ज्योतिष

13 या 14 जुलाई, आषाढ़ अमावस्या कब? सही तिथि और पितरों को प्रसन्न करने के उपाय

उज्जैन. हिंदू धर्म में हर तिथि हर वार का अत्यधिक महत्व शास्त्रों में बताया गया है. इसी प्रकार सालभर में 12 अमावस्या आती हैं लेकिन इनमें आषाढ़ अमावस्या का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है. यह तिथि आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि को आती है. शास्त्रों में अमावस्या को पितरों की उपासना और स्मरण का दिन बताया गया है. प्राचीन काल से ही इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने, दान-पुण्य करने और पितरों के निमित्त तर्पण करने की परंपरा चली आ रही है.

मान्यता है कि आषाढ़ अमावस्या पर श्रद्धापूर्वक तर्पण करने से पूर्वज संतुष्ट होते हैं और परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखते हैं. इससे पितृ दोष का प्रभाव कम होता है और घर-परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का वातावरण बना रहता है. इस बार आषाढ़ मास की अमावस्या को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है. आइए उज्जैन के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य आनंद भारद्वाज से जानते हैं कि आषाढ़ अमावस्या की सही तिथि क्या है.

कब मनाई जाएगी आषाढ़ अमावस्या?
वैदिक पंचांग के अनुसार, आषाढ़ कृष्ण अमावस्या तिथि का प्रारंभ 13 जुलाई दिन सोमवार को शाम 6 बजकर 49 मिनट के लगभग हो रहा है. यह तिथि अगले दिन 14 जुलाई दिन मंगलवार को दोपहर 3 बजकर 12 मिनट के लगभग तक रहेगी. ऐसे में उदयातिथि के आधार पर आषाढ़ अमावस्या 14 जुलाई को है. उस दिन ही स्नान, दान, तर्पण, श्राद्ध आदि किया जाएगा.

आषाढ़ अमावस्या को क्यों कहते हैं हलहारिणी अमावस्या?
आषाढ़ अमावस्या को हलहारिणी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है. इस दिन किसान अपने हल, बैलों और खेती में उपयोग होने वाले सभी कृषि उपकरणों का विधि-विधान से पूजन करते हैं. साथ ही धरती माता के प्रति आभार व्यक्त कर भरपूर वर्षा और समृद्ध फसल की कामना करते हैं. मान्यता है कि इसी समय से बारिश का मौसम गति पकड़ता है और खेतों में जुताई और बुवाई की शुरुआत होती है. यही कारण है कि यह अमावस्या किसानों के लिए विशेष महत्व रखती है.

पितरों को प्रसन्न करने के लिए जरूर करें ये काम
1. आषाढ़ अमावस्या पर सुबह जल्दी उठकर सबसे पहले स्नान करें. फिर पितरों का स्मरण कर तर्पण दें. तर्पण के लिए काले तिल, सफेद फूल और कुश का इस्तेमाल होता है. तर्पण से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है.

2. इस दिन पितरों को प्रसन्न करने के लिए पितृ चालीसा का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है. साथ ही पितरों की आत्मा की शांति के लिए ब्राह्मणों को भोजन कराएं और दान-दक्षिणा दें.

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