पहाड़ मदद की गुहार नहीं लगा रहे, वे हमारे लिए रो रहे हैं!

पहाड़ों को ढहते हुए देखने में कुछ बहुत ही विचलित करने वाला है। अधिकांश लोगों के लिए पहाड़ एक सुंदर भूदृश्य है, एक ऐसी जगह, जहां वे भागकर आ सकते हैं, ताजी हवा में सांस ले सकते हैं, तस्वीरें ले सकते हैं और शहरों के शोर-शराबे से दूर, कुछ शांतिपूर्णदिन बिता सकते हैं। हममें से जो पहाड़ों से आते हैं, उनके लिए यह बिल्कुल अलग है। यह हमारा घरहै।
मैं हिमाचल प्रदेश से आती हूं। मेरी जड़ें चंबा में हैं, एक ऐसी जगह, जहां पहाड़ पृष्ठभूमि में मात्र एक दृश्य नहीं हैं, वे हमारे जीवन, हमारी स्मृतियों और हमारी पहचान का हिस्सा हैं। हम उन घुमावदार सड़कों, उन खड़ी घाटियों, उन नदियों और उन विशाल ढलानों के साथ बड़े हुए हैं, जो एक ही समय में भव्य और भयावह दोनों लग सकती हैं। और इसलिए, जब मैं हिमालयी क्षेत्र में एक और त्रासदी घटते देखती हूं, तो मेरे लिए इसे सिर्फ एक अन्य समाचार के रूप में देखना असंभव हो जाताहै। पिछले साल, मेरे अपने गृहनगर चंबा में मूसलाधार बारिश के प्रकोप में लोगों ने अपनी जान गंवाई। हर मौत के पीछे एक परिवार था। किसी का पति। किसी की पत्नी। किसी का बच्चा। किसी के माता-पिता। कोई ऐसा व्यक्ति, जो एक और सामान्य दिन की उम्मीद में सोने गया था और कभी उसदिन में जाग नहीं सका।
आपदाओं की बात करते समय यह वह हिस्सा है जिसे हम अक्सर भूल जाते हैं। हम आंकड़ों की बात करते हैं। लेकिन जब यह आपका अपना परिवार होता है, तो वह कोई आंकड़ा नहीं होता और शायद यही कारण है कि नेपाल की त्रासदी को हिमालयी क्षेत्र की हर सरकार को बेहद असहज कर देना चाहिए क्योंकि वहां जो हो रहा है वह केवल नेपाल की समस्या नहीं है। यह हम सभी के लिए एक चेतावनी है। हिमालय पर भारी दबाव है। हर साल मानसून वही भयावह दृश्य लेकर आता है-सड़कों को निगलते भूस्खलन, पुलों और घरों को बहा ले जाती उफनती नदियां, टनों मलबे के नीचे दबे वाहन, फंसे हुए पर्यटक और देश के बाकी हिस्सों से कटे हुए गांव।
फिर वही परिचित प्रतिक्रिया आती है। बचाव दल भेजे जाते हैं। सिर के ऊपर हैलीकॉप्टर उड़ते हैं। मंत्री चिंता व्यक्त करते हैं। मुआवजे की घोषणा की जाती है। सड़कों की मुरम्मत का वादा किया जाता है और अंतत: सुर्खियां गायब हो जाती हैं। लेकिन पहाड़ नहीं भूलते। परिवार नहीं भूलते। और अगला मानसून आ जाता है। हमें खुद से एक बहुत ही असहज करने वाला सवाल पूछना होगा-इसमें से वास्तव में कितनी प्राकृतिक आपदा है और कितनी हम खुद पैदा कर रहे हैं? इसमें कोई संदेह नहीं कि चरम मौसम अधिक अप्रत्याशित होता जा रहा है और जलवायु परिवर्तन नाजुक पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र पर अतिरिक्त दबाव डाल रहा है लेकिन हम कुछ बहुत ही खतरनाक भी कर रहे हैं। हम ऐसे निर्माण कर रहे हैं मानो पहाड़ मैदान हों। हम होटलों को ऐसे मंजूरी देते हैं मानो जमीन कभी हिलेगी ही नहीं। हम नदियों और नालों के बेहद करीब इमारतें बनने देते हैं। हम अवैध निर्माण देखते हैं और कभी-कभी अनदेखा कर देते हैं। हम राजमार्ग बनाने के लिए पहाड़ों को काटतेहैं, अक्सर जल निकासी, ढलान की स्थिरता और भूभाग के भूवैज्ञानिक स्वरूप पर पर्याप्त विचार किए बिना। हम बांध, सुरंगें और सड़कें बनाते हैं क्योंकि वे निवेश, बिजली, कनैक्टिविटी और नौकरियां लाते हैं। ये सभी चीजें महत्वपूर्ण हैं। लेकिन सवाल यह नहीं है कि क्या पहाड़ विकास के हकदार हैं? बेशक वे हैं। सवाल यह है कि पहाड़ किस तरह के विकास का सुरक्षित रूप से वहन कर सकते हैं? विकास और अंधाधुंध निर्माण के बीच जमीन-आसमान का अंतर है।
सड़क जरूरी है लेकिन क्या इसे पहाड़ को सबसे विनाशकारी तरीके से काटकर ही बनाना होगा? एक होटल रोजगार प्रदान करता है लेकिन क्या उसे किसी कमजोर ढलान पर या नदी के खतरनाक रूप से करीब खड़ा होना ज़रूरी है? बिजली आवश्यक है लेकिन क्या हर घाटी को किसी अन्य परियोजना के लिए एक सुविधाजनक स्थान माना जा सकता है? ये विकास विरोधी सवाल नहीं हैं। ये सामान्य समझ के सवाल हैं। दुर्भाग्य से, जब भारी मात्रा में पैसा शामिल होता है, तो सामान्य समझ गायब होती दिखाई देती है। सरकारें स्वाभाविक रूप से निवेश चाहती हैं। व्यवसाय मुनाफा चाहते हैं। पर्यटक बेहतर सड़कें और अधिक आवास चाहते हैं। राजनेता ऐसी विकास परियोजनाएं चाहते हैं जिन्हें वे दिखा सकें। लेकिन जो लोग वहां रहते हैं, उन्हें इसके परिणामों के साथ जीना पड़ता है। मौसम खराब होने पर एक पर्यटक हिल स्टेशन छोड़कर जा सकता है। एक स्थानीय परिवार नहीं जा सकता। सड़क टूटने पर पर्यटक घर लौट सकता है। एक दुकानदार, जिसका व्यवसाय नष्ट हो गया है, वह बस अपना सामान समेटकर कहीं और नहीं जा सकता। एक ठेकेदार परियोजना पूरी करके दूसरी जगह जा सकता है, पर्वतीय समुदाय पीछे ही रहताहै। यही कारण है कि स्थानीय लोगों की आवाज कामहत्व वर्तमान की तुलना में कहीं अधिक होना चाहिए।
किसी बड़ी होटल परियोजना को मंजूरी देने से पहले, किसी पहाड़ी को काट कर राजमार्ग बनाने से पहले, किसी अन्य बांध या सुरंग को मंजूरी देने से पहले, सरकारों को एक सीधा सवाल पूछना होगा-क्या यह पहाड़ वास्तव में इसे झेल सकता है? और उन्हें इसका जवाब स्वतंत्र भूवैज्ञानिकों, पर्यावरण विशेषज्ञों और सबसे महत्वपूर्ण, उन लोगों से चाहिए जो पीढिय़ों से वहां रह रहे हैं, न कि केवल उन लोगों से, जिनका काम परियोजना को मंज़ूरी दिलाना है। पर्यावरणीय स्वीकृतियां केवल कागजी कसरत नहीं बननी चाहिएं। भवन निर्माण के नियम केवल सरकारी फाइलों में नहीं होने चाहिएं। विडंबना यह है कि हम उसी चीज को नष्ट कर रहे हैं, जो लोगों को पहली बार में पहाड़ों की ओर आकॢषत करती है। लोग हिमाचल उसके जंगलों, नदियों, स्वच्छ हवा, घाटियों और सुंदर परिदृश्यों के लिए आते हैं। फिर हम जंगलों के ऊपर निर्माण करते हैं, सड़कों को यातायात से जाम कर देते हैं, नदियों में कचरा फैंकते हैं, ढलानों को कंक्रीट से ढक देते हैं और सोचते हैं कि पहाड़ अस्थिर क्यों हो रहे हैं। हम पर्यटक को वास्तव में क्या बेच रहे हैं? बिना पहाड़ के एक पहाड़ी छुट्टी? हमें प्रगति की अपनी परिभाषा पर पुनॢवचार करने की आवश्यकता है। एक खोए हुए जीवन का पुनॢनर्माण किसी सड़क की तरह नहीं किया जा सकता। किसी परिवार को मुआवजे के चैक से दोबारा नहीं बसाया जा सकता। बच्चे को खोने वाले माता-पिता वापस नहीं मिल जाते क्योंकि सरकार ने राहत की घोषणा की है।
यही कारण है कि नेपाल को एक सबक होना चाहिए। और ऐसा ही सबक हिमाचल, उत्तराखंड और अन्य हिमालयी क्षेत्रों की हर त्रासदी को भीहोना चाहिए। हम अगले बादल फटने, अगले भूस्खलन, अगली सड़क धंसने, अगले गांव के बह जाने का इंतजार नहीं कर सकते। लोगों के मरने के बाद हम अपनी गलतियों की खोज जारी नहीं रख सकते। हिमालय लाखों वर्षों से जीवित है। उन्हें हमें बचाने की आवश्यकता नहीं है। हमें उनके साथ रहना सीखने की आवश्यकता है। इसके लिए सरकारों को कभी-कभी उन परियोजनाओं को न कहने की आवश्यकता है जो पैसे और नौकरियों का वादा करती हैं लेकिन अस्वीकार्य जोखिम लाती हैं।-देवी चेरियन




