लेखव्यापार

बढ़ते व्यापार घाटे की चुनौती

सौर और पवन ऊर्जा के घरेलू उत्पादन को बढ़ाकर औद्योगिक ऊर्जा मांग को ग्रिड-आधारित हरित ऊर्जा पर स्थानांतरित किया जा सकता है, जिससे तेल व कोयला आयात बिल में अरबों डॉलर की बचत होगी। ई-वाहनों का तेजी से अपनाव जरूरी है…

हाल ही में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान ब्रिक्स बिजनेस काउंसिल के तहत भारत ने ब्रिक्स देशों के साथ भारत के व्यापार असंतुलन की चिंता को भी प्रस्तुत किया। कहा गया कि वर्ष 2025-26 में ब्रिक्स देशों के साथ भारत का कुल द्विपक्षीय व्यापार लगभग 416 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है। भारत का कुल आयात 320 अरब डॉलर का है, यह आयात मुख्य रूप से ऊर्जा (कच्चा तेल, गैस) और विनिर्माण इनपुट (इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी) पर केंद्रित है। ब्रिक्स देशों को भारत का कुल निर्यात लगभग 96 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच चुका है। यद्यपि ब्रिक्स देशों के साथ भारत के व्यापार की मात्रा बढ़ी है, लेकिन भारत के लिए 224 अरब डॉलर का भारी-भरकम व्यापार घाटा एक प्रमुख नीतिगत चुनौती बना हुआ है। उल्लेखनीय है कि भारत के विदेश व्यापार पर प्रकाशित हालिया राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में भारत के व्यापार घाटा बढऩे पर महत्वपूर्ण विश्लेषण प्रस्तुत किए गए हैं। भारतीय रिजर्व बैंक की सितंबर 2026 की रिपोर्ट में भारत के बढ़ते व्यापार घाटे और उसके प्रभावों पर महत्वपूर्ण विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। रिजर्व बैंक द्वारा सितंबर के पहले सप्ताह में जारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में भारत का चालू खाता घाटा (सीएडी) बढक़र 4.2 अरब डॉलर (जीडीपी का 0.5 प्रतिशत) तक पहुंच गया है। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि वस्तु व्यापार घाटे में 25 प्रतिशत की उछाल दर्ज की गई है। वैश्विक संगठन मैकिन्से ग्लोबल ट्रेड अपडेट सितंबर 2026 के अनुसार मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल तथा कोयले की वैश्विक कीमतों में वृद्धि ने भारत के आयात बिल और व्यापार घाटे को रिकार्ड स्तर पर पहुंचा दिया है।

इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक घटकों की बढ़ती मांग ने चीन से होने वाले आयात को और बढ़ा दिया है। वित्त वर्ष 2026-27 के तहत अप्रैल-अगस्त के दौरान भारत का वस्तु निर्यात करीब 15 प्रतिशत बढ़ा है, लेकिन आयात में 19 प्रतिशत से अधिक की तीव्र वृद्धि के कारण विदेश व्यापार घाटा ऊंचाई पर पहुंच गया है। कच्चे तेल और ईंधन की ऊंची वैश्विक कीमतें, इलेक्ट्रॉनिक्स, कोयला, उर्वरक और सोने के अधिक आयात के कारण विदेश व्यापार घाटा बढ़ते हुए दिखाई दे रहा है। यह बात भी महत्वपूर्ण है कि चालू वित्त वर्ष में भारत का कई प्रमुख देशों के साथ व्यापार घाटा तेजी से बढ़ा है। हाल ही में केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने टोक्यो में जापान के साथ द्विपक्षीय वार्ता के दौरान भारत के बढ़ते व्यापार घाटे पर चिंता व्यक्त की। पिछले वित्त वर्ष 2025-26 में जापान के साथ भारत का व्यापार घाटा बढक़र 15.4 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। भारत का आयात 21.43 अरब डॉलर और निर्यात महज 6.03 अरब डॉलर रहा है। इस असंतुलन को दूर करने के लिए वर्ष 2011 में लागू हुए 15 साल पुराने व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते (सीपा) की समीक्षा करने और इसके दायरे को बढ़ाने की बात कही गई है। भारत मुख्य रूप से अपने बासमती चावल, कृषि और फार्मास्यूटिकल उत्पादों के लिए जापानी बाजार में बेहतर पहुंच की मांग कर रहा है। उल्लेखनीय है कि भारत का सबसे ज्यादा व्यापार घाटा चीन के साथ है। वर्ष 2026 की पहली छमाही जनवरी से जून में चीन से भारत का आयात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने से यह घाटा और चुनौतीपूर्ण हुआ है। वर्ष 2026 की पहली छमाही में भारत और चीन के बीच कुल व्यापार घाटा 67.1 अरब डॉलर दर्ज किया गया है। दोनों देशों के बीच कुल कारोबार 91.72 अरब डॉलर रहा, जिसमें पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में 23.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। भारत ने चीन से 79.41 अरब डॉलर का सामान मंगवाया। भारत की ओर से चीन को मात्र 12.31 अरब डॉलर का सामान बेचा गया। चीन से भारत में लगातार बढ़ता आयात और उसकी तुलना में अत्यंत कम निर्यात ही इस विशाल व्यापार घाटे की मुख्य वजह है। भारत मुख्य रूप से चीन से बिजली के उपकरण, दूरभाष के पुर्जे, कंप्यूटर उपकरण, अद्र्धचालक (सेमीकंडक्टर), बैटरी और औद्योगिक मशीनरी का आयात करता है। यदि हम भारत-रूस व्यापार की ओर देखें तो पाते हैं कि चालू वित्त वर्ष में अगस्त तक रूस से भारत में सबसे ज्यादा कच्चा तेल आया है।

चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में रूस से भारत का आयात 52.59 प्रतिशत बढक़र 23.61 अरब डॉलर तक पहुंच गया। आयात में इस वृद्धि का मुख्य कारण कच्चा तेल है, जिसकी खरीद में 55 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। तेल के अलावा भारत रूस से उर्वरक, पशु/वनस्पति चर्बी और अर्ध-कीमती पत्थर भी आयात करता है। ऐसे में व्यापार का संतुलन पूरी तरह से रूस के पक्ष में झुका हुआ है। पश्चिमी प्रतिबंधों और अमरीका के राजनीतिक दबाव के बावजूद भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी तेल की खरीद जारी रखी है। यह भी महत्वपूर्ण है कि भारत का व्यापार घाटा प्रमुख रूप से मध्य पूर्व और एशियाई देशों संयुक्त अरब अमीरात, इराक और सऊदी अरब, इंडोनेशिया, दक्षिण कोरिया, स्विट्जरलैंड, हांगकांग जैसे देशों के साथ भी बना हुआ है। अमरीका में भारतीय वस्तुओं पर टैरिफ बढ़ाने के बाद भी भारत से अमरीका को निर्यात अमरीका से भारत में आने वाले आयात की तुलना में अधिक है और व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में है। उल्लेखनीय है कि वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक जुलाई 2026 में भारत का व्यापार घाटा 31.98 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया, जो कि पिछले छह महीनों का उच्चतम स्तर है। चालू वित्त वर्ष 2026-27 के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल से जुलाई के चार महीनों में व्यापार घाटा बढक़र 118 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। चालू वित्त वर्ष में अप्रैल से जुलाई के चार महीनों का प्रदर्शन भी देश के बढ़ते व्यापार असंतुलन की तस्वीर साफ करता है। अप्रैल से जुलाई के दौरान कुल आयात सालाना आधार पर 19.3 प्रतिशत बढक़र 292.38 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इसी चार महीने की अवधि में वस्तु निर्यात 17 प्रतिशत बढक़र 173.78 अरब डॉलर दर्ज किया गया। व्यापार घाटे के इस स्तर पर पहुंचने के पीछे मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की मांग और इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के आयात में हुई बढ़ोतरी जिम्मेदार है। नि:संदेह, देश के बढ़ते व्यापार घाटे को कम करने के लिए रणनीतिपूर्वक आगे बढऩा होगा। हरित ऊर्जा और इथेनॉल सम्मिश्रण को बढ़ावा देना होगा।

कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने के लिए हरित हाइड्रोजन के उपयोग को बढ़ाना होगा। नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार किया जाना होगा। सौर और पवन ऊर्जा के घरेलू उत्पादन को बढ़ाकर औद्योगिक ऊर्जा मांग को ग्रिड-आधारित हरित ऊर्जा पर स्थानांतरित किया जा सकता है, जिससे तेल व कोयला आयात बिल में अरबों डॉलर की बचत होगी। ई-वाहनों का तेजी से अपनाव जरूरी है। सार्वजनिक और निजी परिवहन में इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने से पेट्रोलियम उत्पादों की घरेलू खपत घटेगी, जिसका सीधा असर आयात बिल में कमी के रूप में दिखेगा। हमें इस बात पर ध्यान देना होगा कि हाल ही में वाणिज्य मंत्रालय द्वारा जारी भारत के बढ़ते व्यापार घाटे के आंकड़े केवल एक चेतावनी नहीं, बल्कि रणनीति बदलने का अवसर हैं। व्यापार घाटे को कम करने के लिए आयात पर प्रतिबंध लगाने की बजाय आयात प्रतिस्थापन, निर्यात विविधीकरण और सेवा क्षेत्र के विस्तार की रणनीति के साथ आगे बढऩा होगा। यदि भारत ऊर्जा के क्षेत्र में हरित बदलाव लाता है, ढुलाई लागत घटाता है, उच्च स्तरीय विनिर्माण को गति देता है और सेवा क्षेत्र को नए वैश्विक मॉडलों पर ले जाता है, तो निश्चित रूप से व्यापार घाटा नियंत्रण में रह सकेगा।-डा. जयंती लाल भंडारी

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