सीयू परिसर की कानूनी ईंटें

मामला जितना बड़ा बनता गया, उतना था नहीं। अंतत: माननीय हाई कोर्ट सीयू के जदरांगल परिसर की ईंटें गिन रहा है। बेशक इस बीच देहरा परिसर में सेवा विस्तार लेकर बैठे कुलपति प्रो. सत प्रकाश बंसल को भरोसा है कि विश्वविद्यालय का श्रीगणेश वहां से हो जाएगा। बेशक देहरा परिसर की रफ्तार में केंद्रीय विश्वविद्यालय, अखंड साम्राज्य का द्योतक बन रहा है, लेकिन जदरांगल ने अपने निर्माण की कानूनी रेत बजरी तैयार कर रखी है। शुक्रवार को निर्देश कड़े, तीखे व निर्माण केंद्रित हैं, इसलिए अब कानूनी नकेल औपचारिकताओं की सुस्ती पर कसी जा रही है। धर्मशाला के नार्थ कैंपस की दास्तान पहली बार अपना दुखड़ा कोर्ट में नहीं बता रही, बल्कि इस अभियान की शुरुआत धूमल-जयराम सरकारों में भी ईमानदार नहीं रही। यह ऐसा पहला मामला है, जहां राजनीति स्वयं पार्टी बन कर गुमराह करती रही। पूर्व मंत्री रविंद्र सिंह रवि के बयान तब धर्मशाला को यह कह कर आहत करते रहे कि यह स्थल किसी भी निर्माण के योग्य नहीं। सिर्फ धर्मशाला की भौगोलिक परिस्थिति भूकंपीय जोन तथा वन संरक्षण अधिनियम के सख्त पहरे में रही, नतीजतन सारी प्रयोगशालाएं और नियमावलियां जदरांगल के सपनों को तोड़ती मरोड़ती रहीं। अब आखिरी कील लिए जदरांगल परिसर हाई कोर्ट में अपने घाव दिखा रहा है, तो माननीय अदालत ने वन संरक्षण अधिनियम के तहत 30 करोड़ जमा कराने की सुस्ती पर कड़ा संज्ञान लिया है।
कानून के सामने सब्र और परिसर की कब्र का मामला है। सत्ता संस्थान ने जिस गतिशीलता, प्राथमिकता और पैरवी से देहरा के आधे परिसर पर पूरा निर्माण किया है, वहां जदरांगल परिसर लावारिस, लाचार और बेबस दिखाई देता है। अब यही परिस्थिति कानून की छत्रछाया में अपनी बेडिय़ां दिखा रही है, तो शिक्षा सचिव के लिए इस बार कड़ा सबक आया है। तीस करोड़ अगर 2023 तक जमा हो गए होते, तो केंद्र से उपलब्ध धन से यह परिसर भी परवान चढ़ चुका होता। आश्चर्य यह कि राजनीति ने तथाकथित शीतकालीन राजधानी के साथ खिलवाड़ किया। धर्मशाला में आजादी से काफी पहले ही श्रेष्ठ चिकित्सा व शिक्षा के संस्थान थे, लेकिन आधुनिक हिमाचल ने न यहां मेडिकल कालेज और न ही विश्वविद्यालय बनने दिया। शिमला विश्वविद्यालय का एकमात्र अध्ययन केंद्र होने तथा विभिन्न विषयों की सबसे अधिक अकादमियां होने के बावजूद केंद्रीय विश्वविद्यालय की दौड़ में हार गया। प्रदेश का एकमात्र कालेज जो सौ साल पूरे करके इस शहर के शिक्षा इतिहास का परचम फहरा रहा है, उसके कक्ष से विश्वविद्यालय छीना जा रहा है। उम्मीद है कि उच्च न्यायालय इस विषय की गंभीरता को देखते हुए ऐसा अंतिम फैसला सुनाएगा ताकि राजनीति शिक्षा क्षेत्र में अपनी हद से बाहर न जा पाए। माननीय अदालत ने अब इस विषय पर सरकार को ठोस कार्रवाई का समय देते हुए सात सितंबर तक तस्वीर साफ करने को कहा है, वरना शिक्षा सचिव को अदालत में आकर मंशा और मजबून को समझाते हुए सरकार की रक्षा करनी पड़ेगी। धर्मशाला में केंद्रीय विश्वविद्यालय परिसर हालांकि छात्रों-प्राध्यापकों की पहली पसंद रही है, फिर भी इसकी अंगुली पकड़ रही राजनीति के अपने पूर्वाग्रह रहे हैं और जो गाहे बगाहे प्रदर्शित व साबित होते रहे हैं। किसी भी इमारत से संस्थान नहीं बनते, इसलिए केंद्रीय विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा के लिए धर्मशाला परिसर को राजनीति के पिंजरे से मुक्ति चाहिए। कुल मिला कर अब गेंद सरकार के पाले में है और इस संबंध में मार्गदर्शक व ऐतिहासिक फैसले का इंतजार है।




