कब बनेगी दिल्ली जल-भराव मुक्त? हर स्तर पर तय हो जवाबदेही

राष्ट्रीय राजधानी होने के नाते यह उम्मीद की जाती है कि दिल्ली में अन्य शहरों के मुकाबले हर मोर्चे पर व्यवस्था बेहतर होगी। मगर इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि यहां बरसात से जुड़ी समस्याएं वर्षों से जस की तस बनी हुई हैं। गर्मी के मौसम में यहां कई इलाकों में लोग पानी की बूंद-बूंद के लिए तरस जाते हैं, तो बरसात में पानी घरों और सड़कों को ही डुबो देता है।
दिल्ली में सत्ता भले ही बदलती रहती है, लेकिन व्यवस्था में कोई बदलाव या सुधार नजर नहीं आता है। यहां नई सरकार के कमान संभालने के बाद दावे किए जा रहे थे कि शहर को जल-भराव मुक्त बनाने को सर्वाेच्च प्राथमिकता दी जाएगी, लेकिन बीते दो-तीन दिनों में दिल्ली में बारिश ने सरकार के इन दावों पर ही पानी फेर दिया है।
भारतीय मौसम विभाग के मुताबिक, वर्ष 2011 के बाद अगस्त के पहले सप्ताह में शुक्रवार को यहां सबसे अधिक 127 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई। जाहिर है कि जब एक घंटे की तेज बारिश में ही दिल्ली पानी-पानी हो जाती है, तो दिन भर की बरसात में क्या हाल होगा, इसके दृश्य इन दिनों कई जगह देखने को मिल रहे हैं।
राष्ट्रीय राजधानी में भारी बारिश से एक बार फिर जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया। कई प्रमुख सड़कें तालाब बन गईं, जिससे वाहनों की रफ्तार थम गई। महरौली-बदरपुर रोड से लेकर महिपालपुर, आइटीओ, शकरपुर और छतरपुर तक की सड़कें पानी में डूब गईं। खानपुर से ओखला मोड़ के बीच कई किलोमीटर तक गाड़ियां रेंगती नजर आईं।
इस दौरान यात्री घंटों जाम में फंसे रहे। इसके अलावा कई इलाकों में घरों में पानी भर जाने से लोगों को परेशानियां झेलनी पड़ीं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सरकार की ओर से जो दावे किए जा रहे थे, उनका आधार क्या था? अगर जल-भराव की समस्या को खत्म करने के लिए प्रयास किए गए, तो उनका नतीजा जमीन पर क्यों नहीं दिख रहा है? आखिर क्या वजह है कि बारिश के पानी की निकासी से जुड़ी योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी स्थिति में सुधार नहीं हो पा रहा है!
गौरतलब है कि सरकार की ओर से हर साल बरसात शुरू होने से पहले सीवेज की नालियों और बड़े नालों की सफाई का जोर-शोर से अभियान शुरू किया जाता है। सवाल है कि क्या यह अभियान सिर्फ कागजों तक ही सीमित रहता है? इसे कारगर तरीके से धरातल पर उतारने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? शहर में बारिश के पानी की निकासी के माकूल बंदोबस्त क्यों नहीं हो पा रहे हैं?
इसका एक कारण यह भी है कि दिल्ली में जल-भराव की समस्या से निपटने के मुद्दे पर काम कम और सियासत ज्यादा होती है। हमेशा की तरह इस दफा भी यही देखने-सुनने को मिल रहा है।
सरकार का दावा है कि जिन स्थानों पर पहले बहुत ज्यादा जल-भराव होता था, वहां इस बार समस्या काफी कम रही। वहीं, विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार दिक्कतों का स्थायी समाधान करने के बजाय लीपा-पोती की कोशिश कर रही है।
बहरहाल, सरकार को इस बात पर गंभीरता से विचार करना होगा कि अगर दिल्ली को वास्तव में जल-भराव मुक्त बनाना है, तो दावों के समांतर जमीन पर भी काम करना होगा और लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों एवं कर्मचारियों की हर स्तर पर जवाबदेही तय करनी होगी।




