। इस वर्ष यह प्राकृतिक प्रतिकूलता की दृष्टि से चिंताजनक एवं अस्वाभाविक घटना है। प्रत्येक वर्ष किसी न किसी ऋतु में कोई न कोई प्रतिकूल संकटजन्य ऋतुगत घटना हो ही रही है। इस सत्य को सम्मुख रखते हुए संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों और विशेषकर विकसित सदस्य देशों को जीवन-जगत के संबंध में मानवीय एवं प्राकृतिक दृष्टिकोण अंगीकार करना होगा। यदि प्रकृति से उत्पन्न जलवायु ऐसी ही विकृतियां प्रकट करती रही, तो मनुष्य का जीवन वैज्ञानिक एवं प्रगति की विसंगतियों से बाद में तथा प्राकृतिक विघटनों के कारण पहले ही समाप्त हो जाएगा। संयुक्त राष्ट्र की निष्प्रभाविता, समूहबद्धता और संकीर्ण स्वार्थों के बीच आज विश्व इतिहास के एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। जहां एक ओर वैश्विक शक्तियां वर्चस्व की होड़ में युद्ध और अशांति को बढ़ावा दे रही हैं, वहीं भारत वसुधैव कुटुंबकम की मूल चेतना के साथ सहयोग का विकल्प प्रस्तुत कर रहा है।-विकेश कुमार बडोला




