दो हफ्ते का युद्धविराम

कयामत की रात, बिना कयामत के ही, गुजर गई और एक सभ्यता भी खत्म होने से बच गई। ईरान की 5-6 हजार साल पुरानी सभ्यता को खत्म भी नहीं किया जा सकता था, बेशक अमरीकी राष्ट्रपति टं्रप कुछ भी बयान दें। सिकंदर और मंगोल शासक भी ईरान की सभ्यता को खत्म नहीं कर पाए। बहरहाल सभ्यता खत्म करने की ‘डेडलाइन’ से पहले ही, 8 अप्रैल की भोर में, युद्धविराम की घोषणा कर दी गई। युद्धविराम फिलहाल दो सप्ताह तक रहेगा। यह घोषणा करने से पहले राष्ट्रपति टं्रप ने फोन पर इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू से बातचीत की। अंतत: नेतन्याहू को टं्रप का फैसला स्वीकार करना पड़ा। ईरान युद्ध के 40वें दिन युद्धविराम हो सका है। अब अमरीका-ईरान के प्रतिनिधि 10 अप्रैल से इस्लामाबाद में बातचीत करेंगे और बृहद् शांति-समझौते की जमीन तैयार करेंगे। अब वैश्विक सवाल और जिज्ञासा है कि क्या युद्ध का यह दौर स्थायी रूप से खत्म होगा? क्या अमरीका अपनी सेना को वापस बुला लेगा? क्या इजरायल ईरान का अस्तित्व मिटाने के अपने पुराने लक्ष्य और मंसूबे को हासिल करने के लिए युद्ध की फिर शुरुआत करेगा? बेशक राष्ट्रपति टं्रप इस अस्थायी युद्धविराम को ही ‘मुकम्मल जीत’ मान रहे हैं, विश्व शांति का सबसे बड़ा दिन कह रहे हैं और इसे मध्य-पूर्व के ‘स्वर्ण-युग’ का दिन भी करार दे रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि 39 दिन के युद्ध में वह पूरी तरह नाकाम रहे हैं।
ईरान में कट्टरपंथी हुकूमत बदलने, परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करने, बैलिस्टिक मिसाइल के उत्पादन पर अंकुश लगाने, होर्मुज स्टे्रट को खुलवाने, ईरानी सेना को नेस्तनाबूद करने, ईरान में बगावत और सत्ता-परिवर्तन कराने, तेल पर कब्जा करने के जो अमरीकी, घोषित मंसूबे थे, राष्ट्रपति टं्रप उनमें नाकाम रहे हैं। सभ्यता-विध्वंस की डेडलाइन से पहले ही उन्हें ईरान का 10-सूत्रीय प्रस्ताव स्वीकार करना पड़ा, क्योंकि प्रस्ताव व्यावहारिक लगा। अब दो हफ्तों तक हमले नहीं किए जाएंगे। दोनों देश दीर्घकालीन शांति-समझौते पर बातचीत करेंगे। दरअसल इस युद्ध में, युद्धविराम तक, न तो अमरीका जीता और न ही ईरान पराजित हुआ है। सिर्फ बर्बादी, विध्वंस और मिट्टी-मलबे की जीत हुई है। युद्ध के 39 दिनों में ईरान वाकई ‘कब्रिस्तान’ बना दिया गया, लेकिन उसका योद्धा वाला चरित्र, मनोबल और अस्तित्व आज भी जिंदा है। ईरान परमाणु कार्यक्रम जारी रखेगा, यूरेनियम का संवद्र्धन भी करता रहेगा, लेकिन बम नहीं बनाएगा, यह आश्वासन संवाद के दौरान ईरान दे सकता है। चीन ने ‘वास्तविक मध्यस्थ’ की भूमिका निभाई और ईरान के सख्त, अडिय़ल रवैये को नरम कराया और युद्धविराम के लिए तैयार किया। ईरान युद्ध को स्थायी रूप से खत्म करने की अमरीकी गारंटी चाहता था। इस्लामाबाद इसलिए चुना गया, क्योंकि वह ईरान को भी पास पड़ता है और पाकिस्तान अमरीका का ही ‘उपनिवेश-सा’ है।




