संपादकीय

मतदान के मील-पत्थर

पश्चिम बंगाल में प्रथम चरण का और तमिलनाडु में पूरा मतदान हो गया। लोकतंत्र के लिए यह बेहद सुखद संकेत और रुझान है कि दोनों राज्यों में क्रमश: 92.72 फीसदी और 85.14 फीसदी मतदान के साथ नए कीर्तिमान स्थापित किए गए हैं। आजकल 60-70 फीसदी मतदान हो जाए, तो राजनीतिक दल और नेतागण राहत की सांस लेते हैं। बंगाल के इस बार के मतदान पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने खुलासा किया है कि आजादी के बाद देश में सबसे अधिक मतदान बंगाल में हुआ है, तो 1967 के बाद पहली बार तमिलनाडु में इतना अधिक मतदान किया गया है। जाहिर है कि अतीत के तमाम कीर्तिमान बौने हो गए हैं और लोकतंत्र की निर्णायक भागीदारी ने नए मील-पत्थर गाड़ दिए हैं। ये मतदान इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि बंगाल में कुल 91 लाख से अधिक और तमिलनाडु में 57 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम, विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के जरिए, काट दिए गए थे। अब भी लाखों के मताधिकार अधर में लटके हैं। एसआईआर का खौफ और भय था, ऐसी आशंकाएं भी जताई जा रही थीं कि यदि वोट नहीं देंगे, तो अंतत: नागरिकता भी जा सकती है! यहां हम स्पष्ट बता दें कि न तो संविधान में ऐसा कोई प्रावधान है और न ही देश का कानून है कि वोट न देने से नागरिकता रद्द की जा सकती है। आप बहकावे में न आएं, भ्रमित न हों और डरने की कोई जरूरत नहीं है। आपकी भारतीयता कोई खैरात नहीं है। वह आपका जन्मसिद्ध अधिकार है। बहरहाल बंपर मतदान की व्याख्याएं शुरू हो गई हैं। प्रधानमंत्री मोदी का ‘एग्जिट पोल’ दावा कर रहा है कि भाजपा प्रथम चरण की 152 सीटों में से 100 सीटें पार कर चुकी है। हालांकि भाजपा ने 125 सीटों पर प्रचंड जीत का दावा किया है। बंपर मतदान को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपनी जीत मान रही हैं। इसे 4 मई तक छोड़ देना चाहिए, जिस दिन जनादेश सार्वजनिक होंगे। कुछ पेशेवर चुनावी पंडित ‘शर्तिया विश्लेषण’ करने में जुटे हैं कि भाजपा कुल मिला कर 150-160 सीटें जीत रही है, नतीजतन ममता की 15 साल पुरानी सत्ता ढह रही है और भाजपा की सरकार बन रही है। यह दावा प्रधानमंत्री मोदी ने भी एक जनसभा में किया था कि इस बार कई जिलों में तृणमूल कांग्रेस का खाता भी नहीं खुलेगा।

प्रधानमंत्री ने ऐसा दावा अपने राजनीतिक अनुभव के आधार पर किया था। यह भी चुनावी और सियासी दावा साबित हो सकता है। यदि ममता बनर्जी ‘बंगाली अस्मिता’ की प्रतीक न होतीं, तो केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को सार्वजनिक मंच से यह घोषणा न करनी पड़ती कि भाजपा मुख्यमंत्री बंगाली होगा, बंगाल में जन्मा और पढ़ा-लिखा होगा तथा बंगला भाषा बोलता होगा। भाजपा कार्यकर्ताओं को ‘मछली’ लेकर जुलूस न निकालने पड़ते और पार्टी के केंद्रीय मंत्री स्तर के नेताओं को, मंगलवार के दिन, ‘मछली-चावल’ खाते हुए इंटरव्यू न देने पड़ते। मुख्यमंत्री को लेकर भाजपा को बंगाल में ही सफाई देनी पड़ रही है। किसी अन्य राज्य में अपवाद हो सकता है, अलबत्ता भावी मुख्यमंत्री को लेकर कोई भी घोषणा नहीं करनी पड़ती। बंगाल और भाजपा के दरमियान चारित्रिक और सांस्कृतिक फासले आज भी हैं। बहरहाल ममता बनर्जी चुनाव हारती हैं, तो एसआईआर के कारण नहीं, बल्कि महिला मतदाताओं के कम वोट के कारण हारेंगी। बेशक मतदान का दिन कई ‘मुक्त’ के साथ बीता है, लेकिन बंगाल ‘हिंसा-मुक्त’ नहीं हो पाया। मुर्शिदाबाद इलाके में निवर्तमान विधायक हुमायूं कबीर के वाहन पर पथराव हुआ। उनके साथ हाथापाई भी हुई। इसी तरह कुमारगंज में भाजपा उम्मीदवार सुवेन्दु सरकार को लोगों ने भगा-भगा कर पीटा। एक पुलिसिया अंगरक्षक इतनी भीड़ के मुक्के-थप्पड़ों को कैसे रोक सकता था। भाजपा प्रत्याशी ने गली-गली, खेतों से भाग कर जान बचाई। कहां थी 2.40 लाख सुरक्षा बलों के जवानों की सुरक्षा! 2024 में पूरे देश में लोकसभा चुनाव के दौरान कुल 3.4 लाख जवान तैनात किए गए थे। इस बार बंगाल में ही 2.40 लाख जवान और फिर भी पत्थर, बम, लाठी और पिटाई सब कुछ हुआ। गनीमत है कि अभी तक मौत के आंकड़े सुनाई नहीं दिए। बहरहाल तमिलनाडु में भी राजनीतिक संघर्ष खूब तपा हुआ है।

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