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निर्यात चुनौतियों से निपटने की रणनीति बने

यह भी महत्वपूर्ण है कि एक फरवरी को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के द्वारा प्रस्तुत केंद्रीय बजट 2026-27 में विनिर्माण, वस्त्र, चमड़ा और समुद्री भोजन जैसे प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करते हुए निर्यात बढ़ाने के लिए जो कई रणनीतिक उपाय किए गए हैं, उन पर नए वित्तीय वर्ष में शुरुआत से ध्यान देना होगा…

हाल ही में 6 मार्च को वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि सरकार पश्चिमी एशिया में चल रहे युद्ध से प्रभावित भारतीय निर्यातकों को राहत देने के लिए काम कर रही है। उन्होंने कहा कि इन दिनों निर्यातक रसद संबंधी चुनौतियों के अलावा निर्यात घरेलू बंदरगाहों पर पश्चिम एशिया जाने वाले कार्गो के अटकने से खड़े होने वाले संकट के प्रति आगाह कर रहे हैं। कुछ शिपिंग कंपनियां उच्च युद्ध-जोखिम शुल्क की मांग कर रही हैं, जबकि कुछ अन्य अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्रों में फंसे हुए हैं। उन्हें कंटेनरों की कमी, पश्चिम एशिया के लिए पोत कॉल के निलंबन या रद्द होने और तेजी से उच्च रसद लागत बढऩे का भी सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में सरकार अपने निर्यातकों को राहत देने के कुछ ठोस तरीके अपनाने की डगर पर आगे बढ़ी है। सरकार ने तत्परतापूर्वक 2 मार्च को युद्ध से निर्मित हालात से भारतीय निर्यात पर पडऩे वाले प्रभाव पर निर्यात से संबंधित सरकारी मंत्रालयों, निर्यातकों के संगठन, लॉजिस्टिक संचालकों और शिपिंग कंपनियों के प्रतिनिधियों की विशेष बैठक में विचार मंथन के बाद बहुमंत्रालयी सहायता डेस्क सहित निर्यातकों को हरसंभव सहयोग-प्रोत्साहन दिया जाना सुनिश्चित किया है।

उल्लेखनीय है कि ईरान और इजरायल-अमेरिका के युद्ध के बीच ईरान के द्वारा वैश्विक शिपिंग रूट होर्मुज स्ट्रीट बंद कर दिया गया है। दुनिया को मिलने वाला करीब एक तिहाई तेल, करीब 20 फीसदी लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) और खाद्य उत्पादों का अधिकांश यातायात इसी मार्ग से होता है। ऐसे में इस जलमार्ग के बंद हो जाने से कच्चे तेल की ग्लोबल सप्लाई चेन प्रभावित होने लगी है। चूंकि कच्चे तेल के लिहाज से भारत का करीब 40 प्रतिशत कच्चा तेल इसी रास्ते से होकर आता है, ऐसे में यह युद्ध भारत के लिए कच्चे तेल संबंधी चिंता के साथ निर्यात चुनौती निर्मित करते हुए दिखाई दे रहा है। चूंकि भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों के करीब 85 फीसदी तक आयात पर निर्भर है, अतएव कच्चे तेल के दाम में बढ़ोतरी भारत के आयात बिल की चिंता बढ़ाते हुए दिखाई दे रही है। स्थिति यह है कि 7 मार्च को कच्चे तेल की कीमत करीब 91 डॉलर प्रति बैरल के मूल्य स्तर पर पहुंच गई है। युद्ध के लंबा खींचने पर कच्चे तेल की कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती है और इससे पेट्रोल, डीजल और अन्य पेट्रोलियम उत्पाद महंगे होने लगेंगे और इससे भारत से निर्यात घटने और व्यापार घाटा बढऩे की चुनौती गहराते हुए दिखाई देगी। चूंकि इस युद्ध से सीधे तौर पर जुड़े हुए अमेरिका, इजरायल और ईरान सहित युद्ध से प्रभावित पश्चिम एशियाई और यूरोपीय देश भी भारत के लिए निर्यात के प्रमुख बाजार हैं, ऐसे में भारत के निर्यातकों की चिंताएं बढ़ गई हैं। पश्चिम एशिया जाने वाला माल भारत के घरेलू बंदरगाहों पर जमा होने लगा है।

शिपिंग कंपनियां चालक दल, कार्गो और जहाजों की सुरक्षा को देखते नए निर्यात आदेश नहीं ले रही हैं। ऐसे में खासतौर से पश्चिम एशिया के देशों में निर्यात घटने की आशंका है। भारत ने इस वित्तीय वर्ष 2025-26 में अप्रैल से दिसंबर की अवधि में पश्चिम एशिया के 13 देशों को करीब 50 अरब डालर मूल्य की वस्तुओं का निर्यात किया, जो भारत के कुल निर्यात का करीब 15 फीसदी है। इन विभिन्न देशों में भारत से होने वाले खाद्य उत्पाद, टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग सामान, बासमती चावल, चाय, मशीनरी, फार्मास्युटिकल्स, रत्न-आभूषण, प्लास्टिक और रबर जैसे क्षेत्रों में निर्यात प्रभावित होते हुए दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में भारत को द्विपक्षीय और मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) का पूरा लाभ लेते हुए निर्यात को हरसंभव तरीके से बढ़ाने की रणनीति के साथ आगे बढऩा होगा। यह कोई छोटी बात नहीं हैं कि पश्चिम एशिया में गहराते युद्ध के दौर में भी 2 मार्च को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कनाडाई प्रधानमंत्री कार्नी के साथ द्विपक्षीय व्यापार वार्ता की। इस वार्ता के पश्चात भारत-कनाडा के बीच यूरेनियम-परमाणु सहयोग, क्रिटिकल मिनरल्स और नवीन नवीनीकरणीय ऊर्जा समझौतों पर मुहर लगाई गई। साथ ही भारत और कनाडा ने मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) के लिए टम्र्स ऑफ रेफरेंस दस्तावेज को अंतिम रूप दे दिया है। इसके तहत दोनों देश 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 50 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंचाने के लिए सहमत हुए हैं। इस समझौते पर इस वर्ष 2026 के अंत तक हस्ताक्षर होने की उम्मीद है।

पिछले माह 25 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इजरायली संसद ‘नेसेट’ को संबोधित करते हुए कहा कि इजरायल के साथ भारत का एफटीए जल्दी ही आकार लेते हुए दिखाई देगा। नि:संदेह भारत से निर्यात बढ़ाने के लिए भारत के व्यापार समझौते महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। भारत के द्वारा हाल ही के महीनों में जिन देशों के साथ एफटीए किए गए हैं, उन्हें शीघ्रतापूर्वक क्रियान्वयन की डगर पर आगे बढ़ाना होगा। इनमें 27 जनवरी को भारत-यूरोपीय संघ (ईयू) के शिखर सम्मेलन के दौरान ऐलान किया गया एफटीए सबसे महत्वपूर्ण है। यह एफटीए दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच तालमेल का शानदार उदाहरण है और भारत के लिए अत्यधिक लाभप्रद है। इसी तरह पिछले वर्ष 2025 में भारत के द्वारा ब्रिटेन, ओमान और न्यूजीलैंड के साथ किए गए एफटीए का इस वर्ष 2026 में कार्यान्वयन अहम होगा। इन सबके साथ-साथ मॉरीशस, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), ऑस्ट्रेलिया और चार यूरोपीय देशों आइसलैंड, स्विट्जरलैंड, नॉर्वे और लिकटेंस्टाइन के समूह यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन (एफ्टा) के साथ कार्यान्वित हो रहे एफटीए के और अधिक लाभ मिलते हुए दिखाई देंगे। साथ ही इस वर्ष 2026 में पेरू, चिली, आसियान, मैक्सिको, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, इजराइल, भारत गल्फ कंट्रीज काउंसिल सहित अन्य प्रमुख देशों के साथ भी नए एफटीए को इसी वर्ष 2026 में आकार दिए जाने की पहल की जानी होगी। इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि विस्तारित होते हुए ईरान और इजराइल-अमेरिका युद्ध के बीच भारत से निर्यात बढ़ाना कोई सरल काम नहीं है। ऐसे में भारत के द्वारा निर्यात बढ़ाने के लिए चिन्हित किए गए करीब 200 देशों में निर्यात की नई रणनीति के साथ आगे बढऩा होगा।

भारत से निर्यात बढ़ाने के मद्देनजर निर्यातकों की दिक्कतों को कम करना होगा। ये दिक्कतें केवल शुल्क वृद्धि तक सीमित नहीं हैं, वरन् निर्यात पर लगाए गए एंटी-डंपिंग शुल्क से भी संबंधित हैं। घरेलू कच्चे माल की ऊंची लागत और ईंधन की उच्च कीमतों के कारण भी भारत के द्वारा निर्यात किए जाने वाले उत्पाद वैश्विक स्तर से करीब 15-20 फीसदी की अधिक लागत पर दिखाई देते हैं। अब घरेलू ढांचागत सुधारों के प्रति नए सिरे से प्रतिबद्धता आवश्यक होगी। इस हेतु देश में नियमों और नियामक संस्थाओं के कामकाज में मूलभूत बदलाव की जरूरत है। कर सुधारों को और गहराई देने के साथ जीएसटी प्रणाली को प्रभावी बनाना जरूरी है। यह भी महत्वपूर्ण है कि एक फरवरी को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के द्वारा प्रस्तुत केंद्रीय बजट 2026-27 में विनिर्माण, वस्त्र, चमड़ा और समुद्री भोजन जैसे प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करते हुए निर्यात बढ़ाने के लिए जो कई रणनीतिक उपाय किए गए हैं, उन पर नए वित्तीय वर्ष में शुरुआत से ध्यान देना होगा। उम्मीद करें कि सरकार ईरान और इजराइल-अमेरिका के विस्तारित होते हुए युद्ध की वजह से भारत के समक्ष दिखाई दे रही निर्यात चुनौतियों से निपटने और निर्यात बढ़ाने के मद्देनजर विभिन्न देशों के साथ भारत के व्यापार समझौतों के अधिकतम लाभ हेतु गुणवत्तापूर्ण उत्पादन और नए सुधारों की राह पर आगे बढ़ेगी।

डा. जयंती लाल भंडारी

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